साहित्य आलोचना के सरोकार
स्त्री विमर्श : समकालीन परिदृश्य
ओमसिंह अशफ़ाक
सन् 2009 के जून माह में चार महिला-कथाकार एक हिंदी मासिक-पत्रिका के कथा परिदृश्य पर छा जाती हैं।
और पौराणिक काल से लेकर वर्तमान समय तक स्त्रियों के साथ हुई गैरइंसाफी, ज़्यादती और अमानवीय व्यवहार का कच्चा चिट्ठा सरेआम खोल बैठती हैं।
वे समकालीन समाज और शासक वर्गों से तर्कसंगत बहस करती हैं।
और नारी उत्पीड़न के नैतिक आधार एवं औचित्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं, जिनका कोई तर्कसंगत जवाब हमारे पास नहीं होता है।
उनकी तीन कहानियाँ तो ऐसी हैं जिनके कथानकों की नायिकाएँ भी स्त्रियाँ ही होती हैं।
दूसरी तरफ एक भी पुरुष-कथाकार यह हिम्मत नहीं करता है कि उनके मुकाबले में उतरकर अपनी कहानी के जरिए उनके सवालों का पाक-साफ जवाब दे सके! क्यों?
क्योंकि अब तक पुरुष ही तो कहते आ रहे थे और स्त्रियाँ सिर्फ सुनती रही थीं। अब आकर सदियों बाद उनकी कहने की बारी आई है।
तो क्या यह महज संयोग है? शायद नहीं। आकस्मिक घटना भी यह नहीं है।
गत कई दशकों से जो सामाजिक परिघटना चली आ रही है, यह उसी की एक अवस्था है, जो परिणति तक पहुँचने के संकल्प का आभास करा जाती है।
यह परिघटना इस सच्चाई की भी प्रतीक है कि आज स्त्रियाँ अपने दुःख दर्द खुद बयान करना चाहती हैं।
शायद इसलिए कि उनके जीवन के बारे में पुरुषों द्वारा जो कुछ अब तक कहा अथवा लिखा गया है वह अधूरा, एकांगी, अपर्याप्त तो है ही निष्पक्ष एवं न्यायसंगत भी नहीं है।
इसलिए स्त्रियों को अनेक वर्जनाओं और प्रतिबंधों को तोड़कर खुद ही साहित्य के मंच पर आना पड़ा है। ताकि वे अपनी आपबीती अपनी कलम से और अपनी आवाज में इस दुनिया को सुना सकें।
अपने जीवन का वास्तविक सच जमाने के समक्ष प्रस्तुत कर सकें।
जाहिर है देश और दुनिया की आधी आबादी ने जब ऐसा संकल्प कर लिया हो तो-
कोई भी संवेदनशील संपादक और पत्र-पत्रिका लंबे समय तक उनकी अनदेखी कर ही नहीं सकते है।
हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘हरिगंधा’ अंक-178 में एक साथ छपी चार महिला कथाकारों की कहानियों का ‘रहस्य’ कुछ ऐसी ही दृष्टि से समझ में आ सकता है।
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चार कथाकार हैं- उषा अग्रवाल (ज्योति किरण) कमल कुमार (कमलिनी) अंबु दुआ ‘जैमिनी’ (झुनझुना बजाये रहो) और नीरज तोमर (क्योंकि मैं एक लड़की थी)
उषा, कमल और नीरज की कहानियों में नारी स्वर केवल मुखर रूप में सुनाई तो पड़ता ही है।
बल्कि पुरुष प्रधान समाज की बेईमानी, बेशर्मी और धोखेबाजी की पोलपट्टी भी साफ-साफ खोलकर रख दी गई है।
अंजु दुआ की कहानी हालांकि आरक्षण के मुद्दे के इर्द-गिर्द रची गई है।
परंतु वहाँ भी हमें जातिवादी, पुरुषवादी वर्गीय संरचनाओं की मानसिकता की स्पष्ट झलक मिल जाती है।
‘ज्योति किरण’ डॉ. तन्मय बेनीवाल और सुश्री तन्वंगी सिवाच की प्रेम-कहानी है।
तन्वंगी हिसार के एक खाते-पीते परिवार की लाडली बेटी है।
हिसार निवासी डॉ. सिवाच मनोविज्ञान के विभागाध्यक्ष हैं और माता शांतिप्रभा परंपरागत विचारों की साधारण गृहिणी।
तन्वंगी बी.कॉम. की अंतिम वर्ष की छात्रा है।
और एम.बी.ए., करके अच्छी नौकरी के लिए ‘मैट, कैट या जी-मैट’ पास करके अमरीका से ही एम.बी.ए. करने का इरादा रखती है।
वह सुंदर, सौम्य, शालीन और गुणवान है। तभी तो अनामिका नामक उसकी सहेली उसे चम्पाकली कहकर छेड़ा करती थी:
चम्पा तेरे तीन गुण, रूप रंग और बास।
अवगुण तुझमें एक है, भ्रमर न आए पास !!
