ईंधन के विकल्प तलाशना समय की जरूरत 

ईंधन के विकल्प तलाशना समय की जरूरत

कुलभूषण उपमन्यु

ईरान, इस्राइल-अमेरिका युद्ध ने वैश्विक स्तर पर खनिज तेल आधारित उर्जा व्यवस्था को डांवाडोल कर दिया है. भारतवर्ष पर इसका ख़ासा असर होना स्वाभाविक है क्योंकि हमारी 85% उर्जा जरूरतें आयात के माध्यम से ही पूरी होती हैं और इसका बड़ा भाग मध्य पूर्वी देशों से ही आता है. होर्मुज़ जलडमरू मध्य से समुद्री नौवहन में युद्ध के कारण आई रुकावट के चलते यह स्पष्ट हो चुका है कि इस तरह की स्थितियां देश की घरेलू, औद्योगिक, और सैनिक जरूरतों के लिए घातक साबित हो सकती हैं. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में युद्ध के चलते खनिज तेल की कीमतें दुगनी हो चुकी हैं.

सरकार ने अभी तक तो घरेलु उर्जा जरूरतों पर बढ़ी हुई कीमतों का उतना असर नहीं होने दिया है किन्तु लंबे समय तक ऐसा कर पाना संभव नहीं होगा. इस समस्या के दीर्घकालीन समाधान को ध्यान में रख कर ही सरकार ने एथनोल को पेट्रोल में मिला कर पेट्रोलियम पदार्थों की मांग कम करने का प्रयास शुरू किया है और एथनोल के प्रयोग को लगातार बढ़ाते जाने की योजना पर काम हो रहा है. लेकिन इसकी भी सीमा है जिससे आगे एथनोल उत्पादन संभव नहीं होगा.

हमारे पास और भी संसाधन हैं जिनके योजनाबद्ध उपयोग से हम उर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता में बड़ा योगदान कर सकते हैं. हमारे पास कृषि अपशिष्ट और गोबर का प्रचुर भंडार है, जिससे मीथेन, सी एन जी, पी एन जी, बना कर खनिज तेल की आयात जरूरतों को कम किया जा सकता है. फ़िलहाल उपलब्ध गोबर का उपयोग करने पर क्या स्थितियां बनेंगी इस पर विचार करते हैं.

देश में 2025 की पशु गणना के अनुसार 193.50 करोड़ गोवंश और 109.85 करोड़ भैंस हैं. कुल 303.35 करोड़ ऐसा पशुधन है जिनके गोबर से मीथेन गैस बनाई जा सकती है. एक किलो मीथेन गैस बनाने के लिए लगभग 30 किलो गोबर चाहिए, जो हमें दो पशुओं से दैनिक प्राप्त हो सकता है. इस तरह 150 करोड़ किलो गैस प्रतिदिन बनाई जा सकती है.

साल में कुछ कमी बेशी को छोड़ दें तो 300 दिन का गिनते हैं. इससे 45000 करोड़ किलो गैस प्रतिवर्ष बनाई जा सकती है. इसको टन में बदल लें तो 45 करोड़ टन हुए. एक सिलिंडर में 15 किलो गैस के हिसाब से एक टन से 66 सिलिंडर भरे जा सकते हैं. 45 करोड़ टन से 2970 करोड़ सिलिंडर भरे जाएंगे. देश की आबादी को 140 करोड़ मानते हुए, औसत 5 प्राणियों का परिवार मानते हुए 28 करोड़ परिवार हुए. यदि हर महीने प्रति परिवार एक सिलिंडर की खपत मान कर चलें तो 12 महीने में 336 करोड़ सिलिंडर की खपत होगी. जबकि हमारे पास संसाधन 2970 करोड़ सिलिंडर भरने की है. यानि इस क्षमता का 15-20% दोहन भी कर लिया जाए तो घरेलू खपत को पूरा किया जा सकता है और इससे आगे व्यवसायिक खपत की भी गुंजाईश रह जाती है.

हर घर में गोबर गैस प्लांट बनाना शायद संभव नहीं होगा किन्तु कुछ में तो संभव होगा. शेष संसाधन को वाणिज्यक स्तर पर बड़े और आधुनिक तकनीक पर कार्य करने वाले गोबर गैस प्लांट बना कर उर्जा सुरक्षा की ओर आत्मनिर्भर कदम बढ़ाया जा सकता है, और आयात बिल और विदेशी मुद्रा को भी बचाया जा सकता है. जिस तरह एथनोल उत्पादन कार्य को गंभीरता से तेज़ गति से बढ़ाया गया है यदि उसी भावना से गोबर गैस उत्पादन को भी वाणिज्यक स्तर पर प्रोत्साहन दे कर आगे बढ़ाया जाए तो बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है. इससे किसानों को भी गोबर उपलब्ध करवाने के बदले अतिरिक्त कमाई हो सकती है. इस प्रक्रिया में गैस तो निकल जाति है, शेष गोबर, डाईजेस्टर में अच्छी तरह सड़ कर बाहर आता है जो ज्यादा गुणवत्ता पूर्ण खाद होता है.

इसके अलावा फसलों के अपशिष्ट, पराली या गेंहूँ के अपशिष्ट भी सी एन जी, पी एन जी बनाने के लिए उपयोग कर लिए जाएं तो काफी बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस के आयात में कमी आ सकती है. फसल अपशिष्ट से सी एन जी बनाने के कुछ संयंत्र तो शुरू भी हो चुके हैं. इन सब कामों के लिए तकनीक तो हमारे पास उपलब्ध ही है केवल राजनैतिक इच्छा शक्ति और दृढ़ संकल्प से आरंभ करने की बात है. फसल अपशिष्ट इस तरह इस्तेमाल कर लेने से उन्हें जलाने के कारण होने वाले प्रदूषण और उससे होने वाली बिमारियों और असमय मौतों से भी बचा जा सकता है. इस कार्य में भी कुछ कठिनाईयां तो आयेंगी किन्तु अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक गुलामी से मुक्ति भी तो मिलेगी.

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