भारत में राजनीति मुद्दों से ज्यादा धारणाओं की लड़ाई क्यों बन गई?

भारत में राजनीति मुद्दों से ज्यादा धारणाओं की लड़ाई क्यों बन गई?

– ओमप्रकाश तिवारी

 

भारत की राजनीति में मुद्दे खत्म नहीं हुए हैं। बेरोजगारी है, महंगाई है, किसानों की आय का सवाल है, शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता है, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की जरूरत है। लेकिन चुनावी राजनीति में इन मुद्दों की जगह अक्सर एक दूसरा सवाल ज्यादा बड़ा हो जाता है—लोग किसी मुद्दे को किस नजर से देखते हैं? यही वह बिंदु है जहां राजनीति मुद्दों की लड़ाई से आगे बढ़कर धारणाओं की लड़ाई बन जाती है।

किसी सरकार के समर्थक के लिए वही सरकार विकास और राष्ट्रनिर्माण का प्रतीक हो सकती है, जबकि विरोधी के लिए वह बेरोजगारी, महंगाई या संस्थागत कमजोरी का प्रतीक बन सकती है। इसी तरह कोई राजनीतिक नेता एक वर्ग के लिए मजबूत और निर्णायक नेता होता है तो दूसरे वर्ग के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती। इस बदलाव को समझने के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

2024 का चुनाव: एक ही सरकार, दो बिल्कुल अलग तस्वीरें

लोकनीति-सीएसडीएस के 2024 पोस्ट-पोल सर्वे में 19,663 लोगों से बातचीत की गई। सर्वे के मुताबिक 59 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाता केंद्र की एनडीए सरकार के पिछले पांच साल के प्रदर्शन से पूरी तरह या कुछ हद तक संतुष्ट थे। दूसरी ओर करीब 36 प्रतिशत लोग कुछ हद तक या पूरी तरह असंतुष्ट थे। यानी एक ही शासन के बारे में समाज में दो बिल्कुल अलग धारणाएं मौजूद थीं। लेकिन इससे भी दिलचस्प आंकड़ा यह है कि लोगों ने सरकार के काम में सबसे ज्यादा पसंद क्या किया। 22.4 प्रतिशत लोगों ने राम मंदिर निर्माण को केंद्र सरकार का सबसे पसंदीदा काम बताया। इसके बाद 6.4 प्रतिशत ने गरीबी में कमी और 5.6 प्रतिशत ने रोजगार के अवसर पैदा करने को सबसे पसंदीदा काम माना। यानी सरकार के काम को पसंद करने का पैमाना केवल आर्थिक प्रदर्शन नहीं था। उसमें सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक भावनाएं और राष्ट्रीय गौरव भी शामिल थे। लेकिन जब उसी सर्वे में पूछा गया कि सरकार के किस काम को सबसे ज्यादा नापसंद किया गया, तो तस्वीर बदल गई। 23.8 प्रतिशत लोगों ने महंगाई और 23.1 प्रतिशत ने बढ़ती बेरोजगारी को सबसे बड़ी शिकायत बताया। 11.2 प्रतिशत ने बढ़ती गरीबी और 7.4 प्रतिशत ने सांप्रदायिकता या धार्मिक संघर्ष को सबसे नापसंद काम बताया। यानी मतदाता के दिमाग में एक साथ दो तस्वीरें थीं— राम मंदिर भी महत्वपूर्ण था और बेरोजगारी-महंगाई भी। यही भारतीय राजनीति की नई जटिलता है।

मुद्दा वही, लेकिन उसका अर्थ अलग

राजनीति में तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन लोकतंत्र में मतदाता केवल तथ्य के आधार पर निर्णय नहीं करता। वह तथ्य को अपनी सामाजिक स्थिति, अनुभव, पहचान और राजनीतिक विश्वास के माध्यम से देखता है। उदाहरण के लिए बेरोजगारी एक तथ्य हो सकती है। लेकिन किसी युवा के लिए इसका अर्थ व्यक्तिगत भविष्य का संकट है, किसी सरकार के समर्थक के लिए यह वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ी समस्या हो सकती है और किसी विपक्षी दल के लिए सरकार की विफलता। इसी तरह राम मंदिर केवल एक निर्माण परियोजना नहीं है। उसके समर्थकों के लिए वह धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पुनर्स्थापन और लंबे राजनीतिक संघर्ष की सफलता का प्रतीक है। विरोधियों के लिए राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रतीक। घटना एक है, लेकिन उसका राजनीतिक अर्थ अलग-अलग है। और चुनाव में अक्सर तथ्य से ज्यादा यही अर्थ वोट को प्रभावित करता है।

राजनीति में ‘परसेप्शन’ इतना शक्तिशाली क्यों हुआ?