दूसरी तरफ एडवोकेट बलवंत राय बेनीवाल का बेटा तन्मय है जो ‘एम्स’ से एम.बी.बी.एस, करके लंदन से एफ.आर.सी.एस. कर चुका है।
उसके पिता ने चंडीगढ़ में ही शानदार ‘आपरेशन थियेटर’ बनवा दिया है और एक साल में ही उसकी प्रैक्टिस चमक उठी है।
एक शाम तन्मय पंजाब विश्वविद्यालय में आयोजित अंतर विश्वविद्यालय युवा महोत्सव देखने गया।
वहाँ हिसार की तन्वंगी का नृत्य देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठा और उसके प्रेम-पाश में बंध गया..
“अक्षत-यौवन, अनछुई-कली, अनबिंधे रत्न की प्रखर-प्रभा, मेरी आँखों में यह कैसा विस्मय तुमने भर दिया..?”
खैर ‘लव एट फर्स्ट साइट’ वाली ये प्रेम-कहानी ‘एरेंज्ड-मैरिज’ के रास्ते आगे बढ़कर विवाह बंधन में बंध जाती है।
और विवाहित-युगल दो महीने विदेश में हनीमून मनाकर वापस आ जाता है और विवाहित जीवन की गाड़ी ठीक रफ्तार से चली जाती है।
तभी एक दिन तन्मय का दोस्त पराग न्यूयार्क से आकर तन्वंगी को शरबत में मदहोशी की दवा पिला देता है।
और उसके साथ ‘यौनाचार’ कर डालता है और तन्मय अपने दोस्त को दोषी न मानकर पत्नी के चरित्र पर ही दोषारोपण करता है।
अंततः तन्मय के माता-पिता और चाचा सारे सबूत देखकर अपनी पुत्रवधु के पक्ष में खड़े होते हैं।
लेकिन तन्मय घर छोड़ने की धमकी देकर तन्वंगी को ‘ब्लैकमेल’ कर जाता है।
और तन्वंगी स्वेच्छा से ससुराल का घर त्याग कर अमेरिका एम.बी.ए. करने चली जाती है।
अर्थात् एक बार फिर निर्दोष होते हुए भी स्त्री को ही गृहत्याग करना पड़ता है?
