राजनीति भविष्य तय करती है
अविनाश दास
कल एक रील देखी। किसी गांव में कैमरा लिये कुछ लड़के एक बहुत छोटे बच्चे को उकसा-उकसा कर गालियां दिलवा रहे थे। लोग हंस रहे थे। बच्चा वहां मनुष्य नहीं था – कैमरे के लिए तैयार किया गया तमाशा था। उसकी भाषा उसकी नहीं थी, मगर अपमान उसी के हिस्से में आएगा।
आज पटना के डाकबंगला चौराहे से एक छह साल के बच्चे की तस्वीर आयी है। वह छात्र प्रदर्शन में नारे लगा रहा था। पुलिस ने उसे वहां से हटा दिया। मैं इसे गिरफ़्तारी नहीं कह रहा हूं, मगर यह तस्वीर उस व्यवस्था का डर ज़रूर दिखाती है, जिसे बच्चे का गाली देना मनोरंजन लगता है और सवाल करना ख़तरा।
मेरी बेटी छोटी थी, तो हमारे साथ जंतर-मंतर जाती थी। अब हम मुंबई के प्रदर्शनों में साथ जाते हैं। बच्चे मां-बाप के साथ मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या कांवर यात्रा में जाएं, तो किसी को उनका बचपन संकट में नहीं दिखता। वही बच्चा किसी जनतांत्रिक प्रदर्शन में खड़ा हो जाए, तो अचानक सबको उसकी मासूमियत याद आ जाती है।
सत्ता को बच्चों की चिंता कम, उनकी चेतना से डर ज़्यादा होता है। उसे आज्ञाकारी भक्त चाहिए, सवाल करने वाला भावी नागरिक नहीं। इसीलिए बच्चे को धर्म की कथा सुनाना संस्कार कहलाता है और अन्याय की पहचान कराना राजनीति।
जबकि असली सवाल यह है कि बच्चा किसी और की उत्तेजना का खिलौना है या अपने समय को समझने की प्रक्रिया में शामिल एक मनुष्य। उसे नारे की मशीन बनाना उतना ही ग़लत है, जितना उसे दुनिया के सवालों से बेख़बर रखना। तटस्थ बचपन जैसी कोई चीज़ नहीं होती – क्योंकि भूख, फ़ीस, बेरोज़गारी, जाति, हिंसा और पुलिस बच्चे के बड़ा होने का इंतज़ार नहीं करते।
एक दुनिया के भीतर कई दुनिया रहती हैं। कौन-सी दुनिया कब अधिक मानीख़ेज़ हो उठेगी, यह सत्ता तय नहीं कर सकती। पटना की इस तस्वीर में आज एक बच्चा है। कल और बच्चे सड़क पर होंगे। तब उनके मां-बाप से कहा जाएगा – इन्हें संभालिए, राजनीति से दूर रखिए। मगर शायद उन्हें समझना होगा कि धर्म मनुष्य को विरासत में मिल सकता है, राजनीति उसका भविष्य तय करती है। और जब भविष्य ही घेरे में हो, तब सड़क से दूर रहना मासूमियत नहीं – किसी और के फ़ैसले के आगे चुपचाप अपना जीवन रख देना है।
