खरपतवार उन्मूलन-एक भूला बिसरा काम

 खरपतवार उन्मूलन-एक भूला बिसरा काम

कुलभूषण उपमन्यु

 

हिमाचल प्रदेश की 80-85% आबादी कृषि से जुड़ी है. खेती की जोतें बहुत छोटी होने के कारण खेती के अतिरिक्त पशुपालन और दस्तकारी प्राचीन काल से लोंगों के जीविका का आधार रहा है. पिछले कुछ दशकों से पशुपालन सरकार और वन विभाग की गलत नीतियों के चलते लगातार अनदेखी का शिकार हो रहा है. परिणाम स्वरूप बहुत से लोग पशुपालन से तौबा कर चुके हैं. अत्यधिक चीड़ रोपण और लेंटाना आदि खरपतवारों के फैलने से प्रदेश की 2 लाख 35 हजार हेक्टेयर चरागाह और वन भूमियाँ खरपतवारों की चपेट में आकर अनुत्पादक हो चुकी हैं.

खरपतवारों ने केवल स्थानीय घासों को ही नष्ट नहीं किया है बल्कि प्रदेश की बहुमूल्य जैवविविधता को भी खतरे में डाल दिया है. जिसका स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर हुआ है. पशुपालन के लिए प्रदेश के किसानों को पंजाब से मंहगी तूड़ी या पराली ला कर गुजारा करना पड़ रहा है, जबकि प्रदेश के पास 67% वन भूमि है जिसके अधिकांश भाग में चारा उपलब्ध होता था. किन्तु व्यापारिक वानिकी के चलते और खरपतवार के फैलने से प्रदेश चारे के अकाल जैसी स्थिति से जूझ रहा है.

हमें यह याद रखना चाहिए कि पहाड़ों में पशु पालन खुले चरागाहों में चुगान करने पर निर्भर था. जिससे पशु पालन की लागत कम आती थी. पशु को धन की संज्ञा दी गई थी. किन्तु अब मंहगे चारे ने पशुपालन व्यवसाय को खतरे में डाल दिया है. अन्य सुविधाएँ चाहे कितनी भी दी जाएं, जब तक भरपेट सस्ता चारा उपलब्ध नहीं होगा तबतक पशु पालन की हालत दयनीय ही रहेगी. इसका परिणाम बेसहारा छोड़े जा रहे पशुओं के झुंडों के रूप में सामने आ रहा है.

हमारी योजनाएं टुकड़ों टुकड़ों की समझ के आधार पर बनती हैं. जिससे एक काम बनता है तो दूसरा बिगड़ जाता है. भूमि उपयोग से जुडी योजनाएं भूमि पर आधारित सभी आर्थिक और पर्यावर्णीय प्रक्रियाओं की समझ पर समग्र दृष्टि से बनाई जानी चाहिए. प्रदेश की अधिकांश  भूमि तो वन विभाग के प्रबन्धन में है. इसलिए उनकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा बनती है की वन, कृषि, पशु पालन, बागवानी और जलवायु प्रबन्धन की जरूरतों को देखते हुए सर्वसमावेशी योजना बनाने की वकालत करें.

पिछले दिनों तमिलनाडु साकार ने खरपतवार उन्मूलन के प्रति दृढ़ता का परिचय देते हुए व्यापक कार्यक्रम शुरू करने का साहस दिखलाया है, जिससे पशुओं और वन्य प्राणियों को भी पर्याप्त घास मिल सके. तमिलनाडु उच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे का संज्ञान लिया है और आदेश दिया है कि यह कार्य खरपतवार काटने तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उखाड़ कर वहां स्थानीय घास लगाकर चरागाह विकसित करके स्थानीय पारिस्थितिकीय संतुलन को स्थापित किया जाना चाहिए.

इस प्रक्रिया को टिकाऊ बनाने के लिए स्थानीय समुदायों को भी जोड़ने का काम किया गया है. वह मॉडल हिमाचल प्रदेश के लिए भी उपयुक्त हो सकता है. उन्होंने पर्याप्त मात्रामें इस कार्य के लिए बजट उपलब्ध करवा कर गतिविधि को सहज बनाने के लिए निजी उद्योगों को भी जोड़ा है. लेंटाना से बायो चार बना कर बेकार खरपतवार का उपयोग किया जा रहा है. हिमाचल में भी चीड़ की पत्तियों और लेंटाना जैसी खरपतवारों के पेलेट्स बना कर उपयोग किये जा सकते हैं.

हालांकि हिमाचल में इस तरह के कुछ प्रयास हुए भी हैं किन्तु वे सफल नहीं हो सके क्योंकि उनको सरकार का पूर्ण सहयोग नहीं मिल सका. सरकार ने यह सोचा था कि यह अपने स्तर पर ही एक सफल उद्योग के रूप में स्थापित हो सकेगा ,किन्तु बायो चार या ब्रिकेट्स बनाने के बाद जिस बाजार में वह उत्पाद बेचना पड़ता है उसका भाव लाभदायक नहीं मिलने के कारण वे उद्योग बंद पड़ गए हैं.

यदि चरागाह विकास और वनों में आग नियंत्रण के कार्य को इससे जोड़ कर देखा जाए तो इन उद्योगों को सरकार द्वारा कच्चा माल उपलब्ध करवा कर उद्योग को भी सफल बनाया जा सकता है और कुछ बोझ निजी कंपनियां भी उठा सकती हैं. मनरेगा ( बी वी राम जी ) कार्यक्रम को भी इस गति विधि से जोड़ा जा सकता है.

इससे विभिन्न गतिविधियों को एक दुसरे का सहारा मिल सकता है. सस्ता घास चारागाह से उपलब्ध होगा तो पशुपालन आसन होगा, गोबर से खेत को खाद मिलेगी, खरपतवार से ब्रिकेट या बयोचार बना कर कुछ रोजगार खड़ा होगा, खेती में बेसहारा पशुओं द्वारा नुकसान कम होगा, वनों में लगने वाली आग पर कुछ नियन्त्रण हो सकेगा, हालांकि हिमाचल प्रदेश में भी समय समय पर खरपतवार उन्मूलन के प्रयास हुए हैं किन्तु उनको लगातार बढ़ावा देकर सफलता तक पंहुचने के प्रयास नहीं हो पाए ,न ही पर्याप्त बजट का प्रावधान हो सका. 2023 में “हटेगा फुलनू, लौटेगी चारागाह” के नाम से एक जागरूकता अभियान चलाया गया था.

कुछ जगह मनरेगा में भी खरपतवार उखाड़ने का काम हुआ था. किन्तु चरागाह स्थापित होने तक लगातार निगरानी और घास रोपण नहीं होने के कारण दोबारा वहां खरपतवार आ गया. और केवल जागरूकता भी कारगर नहीं हो सकती क्योंकि लेंटाना आदि खरपतवार उन्मूलन का काम सघनश्रम का कार्य है. इसे स्वैछ्चिक रूप से नहीं किया जा सकता. इसलिए प्रदेश को चरागाह पुनर्स्थापन के कार्य को बजट का जरूरी हिस्सा बनाना होगा जो प्रदेश की विभिन्न आर्थिक गतिविधियों को संबल प्रदान करेगा और वनों की, पर्वतीय क्षेत्रों की मांग के अनुरूप भूमिका को भी परिभाषित करेगा.

 

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