प्राचीन भारत में कंबोज रानियाँ: सैन्य नेतृत्व और ऐतिहासिक विरासत

प्राचीन भारत में कंबोज रानियाँ: सैन्य नेतृत्व और ऐतिहासिक विरासत

डॉ. रामजीलाल

प्राचीन भारतीय इतिहास में कंबोज एक शक्तिशाली जनजाति और महाजनपद केरूप में विख्यात है .ऋगवेद काल से लेकर दक्षिण- पूर्व कंबोडिया तक कंबोज महिलाओं ने प्रशासन और युद्ध के में अद्वितीय भूमिका निभाई है.ऋग्वेद में कंबोज एक बाहरी और युद्ध प्रिया जाति के रूप में उल्लेख मिलता है. वैदिक समाज में स्त्रियों को सभा और युद्ध में भाग लेने का अधिकार था.कंबोज महिलाएं घुड़सवारी , धनुर्विद्या और युद्ध कला में प्रशिक्षित व निपुण मानी जाती थी.वैदिक सूक्तों में अश्र्वारोही नारियों का वर्णन मिलता है जो युद्ध में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ती थी. समकालीन अन्य गणराज्यों की तुलना में कंबोज महिलाओं की सार्वजनिक औरसैन्य भूमिकाअधिक पाई जाती थी..जब पुरूष /पति युद्ध में वीर गति को प्राप्त हो जाते थे तो कंबोज महारानियां सेना की कमान संभालकर युद्ध क्षेत्र /रणक्षेत्रों में शत्रु में का मुकाबला करती थी . कंबोज क्षेत्र गांधार के पास स्थित था,जहां स्त्री -शिक्षा और स्वावलंबन को बहुत अधिक महत्व दिया जाता था.दूसरे शब्दों में महिलाओं का सशक्तिकरण का आदर्श मॉडल कंबोज महाजनपद में विद्यमान था. कंबोज महिलाओं की सार्वजनिक औरसैन्य भूमिका की परंपरा का प्रभाव इतिहास के अन्य कालों में विभिन्न राजवंशों की रानियों पर भी मिलता है और उन्होंने आत्मसम्पर्ण की अपेक्षा रणक्षेत्रों में रणचड़ी का रूप धारण किया .

1.वैदिक व प्राचीन कालों में कंबोज ऋषि व ऋषिकाएं: कंबोज वंश के प्रमुख ऋषियों और शिक्षकों में ऋषि कंबोज औपमन्यव: (सामवेद के वंश ब्राह्मण (1.18),ऋषि उपमन्यु (ऋग्वेद (1.102.9), कंबु स्वयंभुव: कंबोज (प्राचीन ऋषि और राजा- एकात्मा स्तोत्र ), भानुमंत औपमण्यव: और उर्जयंत औपमन्यव:(वंश ब्राह्मण सूची में शिक्षकों की सूची में उल्लेख ) हैं. यद्यपि ऋग्वेद में अपाला ऋषिका का अत्रि ऋषि की पुत्री के रूप में वर्णन मिलता है. परन्तु कंबोज समुदाय के इतिहासकारों व साहित्यकारों ने अपाला ऋषिका को कंबोज वंश की ऋषिका बताया है क्योंकि वह कंबोज क्षेत्र से थी.