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है—सूचना की बाढ़। पहले मतदाता को राजनीति की जानकारी मुख्यतः अखबार, रेडियो, टेलीविजन, राजनीतिक सभाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं से मिलती थी। अब उसके पास मोबाइल फोन है, WhatsApp है, YouTube है, Instagram है, Facebook है और X है। इस बदलाव ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन साथ ही सूचना के बीच सत्य और असत्य का अंतर करना भी कठिन कर दिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव अधिकारियों को सोशल मीडिया पर गलत सूचना, नफरत फैलाने वाली सामग्री और फर्जी खबरों की निगरानी के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ी। Reuters ने रिपोर्ट किया था कि चुनाव के दौरान लगभग एक अरब मतदाताओं वाले देश में ऑनलाइन misinformation की निगरानी एक बड़ी चुनौती बन गई थी और AI-generated deepfake वीडियो भी सामने आ रहे थे। Reuters Institute की Digital News Report 2024 ने भी वैश्विक स्तर पर misinformation की चिंता बढ़ने और समाचार उपभोग के तरीके में बड़े बदलाव की ओर संकेत किया। भारत में इंटरनेट पहुंच करीब 60 प्रतिशत बताई गई थी। अब राजनीति केवल मैदान में नहीं लड़ी जाती। वह स्क्रीन पर भी लड़ी जाती है।

सोशल मीडिया ने राजनीति को ‘तथ्य’ से ‘कथा’ की ओर धकेला

सोशल मीडिया का मूल कारोबार ध्यान आकर्षित करना है। वहां लंबा आर्थिक विश्लेषण उस छोटे वीडियो से हार सकता है जिसमें कोई नेता देश बचाता हुआ या देश बर्बाद करता हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल और उनके समर्थक केवल यह नहीं बताते कि सरकार ने क्या किया। वे यह तय करने की कोशिश भी करते हैं कि जनता उस काम के बारे में क्या सोचे। एक सरकार कहती है—हमने विकास किया। विपक्ष कहता है—विकास का लाभ कुछ लोगों तक सीमित है। सरकार कहती है—हमने गरीबों को मुफ्त राशन दिया। विपक्ष कहता है—रोजगार क्यों नहीं दिया? सरकार कहती है—भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ी। विपक्ष पूछता है—आम आदमी की आय कितनी बढ़ी? इसी तरह विपक्ष कहता है कि लोकतंत्र खतरे में है। सत्ता पक्ष जवाब देता है कि विपक्ष देश की संस्थाओं को बदनाम कर रहा है। यहां बहस केवल क्या हुआ पर नहीं रहती। असली लड़ाई बन जाती है—जो हुआ, उसका मतलब क्या निकाला जाए?

2024 का चुनाव बताता है कि धारणाएं स्थायी नहीं होतीं

अगर भारतीय राजनीति पूरी तरह धार्मिक या भावनात्मक मुद्दों से तय होती, तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर 272 सीटों का बहुमत मिलने की संभावना मजबूत होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भाजपा 2019 की 303 सीटों से घटकर 2024 में 240 सीटों पर आ गई और उसे सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ा। इसका अर्थ यह नहीं कि मतदाताओं ने धार्मिक या सांस्कृतिक मुद्दों को खारिज कर दिया। बल्कि यह कि धारणा भी बहुस्तरीय होती है। एक मतदाता धार्मिक पहचान से प्रभावित हो सकता है, लेकिन साथ ही रोजगार और महंगाई से परेशान भी हो सकता है। यही वजह है कि अयोध्या जैसी प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण सीट पर भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। 2024 के चुनाव के बाद कई विश्लेषणों में बेरोजगारी, आय और महंगाई जैसे स्थानीय आर्थिक मुद्दों को इस परिणाम से जोड़ा गया। अर्थात धारणा की राजनीति का मतलब यह नहीं कि वास्तविक मुद्दे गायब हो गए हैं। बल्कि वास्तविक मुद्दे अब धारणा के चश्मे से देखे जाते हैं।

नेता अब नीतियों से ज्यादा प्रतीक क्यों बन रहे हैं?

