(प्रस्तुत लेख में भी हमने पाठकों की सुविधा का ध्यान रखा है। इसको दो किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। आज पढ़िए ‘खाली कमरा’ ‘नक्कारखाना’ और रेल की रोमांचक ‘यात्रा’ की संक्षिप्त विवेचना-संपादक)
साहित्य आलोचना के सरोकार
पुस्तक समीक्षा – सेवा नगर कहां है
‘सेवानगर’ : मानवीय त्रासदी के ज़ख्म और पीड़ा (भाग-1) : कथा समीक्षा
ओमसिंह अशफ़ाक
ज्ञान प्रकाश ‘विवेक’ की ज़्यादातर कहानियों में त्रासदी साक्षात मौजूद रहती है और अन्यों में उसके पदचिन्ह नज़र आ जाते हैं। इस तरह उन्हें त्रासदी का कुशल-कथाकार भी कहा जा सकता है।
विचाराधीन संग्रह- ‘सेवा नगर कहाँ है’ में कुल बारह कहानियाँ हैं, जिसे भारतीय ज्ञानपीठ ने सन् 2007 में प्रकाशित किया था। ज़ाहिर है इनका कथ्य 6 से 66 साल पुराना हो सकता है।
लेकिन क्या साहित्य कभी पुराना होता है? शायद नहीं! यदि ऐसा होता तो हम आज ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ नहीं पढ़ रहे होते? बल्कि किन्हीं खास परिस्थितियों में तो खास साहित्य ज़्यादा उपयोगी हो जाता है।
जैसे-सांप्रदायिकता के उभार के दौर में; देश-विभाजन की घटनाओं पर लिखा हुआ साहित्य हमें उसके भयंकर परिणामों की याद दिलाता है ताकि हम संभल जायें और फिरकापरस्ती के प्रवाह में न बहें।
‘विवेक’ की अनेक कहानियों की पृष्ठभूमि में भी विभाजन (1947) का दंश मौजूद है।
विभाजन की त्रासदी की कथा और किस्से अपना तमाम रंजोगम लिए हुए पूर्ण पठनीयता के साथ विवेक की कहानियों में हमें मिलते हैं।
उनकी भाषा में एक खास नफासत और रवानगी देखी जा सकती है जिसे उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी के बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले शब्द और ज्यादा निखारकर धारदार बना देते हैं, जैसा कि हमें संग्रह की कहानियों पर विश्लेषणात्मक चर्चा करते हुए, उद्धृत अंशों में दिखायी पड़ेगा।
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कहानी- ‘खाली कमरा’ और ‘नक्कार खाना’ दोनों ही देश-विभाजन की यादों को समेटे हुए हैं। पहली कहानी में कथाकार अहमद बख़्श साहब की मेज़ और अपने पिता की स्मृति के सहारे बंटवारे की पीड़ा का सटीक और विश्वसनीय चित्रण प्रस्तुत करता है।
पिता अपनी जन्मभूमि के उस हिस्से से विस्थापित होकर आये हैं जो अब पाकिस्तान कहलाता है और अहमद बख़्श उस घर से उजड़कर पाकिस्तान गये हैं जहाँ अब कहानीकार का पिता और शेष तीन भाइयों का परिवार रहता है।
लेखक को लगता है कि “वह मेज़ और किताबें जानबूझकर छोड़ गया है कि बच्चे अपनी किताबें इस मेज पर रखें और इल्म हासिल करें।
तीन किताबें- ‘बुलबकावली’, ‘बागो बहार’ तथा ‘गालिब का दीवान’ पिता के लिए नायाब किताबें थीं। पिता बड़ी संजीदा आवाज में शे’र पढ़ते-“कावे-कावे-सख़्त जाना, मेरी तन्हाई ना पूछ..”