फर्क यह है कि यहाँ ससुराल पक्ष के पुरुष भी बहु तन्वंगी के पक्ष में खड़े दिखाई पड़ते हैं जो कि सकारात्मक रुझान तो है।
परंतु यह अभी तक अपवादस्वरूप ही हो सकता है, सामान्य प्रवृत्ति नहीं है।
विशेषकर उस समुदाय में जो आज भी मुख्यतः सामंती और कबीलाई प्रवृत्तियों का संवाहक है।
गाँवों में तो आज भी प्रेम-विवाह का मतलब वहाँ प्रायः मौत है।
फिर भी कहना होगा कि उषा अग्रवाल के कथाकार के पास कहानी गढ़ने और कहने का बेहतरीन कौशल मौजूद है।
और पौराणिक साहित्य समेत उसे समकालीन विश्व एवं समाज की बेहतर जानकारी भी है।
जो उसकी कहानी का वातावरण निर्मित करती है और कहानी की विश्वसनीयता बढ़ा देती है।
उषा के यहाँ कहानी की उपयुक्त भाषा और संवादों की सटीकता देखी जा सकती है।
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‘ज्योति किरण’ में स्त्री की त्रासदी का ज्वलंत प्रश्न उठाते हुए कथाकर ने सतयुग की शकुन्तला, द्वापर की द्रौपदी, त्रेता की अहिल्या, कलियुग की यशोधरा की विडम्बना को उद्घाटित किया है।
कहानीकार ने ‘भारतीय पौराणिक परंपरा और रामराज्य’ की अवधारणा को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
कथाकार ने आधुनिक काल के बड़े कवियों- मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद की कविताओं की ओर भी संकेत किया है।
वहीं उनकी स्त्री संबंधी सोच की सीमाओं अपर्याप्ताओं को भी उजागर कर दिया है।
उससे यही प्रकट होता है कि आज की नारी ‘मर्यादा और लोकलाज’ के नाम पर अत्याचार सहते जाने को तैयार नहीं है।
इसीलिए भारत और विश्व में आज स्त्री अधिकारों के आंदोलनों का अभूतपूर्व उभार दिखाई पड़ता है।
उषा की इस कहानी में कुछ तथ्यात्मक भूल/कमियाँ भी नज़र आती हैं।
ऐसी चूक कहानी की विश्वसनीयता को संदिग्ध बना देती हैं।अतः रचनाकार को सचेत हो जाना चाहिए।
(जैसे कि शुरू में हमें तन्मय की माँ का नाम सुनयना बताया गया है जो बाद में बिना किसी स्पष्टीकरण के अनुसूया हो गया है।
(दूसरे, तन्मय एम.बी.बी.एस. करते ही ‘कामयाब सर्जन’ बन जाता है जबकि आज एम.एस. डिग्री से कम योग्यता वाले डॉक्टर से तो लोग सामान्य चीरा भी लगवाने का जोखिम नहीं लेना चाहते हैं)
बावजूद इसके कि कहानी का परिवेश चंडीगढ़ जैसे आधुनिक शहर का है?
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‘कमलिनी’ एक अविवाहित युवती दुली के माध्यम से रची गई लगनिया की कहानी है। (जो प्रकारान्तर से भारत की स्त्रीजाति की ही कहानी है)
जिसकी नंगी लाश जंगल के बीच मौजूद छोटी-सी तलैया में मौत के तीन दिन बाद तैरती पाई गई थी।
और सुना गया था कि वह वहाँ डूब मरी थी।
“पर नहीं कस्बे के दरोगा और आलुओं के आढ़ती ने शाम को अकेली पड़ गई लगनिया को रौंदा था।
“और फिर तलैया में धकेल दिया था..दरोगा की पुलिस जाँच कौन करता। लगनिया तलैया में डूब गई और उसका पानी हमेशा के लिए सड़ांध मारने लगा..”
” (अब) उसी तलैया में जंगली कमलिनी खिली रहती है।”
यों तो ठेकरी कस्बे की युवती दुली पढ़-लिख कर “शिक्षा मंत्रालय में स्कूल निरीक्षक बन गई है।और जिले के सारे स्कूल उसके अंडर में ही आते हैं”
पर एक दिन कस्बे में अपनी चाची से मिलकर बेलगाँव शहर लौटते समय उसे अधिक देर हो जाती है।
और वहाँ सड़क पर थोड़ी दूर खड़े हुए दो-तीन लोग उसकी तरफ देखकर आपस में बातचीत कर रहे होते हैं।
तभी बस स्टैंड पर अकेली बैठी दुली को लगनिया की कहानी स्मरण हो आती है।
“बुरा होने की संभावना बुरा होने से कम त्रासद नहीं होती है फिर औरत के साथ जो बुरा होता है..