2.महाभारत काल में कंबोज रानियां:महाभारत में कंबोज महाजनपद का उल्लेख है .महाभारत में भानुमति का वर्णन आता है .भानुमति कंबोज राजा चित्रांग कंबोज और महारानी चंदेरा मुद्रा कंबोज की बेटी, कंबोज महाजनपद के महाराजा सुदर्शन कंबोज की बहन थी तथा इसकी शादी दुर्योधन से हुई थी . जयद्रथ की कंबोज रानी का महाभारत (11.23.11) में उल्लेख है. सिंधु-सौवीर के राजा जयद्रथ की पत्नियों में से एक कंबोज राजकुमारी थी. दो राजवंशों – कंबोज और कौरवों के बीच विवाह की कूटनीति राजनीतिक गठबंधन महत्वपूर्ण उदाहरण है . इसी पारिवारिक संबंध के कारण गठबंधन मजबूत हुआ .कंबोज के महाराजा सुदक्षिण कंबोज ने पांडवों के विरुद्ध युद्ध में कौरवों -जयद्रथ और दुर्योधन -कौरवों का साथ दिया था . महाभारत के युद्ध में महाराजा सुदक्षिण कंबोज अपनी बहन भानुमति जो दुर्योधन की महारानी थी के मान-सम्मान व सुरक्षा हेतु कौरवों के साथ 6,000 घुड़सवारों, सुनहरे रथों और श्र्वेत घोड़ों की सेना की कमान संभालते हुए कुरुक्षेत्र के मैदान में पांडवों -अर्जुन के विरूद्ध आमने-सामने लड़ते हुए युद्ध के 13/14 वें दिन वीर गति को प्राप्त हुए. महाराजा सुदक्षिण कंबोज की मृत्यु के पश्चात उनकी माता और कंबोज महाजनपद की राजमाता महारानी सुदर्शन कंबोज ने कंबोज महाजनपद की सत्ता संभाली व शासन किया .जहां तक भानुमति का संबंध है वह कुशाग्रबुद्धि और विलक्षण कूटनीति के कारण प्रसिद्ध है. वह अपनी सास गांधारी की विश्वास पात्र थी और 100 कौरवों के कुनबे को संयुक्त करके रखा और एक कहावत बन गई “कहीं की ईंट ,कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा” .यह कहावत आज भी प्रसिद्ध है.

3. प्राचीन भारत की एक गुमनाम रानी कृपा कंबोज

रानी कृपा कंबोज, जिसका उल्लेख यूनानी इतिहासकार क्लियोफिस और फारसी स्रोतों ने सिकंदर के संदर्भ में किया है, 327-326 ईसा पूर्व में सिकंदर के भारत पर आक्रमण के समय कंबोज महाजनपद की रानी थी। कंबोज महाजनपद आज के अफगानिस्तान-पाकिस्तान के स्वात, कुनार और पूजंकोरा घाटी के क्षेत्र में स्थित था। सिकंदर ने फारस और बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त करने के बाद भारत पर आक्रमण किया था।युद्ध में अपने पति और बेटे की शहादत के बाद मस्सागा किले की रानी ने खुद सेना की कमान संभाली. उसने कई सप्ताह तक सिकंदर से युद्ध किया और दोनों पक्षों को भारी क्षति उठानी पड़ी। परिणामस्वरूप दोनों को संधि करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इतिहासकार कर्टियस ने रानी कृपा कंबोज की वीरता का वर्णन किया है.

327-326 ईसा पूर्व में कृपा कंबोज भारत की पहली महिला सेनापति, पहली महिला शासक, पहली महिला सेना की संस्थापक और भारत की पहली बेटी हैं जिन्होंने सिकंदर को संधि के लिए मजबूर किया था। वस्तुतः कृपा काम्बोज न केवल काम्बोज समुदाय में बल्कि सम्पूर्ण भारत के इतिहास में प्रतिरोध और कूटनीति का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। महारानी कृपा काम्बोज की गौरवशाली उपलब्धियों से वर्तमान पीढ़ी को अवगत कराने के लिए विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने हेतु बुद्धिजीवियों द्वारा अभियान चलाया जाना चाहिए.