ऐसा लगता था जैसे पिता अपनी तन्हाई, दर्द और बेकरारी उस अहमद बख़्श को बयान कर रहे हैं जो इस मकान को छोड़कर चला गया था।
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इस सकारात्मक और विश्वसनीय चित्रण से सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि ‘पिता अपने दिल में खुद की ही नहीं, उस अहमद बख़्श की पीड़ा एवं विवशता को भी उतनी ही शिद्दत से महसूस करते हैं जिसे इस घर को छोड़कर जाना पड़ा है।
यही पीड़ा एक बार फिर ‘पिता’ के मन को सालती है जब लेखक इस घर को छोड़कर अपने अलग घर में चला जाता है और जाने से पहल अंत में ‘खाली कमरे’ का निरीक्षण कर रहा होता है।
तभी पिता के आगमन पर वह उनके मन को तसल्ली देने हेतु कहता है-“मैं इसलिए जा रहा हूँ बाऊजी….कि जगह कम थी।” लेकिन पिता तो असलियत समझते हैं इसलिए प्रत्युत्तर में कहते हैं- “जगह कम नहीं थी…दिल तंग थे।”
उपरोक्त संवादों में ऐसा दर्द छलकता है जैसे एक बार फिर विभाजन की त्रासदी, किंचित संक्षिप्त रूप में दोहरायी गई है। एक बेटा विभाजन की अफरातफरी में (1947) में कहीं छूट गया था, दूसरा अब परिवार से छिटक रहा है।
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‘नक्कारखाना’ शीर्षक कहानी तो जैसे देश-विभाजन की त्रासदी की जीती जागती तस्वीर है। किला-मोहल्ला का सुनसान नक्कारखाना रोहतक, बहादुरगढ़, शाहबाद, अंबाला कहीं भी हो सकता है।
जिसको विस्थापितों ने यहाँ आकर फिर से आबाद किया था। भरी पूरी चहल-पहल रहती थी। एक पूरा संसार और बाजार नक्कारखाने में ही चलता था।
जिसमें दयाल चायवाला, शाम गुड़गट्टेवाला, शेरू भटूरेवाला, लक्ष्मण नाई, जीवनदास (हरफ़नमौला) और जमनादास मास्टर, तीरथराम मरीज़ और पगली गर्भवती सबको आश्रय नक्कारखाने में मिलता था।
सब अपने दुख-सुख सांझे करते, लड़ते-झगड़ते पिछले मुल्क और बीते वक्तों की यादें बांटते, शे’रो शायरी और काफ़िया गाते-सुनते, वही नक्कारखाना एक बार फिर सुनसान हो गया है।
पगली अपने बच्चे को लेकर कहीं निकल गयी। तीरथराम तपेदिक से मर गया है और अंत में जीवनदास भी वहीं प्राण त्याग करता है। नक्कारखाना फिर सुनसान हो जाता है :
“तीरथराम मरा तो नक्कारखाना चुपज़दा हो गया। परिंदे फड़फड़ाते तो गुमान होता जैसे यह मौत की आहट है। मैली, गिच्च रजाई के भीतर एक पार्थिव शरीर और नक्कारखाने में गुमनाम सी खामोशी।
फिर एक शब्द उभरा-दाहसंस्कार। अव्यक्त-से फैसले हुए लोगों के बीच। लक्ष्मण नाई ने चबूतरे पर बिछाया सफेद कपड़ा। पांच का नोट रखा।
उसने पांच रखे तो दयाल ने दो। किसी ने तीन। पैसे इकट्ठे हुए। कफन दफन की तैयारी। ‘राम नाम सत है’ के साथ शवशत्रा निकली।”
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“एक बार ऐसी बहस हुई कि जिंदगी और मौत जैसे विषय पर नशिस्त आयोजित कर डाली। चबूतरे से एक शे’र जिंदगी पर सुनाया जाता, दूसरा मौत पर। सबसे पहले मास्टर साहिबराम ने शे’र सुनाया :
हो चुकीं गालिब बलाएँ सब तमाम,
एक मर्गे-नागहानी और है।
जीवनदास ने जवाब दिया:
फुरसत के वक्त मिलना कभी मुझसे ऐ कजा,
तुझको भी काम है अभी मुझको भी काम है।
लक्ष्मण नाई को भी शे’र याद आ गया:
चला जाता हूँ हंसता-खेलता मौजे-हवादिस से।
अगर आसानियाँ हों जिंदगी दुश्वार हो जाए।
फिर किसी ने शेर सुनाया :
कैदे-हयात-ओ-बन्दे-गम असल में दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों?
