ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – इस युग में

 

ओमसिंह अशफ़ाक ने ‘इस युग में’ कविता आज से 29 साल पहले 21.03.1997 को लिखी थी। यह कविता उनके काव्य-संग्रह ‘भूकंप में बच्चे’ में शामिल है जो अब अनुपलब्ध है। इस कविता को पढ़कर लगता है कि जैसे वह कोई भविष्य वक्ता हों। उन्होंने आने वाले समय का अंदाजा लगा लिय़ा था, लेकिन ऐसी कल्पना जो अक्षरशः सही साबित हो रही है। हर शब्द वर्तमान हालात की गवाही दे रहा है। कविता की एक-एक पंक्ति आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। लेकिन कविता बेहतर भविष्य की सकारात्मक सोच से लबरेज है। कवि को यह विश्वास है कि यह सब जो कुछ हो रहा है, वह हमेशा नहीं चलेगा। बदलाव होगा और वह बदलाव एक बेहतर भविष्य, बेहतर संसार का है। यह आशाभरी उनकी सोच बेहतर मनुष्य के जरिये बेहतर समाज और बेहतर दुनिया के सपने को सार्थक दिशा देती है। – आलोक वर्मा

विश्व कविता दिवस पर प्रतिबिम्ब मीडिया के पाठकों के लिए यह कालजयी रचना विशेष रूप से यहां प्रस्तुत की जा रही है।

 

विश्व कविता दिवस पर विशेष

इस युग में

ओमसिंह अशफ़ाक

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बनफूल नहीं खिलेंगे इस युग में

महाकाव्य भी नहीं रचेंगे

विलुप्त हो जाएंगे जंगल

वनमानुष चहूं ओर फिरेंगे

सावन में घटाएं नहीं घिरेंगी

मोर नृत्य भी नहीं करेंगे

वीरान हो जाएंगे बाग-बगीचे

परिंदे प्रवास करेंगे।

 

इस युग में गमलों में उगेंगे

पीपल और बरगद

फल पेड़ पर नहीं पकेंगे

चिलचिलाती धूप में

झुलस जाएंगे लोग

हिरण कुलांचें नहीं भरेंगे।

 

इस युग में कृत्रिम-संचेशन से उपजेंगी दुधारू गऊएं

पर बच्चे दूध बिन तरसेंगे

सावन में लू चलेगी

और बादल बेमौसम बरसेंगे

इस युग में स्लेट और किताबें नहीं बचेंगी

इंटरनेट और कंप्यूटर पर ही सब पढ़ेंगे

दुध-मुंहे बच्चे अंग्रेजी में ही बोलना सीखेंगे

और वृद्ध किसान को-

‘एन ईडियट ओल्ड मैन’ कहेंगे

सगे संबंधी नहीं होंगे हमारी दुनिया में

बस यूं ही जड़-विहीन फिरेंगे।

 

और भी बहुत कुछ होगा इस युग में

मसलन गीता, कुरान, बाइबल अदालतों में सजेंगी और अपराधी लोग

नितनेम झूठी कसमें खाएंगे

‘जो निरपराध होंगे वे सब मारे जाएंगे’

मुफ़्तखोर रामकथा का आयोजन करेंगे

और उपभोक्ता-झुंड सच्चे-गुरु की तलाश में भटकेंगे

पेटू-कथावाचक पुराण कथाओं से उनका पेट भरेंगे।

 

इस युग में रात में आकाशगंगा और दिन में इंद्रधनुष नहीं चमकेगा-

ऋतुचक्र थम जाएगा

खेत मरुस्थल-सा दमकेगा

सूख जाएंगीं नदियां

फसले मुंह मोड़ लेंगी

समुद्र में पड़ेगा परमाणु-कचरा और मछलियां दम तोड़ देंगी

 

इस युग में ‘राम की शक्ति पूजा’ नहीं लिखी जाएगी

राम के अनुयायी तो

उनके आदर्शों का वध करेंगे

वे सत्ता के मृग का आखेट करने जाएंगे

और रथ पर चढ़कर नगर-नगर डगर-डगर फिरेंगे

 

इस युग में

बड़े अफसर अपने बीच

‘महाभ्रष्ट का चुनाव’ करेंगे

कानून के निर्माता

कानून की दुहाई देंगे

पर खुद कानून से नहीं डरेंगे

कुछ लोग निर्लज्ज होकर लूटेंगे

वे बेइंतेहा दौलत कमाएंगे

बाढ़ और भूचाल ‘राहतकोष’ भी हड़प जाएंगे

वे बड़े साहसी होंगे-

भगवान से भी नहीं डरेंगे

भले ही अंततः कंगाल होकर मरेंगे

 

इस युग में

अपराध और अफ़रा-तफ़री खूब बढ़ेगी

मृत्यु दर बेशक घट जाएगी-

पर हत्या और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ेगी

इस युग में सब कुछ उलट-पुलट जाएगा

बहुत कुछ छूट चुका होगा

शेष टूट-फूट जाएगा

लोग पगला जाएंगे

त्राहिमाम-त्राहिमाम चिल्लाएंगे अकाल पड़ेंगे, भूकंप आएंगे

 

ये युग बड़ा आत्महंता है

न जाने कौन इसका नियामक, कौन नियंता है

जाने कब तक ऐसा चलेगा?

पर ये तय है कि एक-न-एक दिन ये सिलसिला भी जरूर थमेगा

 

कुछ भगीरथ बचे रहेंगे

जो अपनी आस्था नहीं डगमगाएंगे

वे सारे दु:स्वप्न को अडिग झेल जाएंगे

गंगा को हिमालय से उतारेंगे

और नया युग रचाएंगे।

उस युग में फूल फिर खिल उठेंगे कोयल कुकेगी-

कविता सुगबुगाएगी

और महाकाव्य रचे जाएंगे।

 

हम संघर्षरत हैं-

उसी युग के स्वागत के लिए।

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