औकात पीस्से की

हरियाणवी व्यंग्य

औकात पीस्से की

रणबीर सिंह दहिया

जिसा जनमदिन उनका हुया सबका होवै उसा। जलण आले जल्या करैं। जिनके धौरै सै वे क्यों ना धूम धाम तै मनावैं बर्थडे। हम तो कहवांगे अक हरेक अपनी घरआली नै उतना ए प्यार करै जितना उननै करया। घरआली का जनमदिन आया तो सीधी दो सौ करोड़ की एयरबस दे दी गिफट मैं। बीबी नै कसूती भागी या गिफट। इस मौके पै उननै वो गीत गाया ‘हर खुशी हो वहां, तू जहां भी रहे’। भीतर तै यार दोस्त कसूत जल भुनगे पर बाहर तै खुश दिखाई दिये। एक ने तो कसम खाली अक अपनी बीवी नै इसतै आगे की चीज द्यूंगा।

बीवी की फरमायस बी आगी अक मनै जम्बो खरीद कै दियो मेरे जनम दिन पै। या ईर्ष्या बी हैसियत के मुताबिक होवै सै आजकाल। जिसके धोरै दुनिया की सबतै ज्यादा दौलत हो वो अपनी बीवी नै तोहफे मैं क्यों देवैगा पांच रुपये का लाटरी का टिकट कै सागर विल्ला मैं लंच। ये सब चीज तो आज काल के गामौली मौलड़ करना सीख लिये।

देश के सबतै बड्डे अमीर की तो पुरानी पैंट बी हजारां मैं बिक ज्यागी। हैसियत मतलब औकात का मामला सै भाई। आई किमै समझ मै? हरियाणा मैं या औकात आजकाल ब्याह शादियां मैं देखण मैं आवै सै। जो बड्डे लोग होंसैं वे बड्डी बात करया करैं। म्हारे बरगे छौटी औकात के लोग उनकी नकल बी करैंगे अर उनकी नुक्ताचीनी बी करैंगे। या नुक्ताचीनी बी एक परफोरमैंस सी बनकै रहगी।

असल मैं या नुक्ताचीनी भी म्हारी निष्क्रियता मैं भरी निराशा तै न्यारी कुछ नहीं। जै ईर्ष्या करनी सै तो ढंग तै करो। वा आलोचना बी बनै। इस बुराई नै पलटन खातर कुछ हाथ पैर बी मारे जां। फेर न्यों कहवैंगे म्हारी के औकात, म्हारी कौन सुनैगा। अर जै कदे औकात हो बी ज्या तो सैड़ देसी औकात दिखावण पै आ ज्यांगे। अर न्यों कहवैंगे अक हमनै नेगेटिव की जागां पोजिटिव सोच बणावण की जरूरत सै। हर आदमी एक जहाज तो देवैगा।

जितनी घरआली उतने जहाज हो ज्यांगे। किसे किसे धोरै तो च्यार-पांच बी हो ज्यांगे। फेर आगले जनम दिन पै बेरा ना के दे देवै। इस ढालां सब कपलां धोरै जहाज होंगे तो गजब का नजारा होगा। आसमान मै जहाजै ए जहाज टहल्या करैंगे। फेर कारां नै तो महारे थारे बरगे टटपूंजिये चलाया करैंगे। उनकी घरआली दफतर जावैगी तो उसमैं उड़कै जावैगी अर उड़ेए तै सीधे उड़कै घरां पहोंच ज्यागी। गुंड्डे कोन्या छेड़ पावैं न्यों उसनै। या छेड़छाड़ बी कसूती बीमारी सै समाज मैं इसतै बी निजात मिल ज्यागी औकात के हिसाब तै।

इस बाजारवाद के दौर मैं असल मैं या एक और ‘लूटबाजी’ आगी म्हारे भारत देश ‘महान’ मैं, इस ‘साइनिंग इंडिया’ मैं। या लूट बाजी असल मैं ‘गिफट बाजी’ का मुखौटा पहर के आई सै, ओ ताश खेलनिया मेरे भाई मेरी बात समझ मैं आई? नहीं! तो ताश बन्द कर अर दिमाग लाकै सोच। सोच्चण की तनै कस्सम खा राखी सै।

तो सुन! ये जो इतनी हैसियत आली गिफट दी जावैं सैं इनपै इन्कम टैक्स की छूट सै। ये सारी गिफट फरी सैं। थाम चाहो तो ताजमहल खरीद कै दे द्यो। एक खास बात और सै अक या गिफट प्रतीक मात्र नहीं होन्ती। या भाव, मोल भाव, औकात अर ब्रांड की भाषा बण ज्यावै सै। आज कै तो औकात रहगी अर कै वा चीज जिस करकै औकात बणै सै।

बाकी बीच की सारी की सारी चीज साफ चाहे वो प्रेम भाव हो, भाव हो, लगाव हो जो भी हो। कुछ दिन पाछै जब गिफट नहीं मिलती तो प्रेमी कहवै सै तेरा ब्यौंत देख लिया अर तेरी औकात देख ली। आई किमै समझ मैं? हाम ताश खेल्लण आले रोब्बट बणा दिये। जिब भावनाएं पीस्से मैं बदलैं सैं तो पीस्सा भावना नै तय करै सै। अर पीस्से का हिसाब हो सै मोल तोल हो सै। याहे सै पीस्से की औकात। एक कान्ही तो 500 रुपये की दवाई के अभाव मैं बालक मां की आंख्यां के साहमी दम तोड़ दे सै।

दूजे कान्हीं एक रईश दो सौ ब्यालिश करोड़ की गिफट देदे सै। एक कान्ही तो ब्याह करण की खातर पीस्से ना होवण करकै एम ए पास छोरी घरां बेठी सै अर दूजे कान्ही हनीमून बी आसमान में मनैं सैं।

एक तरफ किसान विदर्भ मैं, हरियाणा मैं अर पंजाब मैं करज के बोझ तलै फांसी खा कै आत्महत्या करैं सैं अर दूसरे कान्ही 1600 रुपये प्रति क्वींटल का नाज आयात करया ज्यावै सै। या सै पीस्से की औकात! आई किमै समझ मैं?

मानवता की औकात आला समाज जिब ताहिं नहीं बनावांगे तो न्योंए धक्के खावांगे। उनके बालकां की खातिर एयरकंडीशंड कोठी, एयरकंडीशंड कार, एयरकंडीशंड बाजार, एयरकंडीशंड स्कूल अर एयरकंडीशंड अस्पताल अर म्हारे बालकां की खातर तो बस दीमक लागी कड़ियां का मकान, खसता हाल सरकारी स्कूल, बिना डाक्टरां अर दवाइयां आले सरकारी अस्पताल, बिना पीस्यां किस्से बाजार? इस पीस्से नै बड़े बड़यां की म्यां बुलवा दी।

बहोत से ईमानदार लोगां नै बी हार मान ली। फेर बड़ा हिस्सा सै जनता का जो इस पीस्से की औकात नै सबक सिखाना चाहवै सै। या लड़ाई जारी सै। पीस्से नै अपनी असली औकात का एक दिन जरूर बेरा लागैगा जिब संसार का आम आदमी जागैगा।

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