शामू गुड़गट्टेवाले ने एक शेर सुनाया:
मौत का एक दिन मुअय्यन है। नींद क्यों रात भर नहीं आती।
“अजीब थे ये लोग। ठठ्ठाकर हंसते। घर याद आते तो रूमाल भिगो देते। मस्ती चढ़ती तो लोकगीत गाते। गमगुसार होते तो फिर यादों के संदूक खोल बैठते।
चबूतरे पर दो जन मिलकर बैठे एक-दूसरे को देखते। खुद-ब-खुद याद की कोई पतंग कटकर बीच में आ गिरती-खूब गाता था हबीब। एक कहता, दूसरा सिर हिलाकर ताईद करता।
पहला हबीब को याद करने लगता, ‘यार, ऐसे लगता है जैसे कल की बात हो..रामलीला के दिन। राम बनवास लीला। और हबीब।
पहला चुप होता। दूसरा उसे देखने लगता। पहला गहरी सांस लेकर कहता, ‘कितने हिलमिल के रहते थे यार! कोई सोच सकता था ऐसे बंट जाएँगे..यार मत पूछ।
घर छोड़कर रात के वक्त जब हम भाग रहे थे, हबीब सौ के करीब पूरियाँ बाँधकर ले आया था। इसरार करता रहा हमने रख लीं। जान के लाले पड़े थे यार। पूरियों को कौन पूछता।
अमृतसर पहुँचे तो पूरियों का ध्यान आया और हबीब…आज भी ऐसे लगता है जैसे रामलीला की स्टेज के पीछे परदे के पास, पेटीमास्टर दीवान चंद की बगल में बैठा हबीब गा रहा हो:
“‘राज के बदले माता जी मुझको, दे दिया हुकुम फकीरी का…
रात की खामोशी में हारमोनियम के सुरों के साथ हबीब ऐसा दर्द भरा गीत गाता कि लोगों की सिसकियाँ फूट पड़तीं..।”
“कलन्दर भी क्या शै था यार!” कोई बुजुर्ग याद करते हुए कहता, “कलन्दर…कुएँ खोदता था हमारे शहर में। आवाज का जादू कोई दरवेश दे गया था उसे। इतनी लम्बी तान…साँस खत्म ही नहीं होती थी जनाब।
शरवन कुमार ड्रामे में शरवन बनता अख़्तर और परदे के पीछे खड़ा होकर गाता कलन्दर- “जालिम मैंने तेरा क्या बिगाड़ा…
तीर सीने में क्यों तूने मारा… बस्स, आँख में-आंसू थरथराते और सीने में दिल….”
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उपरोक्त उद्रत अंशु से पता चलता है कि वहाँ भी (पाकिस्तान में) हिंदू और मुसलमान रामलीला और ड्रम सब मिलकर खेलते गाते थे और जातीय-मज़हबी नफ़रत जैसी कोई बात थी ही नहीं।
फिर क्यों जनता पर विभाजन थोपा गया और उन्हें “अप्राकृतिक त्रासदी” में झोंक दिया गया? इसके कारणों पर सोचने विचारने का अवसर भी यह कहानी पाठकों को दे जाती है।
और हिंदू-मुस्लिम के बीच मन घड़न्त बैर-दुश्मनी के मिथ्या प्रचार की पोल-पट्टी खोल देती है जिसके सहारे आज भी कुछेक राजनीतिक दल अपना ‘सत्ता का उल्लू’ सीधा करने में जुटे हुए हैं।
इस रूप में यह कहानी “विभाजन की त्रासदी” का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाती है। इससे स्पष्टतः यह सबक भी मिलता है कि जनता को झूठे सांप्रदायिक प्रचार से सावधान होकर बचना चाहिए।
और उसका विरोध करना चाहिए ताकि फूटपरस्त ताकतें जनता को गुमराह करने और उसकी ऐकता को तोड़ने में सफल न हो सकें।
इस रूप में यह महत्वपूर्ण कहानी है जो आपसी सहयोग, परस्परता और सामुदायिकता की भावना को दर्शाती है।
