टीएमसी की पाप की लंका में सीपीएम भागीदार नहीं: मोहम्मद सलीम
– ममता बनर्जी के प्रस्ताव पर माकपा नेता ने किया तीखा हमला
सिलीगुड़ी। बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की सियासत को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। 15 साल बाद सत्ता गंवाने और 80 सीटों पर सिमटने के बाद तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का दांव चला है।
दीदी ने लेफ्ट को दिया साझा मंच पर आने का प्रस्ताव
तृणमूल सुप्रीमो ने वामपंथी दलों (वाममोर्चा) को भाजपा के खिलाफ साझा मंच पर आने का प्रस्ताव दिया, लेकिन माकपा ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है. माकपा राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा को बंगाल में लाने के लिए ममता बनर्जी की नीतियां ही जिम्मेदार हैं, ऐसे में उनके साथ हाथ मिलाने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
ममता का यूनाइटेड फ्रंट का दांव और माकपा का वार:
चुनावी हार और भाजपा की 207 सीटों वाली प्रचंड जीत के बाद ममता बनर्जी ने विपक्षी एकता की बात छेड़ी थी. उन्होंने अपील की थी कि लोकतंत्र और बंगाल की अस्मिता बचाने के लिए सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों को, जिसमें वामदल भी शामिल हैं, एक साथ आना चाहिए।
सलीम ने प्रस्ताव को बताया ममता बनर्जी का राजनीतिक ढोंग:
मोहम्मद सलीम ने इस प्रस्ताव को ‘राजनीतिक ढोंग’ करार दिया. उन्होंने कहा- ममता बनर्जी ने ही बंगाल में वामपंथ को खत्म करने के लिए भाजपा का रास्ता साफ किया था. आज जब वे खुद संकट में हैं, तो उन्हें हमारी याद आ रही है. टीएमसी और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
तृणमूल कांग्रेस ही भाजपा की असली मददगार : माकपा
माकपा और अन्य वामपंथी दलों ने इस इनकार के पीछे ठोस तर्क दिये हैं. माकपा नेताओं का मानना है कि टीएमसी के साथ गठबंधन करने से उनकी बची-कुची साख भी खत्म हो जायेगी, क्योंकि जनता टीएमसी के भ्रष्टाचार और ‘सिंडिकेट राज’ से तंग आकर ही भाजपा की ओर मुड़ी है।
आरजी कर कांड की टीस और स्वतंत्र पहचान:
चुनाव प्रचार के दौरान आरजी कर अस्पताल की घटना और महिला सुरक्षा के मुद्दे पर वामपंथी दलों ने ममता सरकार को जमकर घेरा था. ऐसे में अचानक हाथ मिलाना उनके कैडर को स्वीकार्य नहीं होगा. वाममोर्चा अब भाजपा के खिलाफ एक ‘तीसरे विकल्प’ के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान दोबारा बनाने की कोशिश में है, न कि टीएमसी की बैसाखी बनने में।
विपक्ष में भी मची है ‘रार’:
बंगाल की नयी विधानसभा में अब भाजपा सत्ता पक्ष है, जबकि टीएमसी मुख्य विपक्षी दल. लेकिन वामपंथियों के इस इनकार ने ममता बनर्जी की उस रणनीति को बड़ा झटका दिया है, जिसके जरिये वे केंद्र और राज्य की नयी सरकार को ‘संयुक्त विपक्ष’ के नाम पर घेरना चाहती थीं. माकपा का मानना है कि ममता बनर्जी अभी भी हार स्वीकार नहीं कर पा रही हैं और ‘साजिश’ के आरोपों के पीछे अपनी विफलताओं को छिपा रही हैं।
बंगाल में काम नहीं कर रहा ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त’ वाला फॉर्मूला:
बंगाल की राजनीति अब ऐसे मोड़ पर है, जहां ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त’ वाला फॉर्मूला फिलहाल काम करता नजर नहीं आ रहा है. माकपा ने साफ कर दिया है कि वे सदन से सड़क तक भाजपा का विरोध करेंगे, लेकिन ममता बनर्जी के झंडे के नीचे कभी नहीं। अशोक झा की फेसबुक वॉल से साभार