4.अयासी कम्बोजिका:. मथुरा की कम्बोज रानी और इंडो-सिथियन युग की राजकुमारी अयासी कम्बोजिका (संस्कृत: अयासी कम्बोजिका),एक प्रतिष्ठित कम्बोज शाही से थीं.पहली सदी में मथुरा के शासक इंडो-सिथियन महाक्षत्रप रजुवुल कम्बोज की महारानी बनीं .शिलालेख के अनुसार अयासी कंबोजिका विवाह की कूटनीति कारण एक शक्तिशाली महारानी थी. मथुरा के सप्तऋषि टीले से मिले खरोष्ठी शिलालेख के अनुसार रानी अयासी कंबोजिका ने बौद्ध धर्म के प्रचार में बहुत योगदान दिया . उन्होंने यमुना नदी के तट पर एक स्तूप और गुहा बिहार का निर्माण करवाया था.शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि कंबोज रानियां केवल राजकीय परिवार का हिस्सा ही नहीं थी बल्कि धार्मिक संस्थाओं को दान और संरक्षण भी देती थी .उस समय बौद्ध मठ कंबोज महिलाओं के धार्मिक और सामाजिक प्रभाव का केंद्र बन रहे थे.

5 रानी भाग्य देवी कंबोज:10वीं -11वीं सदी में बंगाल में पाल वंश में शासन किया .परन्तु पाल वंश कमजोर होने के कारण कंबोज वंश ने बंगाल में शासन स्थापित कर लिया.रानी भाग्य देवी इस युग की सबसे प्रसिद्ध महारानी थी .रानी भाग्य देवी नयपाल कंबोज की माता व राज्यपाल कंबोज की धर्मपत्नी थी.उन्होंने बौद्ध विहारों व मन्दिरों को दान देकर धार्मिक गतिविधियों में भाग लिया.यहां यह बताना जरूरी है कि भाग्य देवी का नाम मुख्य रूप से ताम्र पत्रों और वंशावली ग्रथों में मिलता है.

6.रानी दिद्दा -कश्मीर की ‘कैथरीन‘:ऐतिहासिक स्रोतों और शोधों के अनुसार कश्मीर की प्रसिद्ध और शक्तिशाली शासिका रानी दिद्दा (शासनकाल: 980-1003 ईस्वी) का कंबोज वंश (Kamboj Dynasty) वंश से गहरा संबंध माना जाता है। रानी दिद्दा का जन्म 924 ईस्वीमें हुआ था .वह लोहार वंश (Lohara Dynasty) के राजा सिंहराज की पुत्री तथा कंबोज मूल के काबुल के प्रसिद्ध हिन्दू शाही राजा भीमदेव शाही की नातिन(Grand daughter) थी. रानी दिद्दा का विवाह कश्मीर के राजा क्षेमगुप्त के साथ हुआ था, जो उत्पल वंश से थे. अपने पति की मृत्यु के बाद उन्होंने पहले रीजेंट के रूप में और फिर 980ईस्वी में स्वतंत्र शासिका के रूप में कश्मीर 1003 ईस्वी तक 30 वर्ष कश्मीर पर शासन किया. रानी दिद्दा (शासनकाल: लगभग 980-1003 ईस्वी) कश्मीर के इतिहास की सबसे प्रभावशाली और शक्तिशाली शासिकाओं में से एक थी.वह प्रशासनिक कुशलता, सैन्य प्रतिभा और क्रूर राजनीतिक दांव-पेचों के लिए प्रसिद्ध है.रानी दिद्दा की मुख्य उपलब्धियां में ऐतिहासिक दावों के अनुसार, रानी दिद्दा ने भारत पर आक्रमण करने वाले महमूद गजनवी को कश्मीर की सीमा पर दो बार हराया था.उन्होंने मात्र 500 सैनिकों के साथ गजनवी की 35,000 की फौज को धूल चटा दी थी. वह कश्मीर की ‘कैथरीन’ (कुशल शासिका)के नाम से प्रसिद्ध है .शक्तिशाली प्रशासक के रूप मे उन्होंने राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार और विश्वासघात को खत्म करने के लिए भ्रष्ट मंत्रियोंऔर अपने पोते को भी अपदस्थ कर दिया .जन्म से शारीरिक रूप से अक्षम (लंगड़ी) होने के बावजूद, उन्होंने अपने दृढ़ संकल्प से खुद को एक महान योद्धा और कुशल शासक साबित किया.संक्षेप में कश्मीर को विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने और राजनीतिक स्थिरता प्रदान करने में उनकी भूमिका निर्विवाद है.