और 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से विस्थापित होकर आई “पंजाबी आबादी” के जीवन के उन पहलुओं से हमें परिचित कराती है जिससे मूल-हरियाणवी पीढ़ियां अभी तक भी अनभिज्ञ रहे हो सकते हैं।
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‘यात्रा’ कहानी में लेडी डॉक्टर और ‘हमारे स्कूल की मैडम’ में नन्दिनी के रूप में लेखक ने दो वीरांगनाओं का चित्रण किया है। ये दोनों पात्र यथार्थ के धरातल पर सृजित हैं।
सिरसा एक्सप्रैस में सफ़र करते समय एक बीमार वृद्ध को सीट पर जाने का रास्ता न देने के कारण डेली पैसेंजरों की ताश खेलती-मंडली के सरदार के साथ एक यात्री लेडी डॉक्टर की हाथापाई हो जाती है।
तब इस धीरोदात्त नायिका का साहस और विवेक देखते बनता है। यह इस वाहियात-मंडली की चादर उठा फेंकने से पहले बाकायदा उनसे पहले अनुरोध और फिर चेतावनी देती है।
मगर वे तो “समूह के घमंड” में चूर हैं इसलिए ताश की बाजी में बेतरह मशगूल हैं। आखिर नायिका ने उन्हें अच्छा सबक सिखाया और इंसानियत का सीधा रास्ता दिखाया।
निम्न अंशों में कहानीकार की नज़र से पूरा प्रसंग दिख जायेगा :
“ताश खेलते डेली पैसेंजर बेमुरब्बत और खुरदरे किस्म के थे। वे ताश खेलते हुए ठहाके लगाते। एक-दूसरे का मजाक उड़ाते। एक-दूसरे को गालियां देते और चोरी छुपे खिड़की के पास बैठी खूबसूरत स्त्री को भी देख लेते।”
“स्त्री सुशिक्षित, विनम्र, संवेदनशील नजर आती थी। वह तीस-बत्तीस साल की होगी या फिर इससे कुछ कम की। वह युवा थी। आकर्षक और आधुनिक थी।
उसके कपड़े भी उसकी सौम्यता के अनुसार थे। उसने साड़ी पहन रखी थी। उसकी गोद में बच्चा था। वह दो-ढाई साल का होगा।
बच्चा चंचल था और बहुत मासूम भी। वह उत्साह से भरकर माँ से लिपट जाता। मां के गाल से अपने गाल सटा देता।”
“बूढ़े को अब तक किसी ने जगह नहीं दी थी। वह खड़ा था। खड़ा क्या था ऐसा लगता था उसने अपने पुराने शरीर को, दर्द के हैंगर पर टाँग रखा है। वह अपनी बीमारी से परेशान था। वह भीड़ से तंग था। लोगों की निस्संगता पर हैरान था।”
“स्त्री ने कुछ पल बाद फिर बूढ़े को देखा। उसने कुछ सोचा। कुछ निर्णय लिया। बच्चे को उसने गोद से उतारकर सीट पर बिठाया। उठकर उसने दृढ़ लेकिन शिष्ट भाषा में कहा, “बाबाजी, आप यहाँ आ जाइए।”
“स्त्री के इस एक वाक्य से ताश खेलते लोगों में खलबली मच गयी। वे खुसर-पुसर करने लगे। उन सबको स्त्री पर गुस्सा आया। एक तो दबी जुबान में बोला, “साली़, मदर टेरेसा बन री सै।”
दूसरे ने क्षुब्ध होकर कहा, “जगै है कहीं?…म्हारे सिर पे बिठावेगी?” तीसरे ने दूसरे की बात का समर्थन किया। वे सब एक-दूसरे की बात का समर्थन कर रहे थे।”
“ट्रेन चल रही थी। कोई स्टेशन था। रन थ्रू ट्रेन। पीछे छूटता स्टेशन। कांटा बदलते ट्रेन के पहिये। कई सारी आवाजें। हल्का-सा झटका। कमजोर बूढ़े का डगमगना। स्त्री का देखना… ताश का खेल…ताश के खिलाड़ी।
बूढ़े ने एक बार फिर लरजती हुई आवाज में कहा, “भाई, थारा खेल कोनी बिगड़े। एक बै मन्ने आ जाँण देओ।”
“गेम हो जाँण दे।” ताश खेलते एक खिलाड़ी ने रूखेपन से कहा
