डॉ रीटा अरोड़ा की लघुकथा : रील का जाल

 लघुकथा

रील का जाल

डॉ रीटा अरोड़ा

 

 

“राम-राम शर्मा जी!”

गुप्ता जी ने पार्क में आवाज़ दी।

शर्मा जी ने सिर उठाया भी नहीं।

वे मोबाइल पर रील देखने में व्यस्त थे।

पास की बेंच पर बैठे चार लोग भी अपने-अपने फोन में डूबे थे।

कभी इसी पार्क में हँसी-ठहाके गूँजते थे।

बच्चे खेलते थे, बुज़ुर्ग बातें करते थे।

अब सबकी उँगलियाँ चलती थीं, बातें नहीं।

एक दिन मोहल्ले में एक बुज़ुर्ग की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

लोग घरों में मौजूद थे, पर किसी को खबर ही नहीं लगी।

सब अपनी-अपनी स्क्रीन में खोए थे।

शाम को चर्चा छिड़ी तो एक बुज़ुर्ग बोले-

“पहले लोग पड़ोसियों का हाल पूछते थे, अब उनकी रीलें देखते हैं।”

सभी के सिर झुक गए।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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