कलीराम खत्री : सच्चे-खरे, प्रबुद्ध और पारदर्शी कार्यकर्ता

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-101

कलीराम खत्री : सच्चे-खरे, प्रबुद्ध और पारदर्शी कार्यकर्ता

सत्यपाल सिवाच

वर्षों पहले रोहतक आईटीआई में पढ़ते हुए जान-पहचान हुई तब यह पता नहीं था कि साधारण सा दिखने वाला यह शख्स एक दिन मेरे जीवन का हिस्सा बन जाएगा। जी हाँ, मैं कलीराम की बात कर रहा हूँ। शिक्षकों व कर्मचारियों में ही नहीं, समाज के अन्य हिस्सों में अनेक लोग हैं जो उन्हें अपना खासमखास मानते हैं। मैं भी उनमें से हूँ। और वे हैं भी खास, क्योंकि आप मुश्किल या अच्छे – दोनों हालात में उन पर भरोसा कर सकते हैं। “अच्छा जो हो सके, लेकिन बुरा किसी का भी नहीं” यह उनके जीवन का दर्शन है।

20 अप्रैल 1960 को रोहतक के महम चौबीसी क्षेत्र के गांव खरक जाटान में एक साधारण किसान श्री जयचन्द और श्रीमती चन्द्रोदेवी के घर कलीराम का जन्म हुआ। तीन भाइयों ये बड़े हैं। इनसे छोटे राजकुमार मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत्त हैं और सबसे छोटे सुभाषचन्द्र मर्चेन्ट नेवी में इंजीनियर हैं। कलीराम अपने माता-पिता का इसलिए सहारा बन गए कि वे बचपन से जीवन की जटिलताओं रूबरू होना सीख गए थे। उन्होंने गांव की प्राथमिक पाठशाला से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद आठवीं तक राजकीय माध्यमिक विद्यालय बैंसी से तथा राजकीय उच्च विद्यालय निंदाना से दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की। आठवीं कक्षा में उन्हें छात्रवृत्ति मिली और सन् 1976 में दसवीं की परीक्षा में अपने विद्यालय में प्रथम स्थान पर रहे। इसके बाद उन्होंने रोहतक से प्रेप और बी.ए.1 परीक्षाएं पास की। तत्पश्चात् घर की जिम्मेदारी संभालने के लिए बी.एस.एफ. में भर्ती हो गए। वहीं रहते हुए बी.ए. की डिग्री हासिल की। उसके बाद उन्होंने छोटूराम कॉलेज ऑफ एजुकेशन रोहतक से बी.एड. किया तथा बीएसएफ छोड़कर तदर्थ आधार पर गणित अध्यापक लग गए। नौकरी में रहते हुए उन्होंने एमडीयू रोहतक से 1988 में अर्थशास्त्र में एम.ए. की उपाधि हासिल कर ली।

कलीराम ने 1980 से 1984 तक बीएसएफ की नौकरी की और अक्तूबर 1984 में पुगथला जिला सोनीपत के राजकीय उच्च विद्यालय में तदर्थ आधार पर गणित अध्यापक नियुक्त हुए। एक नवंबर 1986 से उनकी सेवाएं नियमित हो गईं। वे 1995 में प्राध्यापक अर्थशास्त्र पदोन्नत हुए और 30 अप्रैल 2018 को इसी पद से राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय मनोहरपुर जिला जीन्द से सेवानिवृत्त हुए। वे सन् 2004 से 2011 तक सर्वशिक्षा अभियान में पहले एबीआरसी और फिर ए.पी.सी. पद पर डेपुटेशन पर रहे।

वे बहुत प्रतिभावान और परिश्रमी शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं। काम के प्रति लापरवाही उनके स्वभाव का हिस्सा ही नहीं रही। वे तन्मयता से कर्तव्य पालन करने के कारण छात्रों, सहयोगी शिक्षकों और मुख्याध्यापक/प्राचार्य की नजरों में बहुत सम्मान के पात्र रहे हैं। परीक्षा परिणाम की नजर से उन्हें सदैव प्रशंसा ही मिली। वे जिस संस्था में रहे, परिवार के सदस्य की तरह रहे। इसीलिए चाहे वहाँ निर्माण कार्य चलना हो या परीक्षा/प्रशिक्षण का प्रबंध, मुखिया का स्वाभाविक चुनाव कलीराम होते। सेवानियमों को समझकर अध्यापकों का मार्गदर्शन करने का काम तो वे सेवानिवृत्ति के बाद भी कर रहे हैं। वे अत्यन्त आशावादी स्वभाव के हैं और इसीलिए अंतिम स्टेज तक समाधान ढूंढने की पूरी कोशिश करते हैं।

