संयमी, सूझवान, समर्पित और संघर्षशील मास्टर बलबीर सिंह

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 125

संयमी, सूझवान, समर्पित और संघर्षशील मास्टर बलबीर सिंह

सत्यपाल सिवाच

बलबीर सिंह ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें अध्यापकों, कर्मचारियों, किसानों और समाज में लगातार सबके साझले और न्यायप्रिय व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। मैं उन्हें लगभग 1983-84 से जानता हूँ। दोनों ने साथ-साथ काम भी किया है। निजी और सांगठनिक जीवन के अपने अनुभवों के आधार पर प्रामाणिक ढंग से कह सकता हूँ कि समाज में इतने सरल, सुदृढ़ और भरोसेमंद लोग विरले ही होते हैं। वे हर समय सच्ची, न्यायसंगत व गरीब हिमायती बात के लिए तैयार मिलते हैं। ऐसे असाधारण व्यक्ति से परिचय करवाते हुए स्वयं ही गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।

बलबीर सिंह का जन्म 1 मार्च 1959 को जीन्द जिले की नरवाना तहसील के गुरुसर गाँव में एक किसान परिवार श्रीमती आकोदेवी और श्री धन सिंह के घर में हुआ। वे पाँच भाई-बहन हैं। उन्होंने दसवीं कक्षा बाद के. एम. कॉलेज नरवाना में प्रवेश लिया और वहाँ से 1981 में बी.ए. उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने बी.एड. करके अध्यापन कार्य को अपनाया। वे 19 सितंबर 1981 को गणित अध्यापक नियुक्त हो गए तथा 28 फरवरी 2017 को मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए।

बलबीर सिंह से मेरी मुलाकात अस्थायी एवं बेरोजगार अध्यापक संघ को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सन् 1984 में उचाना कलां में एक बैठक में हुई थी। इस बैठक का आयोजन अमृत लाल चोपड़ा, फूलसिंह श्योकन्द और जगदीशराम विज्ञान अध्यापक के सहयोग से किया गया था। एक बार उनसे रिश्ता जुड़ा तो वह प्रगाढ़ व घनिष्ठ हो गया जो दूर रहते हुए भी विशेष तरह का भरोसा देता है।

बलबीर सिंह स्वभाव से न्यायप्रिय, मानवीय और सामाजिक सोच को मानने वाले हैं। वे सेवाएं नियमित करवाने, अन्य लाभों और शिक्षकों की रचनात्मक भूमिका को देखते हुए हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ और सर्वकर्मचारी संघ के आन्दोलनों में भाग लेने लगे थे। सन् 1984 में खण्ड प्रधान से शुरू करके सन् 2008 के हिसार सम्मेलन में वे अध्यापक संघ के राज्य प्रधान तक निर्वाचित किए गए। इस अवधि में वे लम्बे समय तक कैथल जिले के अध्यक्ष रहे। सर्वकर्मचारी संघ में भी उन्होंने खण्ड कलायत के प्रधान से शुरू करके राज्य कार्यकारिणी सदस्य तक अनेक जिम्मेदारियां निभाईं।

उनमें प्रत्येक शिक्षक व कर्मचारी से जुड़ने व संगठन चलाने का इतना हुनर है कि कलायत खण्ड रादौर, सिवानी और रतिया के साथ राज्य के चार श्रेष्ठतम खण्डों में शामिल रहता था। उन्हें किसान आन्दोलन के दौरान बद्दोवाला टोल पर सफलतापूर्वक किसान-मजदूरों को जोड़ने का भी श्रेय मिला है। यही वजह है कि अब उन्हें लगातार दूसरी बार अखिल भारतीय किसान सभा का राज्याध्यक्ष चुना गया है।

संघर्ष के मोर्चे पर उनकी कुछ विलक्षण बातें हैं। वे बहुत शांत स्वभाव के हैं; संयम और धैर्य के साथ हस्तक्षेप करते हैं तथा तथ्यों व तर्क से अपनी बात विनम्रता से कहते हैं। उन्हें बहलाना, टरकाना या उकसाना संभव नहीं है। वे अपने स्वभाव की मूल प्रकृति से ही पंचायती हैं। आमतौर सर्वानुमति बनाने का प्रयास करते हैं।