“लगनिया की फूली हुई नंगी लाश उसकी आँखों में तैर गई थी…
“क्योंकि आदमी औरत के लिए कभी भी बिना सींग और पूँछ के दोपाये से हिंसक चौपाये में बदल जाता है..”
“उसने अपना बैग टटोला…फल काटने वाला चाकू उसे वहाँ नहीं मिला।
“मिल भी जाता तो क्या होता, अब जो होना होगा, वही होगा। वह कुछ नहीं कर सकती। उसने बदन को ढीला छोड़ दिया।
” मन-ही-मन गायत्री मंत्र का पाठ किया। ईश्वर ही उसके सम्मान की रक्षा करेंगे..
” घड़ी, सोने की चेन, कान के टॉप्स उसने सब निकालकर एक रूमाल में बाँध लिए थे।
“इससे पहले कि कोई कुछ कहे बह इशारा करते ही उसके हाथ में पकड़ा देगी…
“उसके मस्तिष्क से होती हुई भय की लहर उसकी रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में बिजली-सी कौंधी थी…
“बाहर की आवाजें, अंधेरा, सन्नाटा, भय सब कहीं विलीन हो गये थे। वह अपने भतर सीढ़ियाँ उतर गई थी।”
यह लगभग वैसी ही स्थिति है जैसे तूफान के समय शुतुरमुर्ग स्वतः ही रेत में गर्दन घुसाकर मर जाता है। यानी खतरे की आशंका से संज्ञाशून्य हो जाना।
सदियों से चली आई पितृसत्ता और अत्याचारों ने स्त्री को आत्मरक्षा के नैसर्गिक गुण से भी बंचित कर दिया है।
वह डरपोक और दब्बू हो गई है। उसका आत्मविश्वास गायब हो गया है।
बेशक बाहर वास्तविक खतरा चाहे उतना न हो, बह तो खतरों की आशंका मात्र से धराशायी हो जाती है।
इस समाज ने भय को उसके संस्कारों में ही जड़ दिया है।अतः यह भय कई बार वास्तविक कम, मनोवैज्ञानिक ज़्यादा होता है।
दुली के साथ भी इस कहानी में ऐसा ही होता है:
“उठो…उठो…जल्दी करो” गणेश बस रोके खड़ा था ‘आखिरी बस यही तो है।’ वह लटपट-सी उठकर भागी थी।
उसने उसे चढ़ जाने दिया, फिर लपककर गणेशी फुटबोर्ड पर चढ़ गया था। अंदर आकर सामने वाली सीट पर बैठ गया था। बस में थोड़ी सी सबारियाँ थीं।
“यह आखिरी बस न आती तो इसी चिंता में बीरू रुका रहा था, वापस जाना पड़ता तो आपको पहुँचाकर ही जाता-
“गणेशी ने दुली को बेलगाँव की बस के अंदर छोड़ने जाते हुए बताया था।”
क्या इसे रात में अपने घर में रुकने को कहे?