वे सन् 1990 में जुलाना खण्ड के सचिव के रूप में हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के जुड़े थे। उसके बाद सेवानिवृत्ति तक लगातार जिले के कोषाध्यक्ष, राज्य कमेटी के सदस्य और कार्यालय सचिव के रूप में सक्रिय रहे। कोषाध्यक्ष के रूप में उन्होंने ईमानदारी और पारदर्शिता के नये मानक स्थापित किए। जिले के प्रत्येक विद्यालय के स्टाफ रूम में पूरे कार्यकाल की स्कूल-वार प्राप्तियां और मद अनुसार भुगतान लिखित में चिपकवा दीं। इससे संगठन की सार्वजनिक प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई। सन् 2002 में हुए राज्य सम्मेलन आयोजन में भी उनकी भूमिका अत्यन्त प्रशंसनीय रही। वे वर्षों तक हरियाणा अध्यापक समाज/ अध्यापक लहर के सम्पादन से जुड़े रहे हैं। प्रबंधन, कोषाध्यक्ष और सेवा सम्बन्धी मार्गदर्शन का उनमें अच्छा हुनर है। वे सेवानिवृत्ति के इतने सालों बाद भी शंका समाधान कॉलम चला रहे हैं।

उनके यूनियन में सक्रिय होने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। सन् 1990 में जिला प्रधान व सचिव ओमप्रकाश आर्य और रघुभूषण गुप्ता ने जुलाना इकाई बनाने के लिए बैठक की। कम ही शिक्षक आए। उनके सम्बोधन और चिंताओं से प्रभावित होकर कलीराम ने जिम्मेदारी ओढ़ ली और वहाँ इतने व्यवस्थित ढंग से काम किया कि बाद में वर्षों तक यूनियन का अच्छा प्रभाव रहा। कलीराम जी मेरे आईटीआई के सहपाठी थे और बाद में जीन्द में साथ रहे थे। वे संगठन में अपनी सक्रियता के लिए मुझे श्रेय देते हैं। मेरे विचार से इसे उल्टा करके भी देख सकते हैं। हम दोनों अनेक अर्थों में एक-दूसरे के पूरक बन गए थे।

वे पदाधिकारी बनने के बाद लगातार हर आन्दोलन में सक्रिय रहे। हड़ताल सहित कोई एक्शन ऐसा नहीं है जिसमें सम्मिलित न हुए हों। सन् 1993 में गिरफ्तारी देने के लिए चण्डीगढ़ जाते समय उन्हें जीन्द सिटी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ किताब सिंह मलिक भी थे। वे 21 दिन तक जीन्द जेल में रहे। इस हड़ताल में उन्हें सेवा से बर्खास्त किया गया। उत्पीड़न की यह कार्रवाई आन्दोलन का समझौता होने पर ही निरस्त हुई।

आन्दोलन के अनुभवों पर टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं कि सबसे पहला काम तो तन्मयता के साथ कर्तव्य पालन करना है। जो लोग अच्छे से ड्यूटी करते हैं वही यूनियन में भी सफल होते हैं। ऐसा करने पर समाज व सहयोगियों के अलावा न्यायप्रिय अधिकारियों से भी इज्ज़त मिलती है। उन्हें लगता है कि मौजूदा दौर में अपनी ड्यूटी के अलावा संगठन के काम के प्रति लगन में कुछ कमी आई है। वर्तमान में पहले से अधिक मुस्तैदी से काम करने की आवश्यकता है।

सन् 1985 में इनका विवाह हुआ। इनकी जीवन साथी सुश्री शारदा मौलिक मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुई हैं। बेटी रसायन शास्त्र विषय की प्राध्यापिका हैं। बेटा एम.टेक. करके निजी कंपनी में आस्ट्रेलिया में पेट्रोलियम इंजीनियर के रूप में काम कर रहाहै। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच

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