आज भारतीय राजनीति में नेता स्वयं एक राजनीतिक ‘ब्रांड’ बन चुके हैं। मतदाता कई बार पार्टी के घोषणापत्र की तुलना में नेता की छवि पर अधिक निर्णय करता है—कौन मजबूत है, कौन ईमानदार है, कौन गरीबों के साथ है, कौन राष्ट्रवादी है, कौन लोकतंत्र बचाएगा, कौन देश को विश्व शक्ति बनाएगा। साल 2024 के लोकनीति-सीएसडीएस सर्वे में करीब 50 प्रतिशत वैध उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके वोट के निर्णय में पार्टी अधिक महत्वपूर्ण थी, जबकि 36.2 प्रतिशत ने उम्मीदवार और 9.6 प्रतिशत ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को महत्वपूर्ण बताया। यह आंकड़ा बताता है कि व्यक्ति और नेतृत्व महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह भी बताता है कि भारतीय मतदाता पूरी तरह केवल नेता के आधार पर वोट नहीं करता। फिर भी राजनीति में नेता की छवि का महत्व लगातार बढ़ा है।

पहचान की राजनीति इस बदलाव को और मजबूत करती है

भारत जैसा समाज जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और वर्ग जैसी अनेक पहचानों से बना है। लोकतंत्र स्वाभाविक रूप से इन पहचानों को राजनीतिक अभिव्यक्ति देता है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक दल नीति के बजाय पहचान को मुख्य राजनीतिक हथियार बना लेते हैं। साल 2024 के लोकनीति सर्वे में 50.2 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इस कथन से पूरी तरह या कुछ हद तक सहमति जताई कि लोकतंत्र में बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा प्रभावी होनी चाहिए। लगभग 39 प्रतिशत इससे कुछ हद तक या पूरी तरह असहमत थे। यह आंकड़ा अपने आप में किसी एक पार्टी के पक्ष या विपक्ष का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि बहुसंख्यक पहचान, लोकतंत्र और राजनीतिक सत्ता के संबंध पर समाज में गहरी बहस मौजूद है। और जब समाज किसी पहचान के आधार पर राजनीतिक रूप से संगठित होता है, तब आर्थिक या प्रशासनिक मुद्दे भी उसी पहचान के चश्मे से देखे जाने लगते हैं।

मीडिया ने भी धारणा की राजनीति को बढ़ाया

राजनीति और मीडिया का संबंध हमेशा से रहा है। लेकिन डिजिटल युग ने इसे और जटिल बना दिया है। अब पाठक सिर्फ खबर नहीं पढ़ता। वह खबर को पसंद करता है, साझा करता है, टिप्पणी करता है और उसके पक्ष या विपक्ष में डिजिटल भीड़ बनाता है। नतीजा यह है कि मीडिया में भी कई बार वह सामग्री ज्यादा दिखाई देती है जो लोगों की पहले से बनी धारणा को मजबूत करती है। साल 2024 के लोकनीति सर्वे में राजनीतिक दलों पर ‘बहुत ज्यादा भरोसा’ जताने वालों की संख्या 19.7 प्रतिशत थी, जबकि मीडिया पर यह 21.4 प्रतिशत थी। इसके उलट 17.6 प्रतिशत लोगों ने मीडिया पर बिल्कुल भरोसा न होने की बात कही। यानी मीडिया भी अब धारणा की राजनीति का हिस्सा बन गया है—और उसकी विश्वसनीयता खुद राजनीतिक बहस का विषय बन चुकी है।

सबसे बड़ा खतरा: नागरिक ‘सूचना’ नहीं, अपनी पसंद का प्रमाण खोजने लगता है

धारणा की राजनीति का सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि व्यक्ति तथ्य को अपनी धारणा के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार करने लगता है। अपने नेता के पक्ष में खबर आए तो वह उसे तुरंत सही मान लेता है। विरोधी के पक्ष में खबर आए तो वह पहले पूछता है—स्रोत क्या है? लेकिन जब वही खबर उसके राजनीतिक विश्वास के अनुकूल हो, तो स्रोत की जांच की जरूरत उसे महसूस नहीं होती। यहीं से confirmation bias पैदा होता है—मनुष्य वही सूचना आसानी से स्वीकार करता है जो उसके पहले से बने विश्वास को मजबूत करती है। AI और deepfake ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। साल 2024 के चुनाव में नेताओं के नकली वीडियो और बदली हुई आवाजों के उदाहरण सामने आए। कल तक सवाल था—फर्जी खबर क्या है? अब सवाल है—क्या असली है, यह तय कैसे करें?

क्या मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं?