लेकिन वह उसे पहचान नहीं रही थी- जबकि वह उसके बारे में सब (बातें) ठीक-ठाक बता रहा था।
“उसे साथ चलने की क्या ज़रूरत थी। कहीं कोई साजिश तो नहीं…
“अब भी उसके भीतर तलैया के तले में जमा गाद और सड़ांध वाला पानी जैसे हिल रहा था।
“और साथ ही सफेद कमलिनी डोलने लगी थी। रुके हुए पानी में तो सड़ांध आएगी ही।
“जब से लगनिया का हादसा हुआ, तलैया को साफ कराया ही नहीं गया।”
कथाकार का उक्त कथन प्रकारांतर से इस रूपक के बहाने हमारी सड़-गल चुकी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था पर एक दुखद लेकिन सटीक बयान है।
जो इसे अविलंब बदल लेने की जरूरत को ही रेखांकित करता है।
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स्त्री-विमर्श की कड़ी में तीसरी कहानी ‘क्योंकि मैं एक लड़की थी..’नीरज तोमर की पहली कहानी है।
जो सांप्रदायिक राजनीति को स्त्री-अधिकारों के रास्ते में खड़ी की गई कृत्रिम अड़चन के रूप में पहचान लेती है।
और प्रश्न करती है- ‘समझ में नहीं आता हमारा अस्तित्व किससे जुड़ा है,उस पूजनीय रूप से (यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता) या आज के इस कड़वे सच से?’
“मैं कुछ घंटों की बच्ची मेरे माँ-बाप पर भारी होने लगी थी। मेरा लड़की होने का गम वे और अधिक सहन नहीं कर पा रहे थे।
“तभी उन्हें एक कुटिल युक्ति सूझी, जिसे सुनकर मेरी रूह काँप उठी। माँ-बाप की बात सुनकर मुझे वास्तव में यकीन हो गया कि लड़की होना बड़ा पाप है…
“जी हाँ, मेरे माँ-बाप ने मुझे शहर से दूर कहीं फेंक देने की युक्ति सोची।”
“माँ को ममता की देवी कहा जाता है..एक माँ ही है जो अपने बच्चों के बंद होंठों की भाषा भी समझ लेती है..
“माँ से पहले इस दुनिया में कोई पूजनीय नहीं है..परंतु मेरा स्पर्श मेरी माँ में ममता का संचार क्यों नहीं कर रहा है?”
स्पष्टतः इस प्रश्न का उत्तर भी पितृसत्तात्मक समाज की संरचनाओं में ही छिपा है।
भारतीय समाज में स्त्री की अपनी कोई विचार सरणी नहीं है।
वह सदियों से पुरुष समाज की विचारधारा की ‘संवाहक मात्र’ बनकर रहती आई है और उसी को ‘अपना विचार’ मान बैठी है।
“मेरी माँ ने मुझे शहर से दूर ‘एक कूड़े के ढेर पर निर्ममता से फेंक दिया…माँ मुझे मेरा कसूर तो बता दिया होता?…मैं उस कूड़े के ढेर पर अकेली पड़ी बिलख रही थी..
“पर मुझे खुशी थी कि मेरे जीवन का मोल कुत्तों ने ही सही पर किसी ने समझा तो..और आज नहीं तो कल मुझे इसका सामना तो करना ही था।
“अंतर सिर्फ इतना होता कि ये वास्तव में कुत्ते थे और बड़े होने पर मुझे ‘इंसानी कुत्ते’ मिलते… क्योंकि मैं एक लड़की हूँ।”
“और अब मेरे कुछ चित्थड़े (बचे थे) जिन्हें लेकर समाज के दो वर्ग अपने-अपने हथियार लिए एक दूसरे के सामने तैनात थे..