यही वजह है कि संयुक्त किसान मोर्चे अथवा अन्य साझा मंचों पर वे लोग भी उन्हें सम्मान देते हैं जो संगठन के तौर पर असहमत होते हैं। कोई बड़ा अधिकारी, पुलिस, प्रशासन अथवा मंत्री अपने प्रभाव या दबाव से उन्हें अपनी राह से नहीं डिगा सकता। राज्य अतिथि शिक्षक तो उन्हें अपने गार्जियन की तरह मानते हैं।

जब भी लड़ाई चलती है, बलबीर सिंह बेखौफ होकर आगे रहते हैं। इसी के चलते उन्हें कई बार दमन, उत्पीड़न और कष्ट उठाने पड़े। वे अप्रैल 1987 में 14 दिन, 28.04.1988 से 07.05 1988 तक 10 दिन, 7 मार्च 1991 से 29 मार्च 1991 तक 23 दिन, 28.10.1993 से 4 नवम्बर 1993 तक 7 दिन और जनवरी 1997 में 9 दिन – कुल सात बार में 63 दिन जेल में रहे। उन्हें 1987 और 1993 की हड़तालों के दौरान सेवा से बर्खास्त किया गया था।

उसके अलावा प्रदर्शनों के समय पुलिस भिड़ंत में वे अनेक बार लाठीचार्ज के शिकार हुए और हिरासत में लिए गए। दमन और उत्पीड़न की सभी कार्रवाइयां आन्दोलनों के समझौते के साथ निरस्त होती रही।

अध्यापक आन्दोलन और संगठन को सर्वकर्मचारी संघ के साथ मिलकर लड़ने का बहुत लाभ हुआ। साझा संघर्ष के प्रभाव के चलते अध्यापकों में भी असर बढ़ा। मनोबल ऊँचा हुआ तथा उन इलाकों में भी संगठन बन गया जहाँ पहले कुछ नहीं था। बलबीर सिंह बहुत स्वाभिमानी किस्म के शख्स हैं। उन्हें अनेक नेता और आला अधिकारी निजी तौर पर जानते हैं लेकिन कभी स्वार्थ के लिए किसी दरवाजा नहीं खटखटाया। जब भी वे शासन से मिलते हैं तो कोई सामूहिक या न्यायसंगत मसअला होता है। सामने वालों को भी यह पता होता है। वे संगठन में आलोचनात्मक समीक्षा करने के अभ्यस्त हैं, इसलिए गलतियां होने की संभावना कम रही है।

वे महसूस करते हैं कि पहले के समय पर ऐक्यभाव मजबूत था, जबकि अब “पहचान की राजनीति” अथवा महत्वाकांक्षी नेतृत्व के कारण दर्जनों संगठन खड़े हो गए हैं। दूसरे आर्थिक लाभ के लिए “मंजिल पर ही डेरे डाले जाएंगे” जैसे आन्दोलन भी अनुपस्थित हैं। लड़ाई कुछ हासिल करने की बजाय “बचाने” पर केन्द्रित होकर रक्षात्मक हो गई है। उनका सुझाव है कि अब एकता की जरूरत कहीं अधिक है। इसलिए एक हों; सामूहिक मुद्दे चिह्नित करें और दूरगामी योजना के साथ लड़ाई शुरू करें। किसान आन्दोलन ने नया अनुभव जोड़ा है।

उन्हें अपने परिवार से आन्दोलन के दौरान बहुत सकारात्मक सहयोग और ऊर्जा मिली है। मार्च 1985 में उनका विवाह श्रीमती दयावन्ती के साथ हुआ। वे भी शिक्षा विभाग में अध्यापिका रही हैं। इनकी एक बेटी और दो बेटे हैं। बेटी किरण ने रसायन शास्त्र में एम.एससी. की है। बेटा अजय बी.टेक के बाद जीएसटी इंस्पेक्टर के रूप में केंद्रीय सेवा में है और दूसरा विजय भी बी.टेक किया है और बीएसएनएल में जूनियर इंजीनियर है।

लेखक – सत्यपाल सिवाच

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