7.रानी कंबुज राजलक्ष्मी या कंबुज-राजलक्ष्मी (खमेर: កម្ពុជរាជលក្ស្មី, थाई: กัมพุชราชลักษมี) 575–580 ईस्वी के दौरान कंबोडिया के चेनला की एक अर्ध-पौराणिक और अर्ध-मिथकीय महान रानी थीं. कंबुज राजलक्ष्मी, राजा श्रेष्ठ वर्मन की राजकुमारी थीं, और उनकी माँ कंबोडिया के एक राज्य चेनला के शाही राजवंश की सबसे पुरानी वंश-परंपरा से थीं. घटनाओं के एक पारंपरिक विवरण के अनुसार, 575–580 ईस्वी में राजा वीर श्रेष्ठ वर्मन की मृत्यु के बाद उन्होंने सिंहासन संभाला और भाव वर्मन से विवाह किया; इसके बाद उन दोनों ने मिलकर शासन किया.

8.असाकेनियाई रानी तुम्मेया/तुमारिस: ऐतिहासिक वृत्तांतों और कंबोजा विद्वानों द्वारा की गई आधुनिक व्याख्याओं के अनुसार, असाकेनियाई रानी तुम्मेया (जिसे कुछ लोग टोमिरिस के रूप में पहचानते हैं) को प्राचीन युग की एक वीर कंबोजा रानी माना जाता है, जिसने युद्ध में अपनी सेना का नेतृत्व किया था.

संक्षेप में, भले ही कंबोज रानियों के बारे में रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई जैसी दूसरी मशहूर महिलाओं के मुकाबले ज़्यादा जानकारी न हो, लेकिन ऐतिहासिक सबूतों से कंबोज वंश में उनकी अहम सैन्य नेतृत्व की भूमिकाओं का पता चलता है. ये रानियां कबीलाई राजनीति में असरदार थीं, और अक्सर सेना की ज़िम्मेदारियों को राजकाज के साथ मिला देती थीं. उनके जीवन के सीमित सबूत भारत की अलग-अलग ऐतिहासिक कहानियों को दिखाते हैं, जो धर्मों को बढ़ावा देने और बौद्ध और जैन संस्थाओं के विकास में योगदान देने में रानियों की भूमिकाओं को दिखाते हैं. सेंट्रल एशिया और भारत के बीच कंबोज महाजनपद की रणनीतिक स्थिति ने इन रानियों को ज़रूरी कूटनीतिक रिश्ते बनाने में मदद की, जिससे सांस्कृतिक और धार्मिक मेलजोल को बढ़ावा मिला. कई कंबोज रानियों ने, बौद्ध होने के बावजूद भी, वैदिक विदवानों को संरक्षण प्रदान किया और कई तरह की सांस्कृतिक प्रथाओं को अपनाया, जिससे अलग-अलग विश्वासों और परंपराओं को जोड़ने वाले नेताओं के तौर पर उनका विज़न दिखा .आज के भारत में अलग-अलग ऐतिहासिक कहानियों को एक करना एक बहुत ज़रूरी काम बन गया है। हाल की चर्चाओं में, विद्वान और बुद्धिजीवी स्कूल और यूनिवर्सिटी दोनों स्तरों पर पाठयक्रमों में कंबोज रानियों के शानदार योगदान को शामिल करने की वकालत कर रहे हैं. इस पहल का मूल उदेश्य विद्यार्थियों को प्राचीन इतिहास की समृद्ध कहानियों से जोड़ना है, और देश के अतीत को बनाने में इन असाधारण महिलाओं की प्रभावशाली भूमिकाओं पर प्रकाश डालना है. उनकी कहानियों और उपलब्धियों को शैक्षणिक कार्यक्रम में शामिल करके, इसका उदेश्य विद्यार्थियों में भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान और समझ को गहरा करना है, जिससे इतिहास के प्रति गर्व और जुड़ाव की भावना बढ़े, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है.

लेखक पूर्व प्राचार्य, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा, भारत) हैं।

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