“हिंदुओं के अनुसार (मेरे) चित्थड़े हिंदू हैं और मुसलमानों के अनुसार वे (चित्थड़े) मुसलमान के हैं।
“ये लड़ाई (मेरे) लिए नहीं है बल्कि ये तो दो सम्प्रदायों की (राजनीति) है…क्योंकि मैं तो एक लड़की हूँ।”
ढाई पृष्ठ की यह छोटी-सी कहानी आत्मकथात्मक शैली में है।
जो स्त्री-अस्मिता और उसके अस्तित्व एवं दैनिक जीवन पर छाये भंयकर संकट को बयान करती है।
और इसके बरक्स सांप्रदायिक राजनीति के उस षड़यंत्र की कलई खोल डालती है-
जिसे स्त्री के वजूद एवं विकास की तो रत्ती भर चिंता नहीं है बल्कि उसकी सक्रियता तो स्त्री की मौत के बाद ही शुरू होती है।
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अंजु दुआ की कहानी (झुनझुना), जैसा कि हमने शुरू में संकेत किया था, नारी-विमर्श पर नहीं आरक्षण के मुद्दे पर केंद्रित है।
ये कहानी हमें जातिवादी पुरुषवादी वर्गीय संरचनाओं से परिचित कराती है।
परंतु यहाँ स्पष्ट दृष्टि के अभाव के चलते कहानी स्थितियों की स्पष्ट समझ एवं सकारात्मक संदेश नहीं दे पाती है।
और इस तरह कुछ हद तक प्रकृतवाद का शिकार होकर रह जाती है।
कहानी की भाषा, प्रस्तुतीकरण, पात्रों के संवाद आदि चीजें यथास्थान हैं, मगर कहानी का उद्देश्य और संदेश स्पष्ट नहीं हो पाता है।
कारण शायद यह है कि कथाकार की लोकेशन में कुछ गड़बड़ है।
कथाकार भीतरी यथार्थ को पकड़ने और विश्लेषित व्याख्यायित करने की बजाय जब ‘ऑब्जर्वर’ (पर्यवेक्षक) की भूमिका में आ जाया करता है,तो ऐसी स्थिति हो जाती है।
कैमरे की नज़र की तरह हमें ऊपरी घटनाक्रम तो सिलसिलेवार दिखाई पड़ता रहता है।
परंतु घटनाक्रम के ‘पीछे छिपे अथवा नीचे दबे’ क्रियाशील तत्त्व हमें दिखाई नहीं पड़ते हैं।
कुछ इस तरह जैसे पृथ्वी के गर्भ में क्रियाशील भूकंप की तरंगें हमारी आँखों को दिखाई नहीं पड़तीं।
बस उनके द्वारा भू-सतह पर किया गया विध्वंस ही हमारी आँखें देख पाती हैं।
आरक्षण जैसे मुद्दे पर लिखते समय हमें व्यापक तथ्यों की जानकारी, विषय का गहन अध्ययन विश्लेषण और विभिन्न आयामों के बारे में वस्तुपरक एवं तार्किक विचार-दृष्टि की दरकार होती है।
इसी से रचनाकार की लोकेशन तय होती है।
अन्यथा जिनको आरक्षण की जरूरत है, वे भी आरक्षण का सही अर्थ समझ नहीं पाते हैं।
दूसरों के पूर्वाग्रहों का अंदाजा तो आसानी से लगाया जा सकता है।
पंडित रामदीन और मोची धर्मेन्द्र की आर्थिक स्थिति में बेशक ज्यादा फर्क न हो, दोनों की सामाजिक हैसियत में जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है।
कहानी में उन पत्रों की भाषा-बोली भी कभी पलवल, कभी बुलंदशहर तो कभी बिहार की लगती है।
तो भी, हम इन कहानियों को लेकर कलावादियों की आपत्तियों से सहमत नहीं हो सकते हैं।
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रघुवीर सहाय ने कहा था ‘जहाँ सबसे कम ‘कला’ होगी, वहाँ सबसे अधिक परिवर्तन होगा।’
उक्त चारों रचनाकारों की सद्-इच्छाओं के बारे में हमें तनिक संदेह करने की जरूरत नहीं है।
बस, हमारी तो यही कामना है कि वे विशद अध्ययन स्वाध्याय करते हुए अपने अनुभव एवं दृष्टिकोण को और ज़्यादा व्यापक, तार्किक, पैना एवं मानवीय बनाते रहें।
निःसंदेह चारों कहानीकारों में हिंदी-साहित्य को और अधिक समृद्ध बनाने की क्षमताएँ मौजूद हैं।
( 2009में )
