जब वे कहें कि ‘आर्यन माइग्रेशन थ्योरी’  गलत साबित हो चुकी है… तो उन्हें यह छोटा सा जेनेटिक तथ्य दिखाएँ… जीन कभी झूठ नहीं बोलते…

जब वे कहें कि ‘आर्यन माइग्रेशन थ्योरी’  गलत साबित हो चुकी है… तो उन्हें यह छोटा सा जेनेटिक तथ्य दिखाएँ… जीन कभी झूठ नहीं बोलते…

 

देवदत्त पटनायक

भारत में ब्राह्मणों में ‘स्टेपी’ (Steppe) मूल के लक्षण काफी ज़्यादा पाए जाते हैं, जिनका औसत आम तौर पर 15–30% होता है। ये लक्षण मुख्य रूप से उन पुरुष पूर्वजों से विरासत में मिले हैं (Y-DNA R1a की आवृत्ति ~60%) जो कांस्य युग (Bronze Age) के दौरान यूरेशियन स्टेपी क्षेत्र से यहाँ आए थे। स्टेपी का यह घटक, जो इंडो-आर्यन भाषा बोलने वालों (सिंताश्टा/आंद्रोनोवो) से जुड़ा है, दक्षिणी समुदायों की तुलना में उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी ब्राह्मणों में आम तौर पर अधिक पाया जाता है।

ब्राह्मणों में स्टेपी जीनों के मुख्य पहल

मिश्रण का प्रतिशत: उत्तरी भारतीय ब्राह्मणों (जैसे, UP, बंगाल) में स्टेपी मूल के लक्षण 30% तक हो सकते हैं, जबकि दक्षिणी भारतीय ब्राह्मणों में यह स्तर अक्सर कम, लगभग 11-20% होता है।
पैतृक वंश: R1a-Z93 हैप्लोग्रुप (haplogroup) वह प्रमुख (कुछ समूहों में 60% से अधिक) Y-DNA कड़ी है जो उन्हें कांस्य युग के स्टेपी योद्धाओं से जोड़ती है; इन योद्धाओं की पहचान अक्सर सिंताश्टा-आंद्रोनोवो संस्कृति के हिस्से के रूप में की जाती है।
अन्य समूहों से तुलना: ब्राह्मणों में स्टेपी मूल के लक्षण भले ही उच्च हों, लेकिन भारत में यह सबसे अधिक नहीं हैं; रोर, जाट और कलाश जैसे समूहों में यह प्रतिशत और भी अधिक होता है, जो कभी-कभी 50% से भी ज़्यादा हो जाता है।
मातृ वंश: स्टेपी मूल के लक्षण मुख्य रूप से पुरुषों के माध्यम से विरासत में मिलते हैं; भारतीय आबादी के मातृ माइटोकॉन्ड्रियल DNA में ये लक्षण बहुत ही दुर्लभ होते हैं।
वितरण: अध्ययनों से पता चलता है कि उच्च स्टेपी DNA और पारंपरिक रूप से पुरोहित/उच्च-जाति की स्थिति के बीच एक संबंध है; यह संबंध उस “टकराव” (collision) को दर्शाता है जो लगभग 3,500–4,000 साल पहले हुआ था।

क्षेत्रीय भिन्नता:

उत्तर/उत्तर-पश्चिम: कश्मीरी ब्राह्मणों को अक्सर उन समूहों में गिना जाता है जिनमें स्टेपी मूल के लक्षण अधिक पाए जाते हैं; यह बात उत्तर-पश्चिमी प्रवास मार्ग पर उनकी भौगोलिक स्थिति से भी मेल खाती है।
दक्षिण: दक्षिणी भारतीय ब्राह्मण समुदायों में स्टेपी मूल का स्तर कम होता है, लेकिन फिर भी यह काफी महत्वपूर्ण है; इनमें अपने उत्तरी समकक्षों की तुलना में स्थानीय द्रविड़-भाषी आबादी के साथ मिश्रण (admixture) अधिक देखने को मिलता है।

यह जानकारी 2010 के बाद सामने आई थी… लेकिन ब्राह्मण इसे सक्रिय रूप से दबाने की कोशिश कर रहे हैं… वे 2000 ईसा पूर्व के ‘हड़प्पा जीन’ के बारे में तो लगातार बात करते हैं, लेकिन हड़प्पा काल के बाद, 1500 ईसा पूर्व में हुए जीनों के प्रवेश (gene entry) के बारे में कोई बात नहीं करते… कितने चालाक हैं ये ब्राह्मण!

देवदत्त पटनायक के फेसबुक वॉल से साभार

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