नहीं। साल 2024 का लोकनीति सर्वे इसका सीधा प्रमाण है। सरकार के काम को नापसंद करने वालों में सबसे बड़े दो मुद्दे बेरोजगारी और महंगाई थे—क्रमशः 23.1 और 23.8 प्रतिशत। दिल्ली में लोकनीति-सीएसडीएस के एक अलग अध्ययन ने भी 2024 चुनाव से पहले युवाओं और शहरी गरीबों के बीच बेरोजगारी और महंगाई की चिंता का अध्ययन किया था। इसमें 18-25 वर्ष के 611 छात्रों और 1,024 शहरी गरीबों को शामिल किया गया था। इसलिए यह कहना गलत होगा कि भारतीय मतदाता केवल धर्म, जाति या नेता की छवि पर वोट करता है। सही बात यह है कि मुद्दा और धारणा अब अलग-अलग चीजें नहीं रह गई हैं। मुद्दा तब राजनीतिक शक्ति बनता है जब उसके बारे में एक प्रभावशाली धारणा बनती है।

राजनीति का असली मैदान अब ‘नैरेटिव’ है

आज राजनीतिक दल तीन लड़ाइयां एक साथ लड़ते हैं। पहली—काम की लड़ाई। सरकार क्या कर रही है? दूसरी—विश्वसनीयता की लड़ाई। लोग सरकार की बात पर विश्वास करते हैं या विपक्ष की? तीसरी—कथा की लड़ाई। लोग पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को किस कहानी के रूप में देखते हैं? यही तीसरी लड़ाई सबसे शक्तिशाली होती जा रही है। क्योंकि जिस पक्ष की कथा मजबूत होती है, वह दूसरे पक्ष के तथ्य को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकता है। सरकार की विफलता को विपक्ष ‘व्यवस्था की विफलता’ कह सकता है। सरकार उसी घटना को ‘विकास की कीमत’ कह सकती है। विपक्ष किसी आंदोलन को ‘जनता का गुस्सा’ कह सकता है।सत्ता पक्ष उसे ‘राजनीतिक साजिश’ कह सकता है। घटना वही रहती है, लेकिन उसका राजनीतिक अर्थ बदल जाता है।

लोकतंत्र के लिए असली चुनौती

धारणाओं की राजनीति अपने आप में लोकतंत्र विरोधी नहीं है। लोकतंत्र में विचार, भावनाएं, पहचान और राजनीतिक विश्वास स्वाभाविक हैं। खतरा तब पैदा होता है जब धारणा तथ्य की जगह ले ले। जब बेरोजगारी का आंकड़ा देखने की जगह यह पूछा जाने लगे कि आंकड़ा किस पार्टी के पक्ष में है। जब महंगाई पर चर्चा करने के बजाय यह तय किया जाने लगे कि इस मुद्दे को उठाने वाला देशभक्त है या देशविरोधी। जब किसी सरकार की नीति पर सवाल को सरकार के विरोध के बराबर मान लिया जाए। और जब किसी नेता की आलोचना को उसके समर्थक पूरे देश की आलोचना समझने लगें। लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब नागरिक यह पूछना बंद कर देता है कि ‘सच क्या है?’ और केवल यह पूछता है कि ‘मेरे पक्ष में क्या है?’

राजनीति को फिर मुद्दों की ओर लौटना होगा

भारत में राजनीति हमेशा भावनाओं और पहचानों से मुक्त नहीं रही है। आजादी के बाद से जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, गरीबी और सामाजिक न्याय जैसे सवाल चुनावी राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं। फर्क इतना है कि डिजिटल युग में इन मुद्दों को फैलाने, भावनात्मक बनाने और राजनीतिक धारणा में बदलने की गति कई गुना बढ़ गई है। इसलिए आज राजनीति केवल यह तय करने की लड़ाई नहीं है कि देश के लिए क्या किया जाए।यह उससे पहले यह तय करने की लड़ाई है कि देश के सामने समस्या क्या है। यही धारणा की राजनीति का मूल है। साल 2024 का चुनाव हमें एक महत्वपूर्ण सबक देता है। राम मंदिर जैसा सांस्कृतिक मुद्दा लाखों लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उसी मतदाता के लिए बेरोजगारी और महंगाई भी उतनी ही वास्तविक चिंता हो सकती है। लोकनीति के आंकड़े इसी जटिलता को सामने रखते हैं। इसलिए भारतीय राजनीति को समझने के लिए अब केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि कौन-सा मुद्दा बड़ा है? सवाल यह भी पूछना होगा— किस मुद्दे की कैसी धारणा बनाई जा रही है? कौन उसे मुद्दा बना रहा है? कौन उसे दबा रहा है? कौन उसे भावनात्मक बना रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण— क्या जनता जिस बात पर विश्वास कर रही है, वह तथ्य भी है? क्योंकि लोकतंत्र में धारणा महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतंत्र की अंतिम सुरक्षा तथ्य ही है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और सोशल और पोलिटिकल कमेंटेटर हैं।

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