“अचानक बूढ़े के पेट में बहुत तेज दर्द उठा। वह कराह उठा।… बूढ़ा दर्द से परेशान था और ताश खेलनेवाले बूढ़े से….।
“स्त्री ने बच्चे से खेलना छोड़ दिया वह लगातार बूढ़े को ऑब्जर्व करती रही।”
“दो स्टेशन गुजर गये थे। बूढ़ा खड़े-खड़े थक चुका था। पेशाब की थैली और झोला संभाले हुए वह बूढ़ा अपने आपको नहीं संभाल पा रहा था।
स्त्री ने ताश खेलते लोगों से एक बार फिर आग्रह किया लेकिन वे स्त्री के आग्रह को अनसुना कर गये।
स्त्री क्षुब्ध हो उठी थी। उसने लगभग ललकारते हुए कहा, “चादर को हटाइए!…बाबाजी को आने दो…नहीं तो मैं हटा दूंगी इस चादर को…”
और स्त्री (महिला डॉक्टर) ने एक कोना पकड़कर चादर हवा में उछाल दी तो ताश के पत्ते चारों तरफ बिखर गये और फिर वही सब हुआ जिसका हमने शुरू में उल्लेख किया है।
खैर, स्त्री ने बूढ़े को अपनी सीट पर बैठाया, दवाई खिलायी और बूढ़े की जान-में-जान आयी।
“पर बेटी तू करै के सै?” -बूढ़े ने जिज्ञासावश पूछा।
“बाबाजी, मैं डॉक्टर हूँ।” स्त्री ने कहा
ताश के खिलाड़ियों ने स्त्री की बात सुनी। चौंक से गये। उन्होंने स्त्री को देखा। लेकिन इस बार देखने का भाव दूसरा था।
“बेटी तू अकेली…तेरा आदमी?” बूढ़े ने फिर पूछा।
“बाबाजी, वो फौज में कैप्टन थे।” -स्त्री ने कहा
ताश के खिलाड़ियों के हाथ रुक गये।
“थे!…थे का के मतलब होया बेटी?” बूढ़े ने झिझकते हुए पूछा वह कुछ सशंकित हुआ।
“डेढ़ साल पहले…कश्मीर में टेरेरिस्ट के साथ लड़ते हुए मारे गये।” -स्त्री के स्वर मंे उदासी थी। उसने सिर झुका लिया।
“ओह!” बूढ़े के मुंह से निकला, “बेटी, वो मरे नहीं…शरीद हो गये।” बूढ़े का स्वर भीगा हुआ था।
“हाँ बाबाजी।” स्त्री ने कहा, वही उदास स्वर।
ताश खेलनेवाले स्तब्ध रह गये। ताश के पत्ते उनके हाथ से फिसले। चादर पर जा गिरे। वे सब चुप हो गये। एकदम चुप। न हंसी न ठठ्ठा। न गाली न फब्ती। केवल खामोशी। बूढ़े ने स्त्री के सिर पर हाथ रखा। आशीर्वाद दिया।
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ट्रेन नयी दिल्ली स्टेशन पहुँची। स्त्री उठ खड़ी हुई। उसके पास काफी सामान था जो सीट के नीचे रखा था। और ऊपर वाली बर्थ पर भी।
स्त्री ने बच्चे को उठाया। बर्थ पर रखे सामान को उठाने लगी तो कई सारे हाथ आगे आ गये। किसी ने अटैची उठायी तो किसी ने बैग, किसी ने डोलची तो किसी ने झोला।
स्त्री विस्मित नजरों से देखती रही। वे सब ताश खेलनेवाले अक्खड़, खुरदरे, हेकड़ीबाज! वे सब सामान उठाये, आगे-आगे और पीछे स्त्री, अपने बच्चे को लिये हुए। वे सब बोल रहे थे, “मैडमजी, आप फिकर मत न करो। जहाँ कहोगे, आपको वहाँ छोड़ के आएँगे।”
स्त्री का सामान गेट तक पहुँचाकर उन्होंने सत्री से माफी मांगी और स्त्री ने उनके साथ हाथ मिलाते हुए कहा “वी आल आर फ्रेंडस!…वह एक बुरा एपीसोड था…अब खत्म हुआ।”
(शेष शीघ्र ही ‘दूसरी किस्त’ में)
(मूल लेख 2014,अपडेटेड-संपादित 2026)
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