साहित्य आलोचना के सरोकार
आज से हम ‘प्रतिबिंब मीडिया’ में साहित्य आलोचना के सरोकार शीर्षक के तहत नया स्तंभ शुरू कर रहे हैं। हमारी कोशिश होगी कि इस स्तंभ में साहित्य के विभिन्न पक्षों पर गहनता से विवेचन हो और साहित्य तथा साहित्यकार की सामाजिक भूमिका स्पष्ट हो! इस स्तंभ की शुरुआत हम ओमसिंह अशफ़ाक के कुछ लेखों से करने जा रहे हैं। हमारा आग्रह है कि दूसरे रचनाकार भी इस विषय पर अपने लेख जरूर भेजें।-संपादक
साहित्य में द्वंद्व और द्वंदहीन आलोचना
ओमसिंह अशफ़ाक
यह तथ्य लगभग निर्विवाद है कि व्यक्ति के मन और सामाजिक जीवन के तमाम क्रिया-कलापों की महीन जटिलताओं के रग-रेशों का खुलासा गद्य में ही सुविधाजनक तरीके से हो सकता है।
इसका अर्थ यह भी नहीं है कि कविता के माध्यम से आलोचना कार्य कभी हुआ ही नहीं है।
इस संदर्भ में हम थोड़ा आगे चलकर मध्यकाल के काव्य में झाँकने का प्रयास करेंगे और देखेंगे कि वहाँ काव्य के जरिए भी सामाजिक जीवन की आलोचना हुई है।
क्योंकि इस कालखंड में मुख्यतः कविता ही साहित्य की प्रमुख विधा थी।
परंतु जब कविता में सामाजिक जटिलताओं की बारीकियों को पकड़ने के प्रयास किए जाते हैं तो वहाँ कवि को बिम्ब, प्रतीक, सूक्ति, उपमा, रूपक आदि एवं आख्यान-प्रसंगों पर निर्भर हो जाना पड़ता है।
यह तथ्य भी अपनी जगह वाजिब है कि कविता में जो छंद, लय, गीतात्मकता, ध्वन्यात्मकता आदि से आकर्षण पैदा करने की क्षमता मौजूद है, वही उसे गद्य से अलगाती भी है।
वरना तो वर्ण, लिपि, भाव, भाषा, पद, क्रिया आदि तो गद्य और पद्य दोनों में एक समान ही होती है।
और भी सरलीकरण करना हो तो कह सकते हैं कि कविता में व्याप्त कथ्य में ज्ञान के ऊपर मनोरंजकता का मुलम्मा भी चढ़ा होता है।
जबकि गद्य में विषय में गुंथे ज्ञान को व्याख्यायित करने को वरीयता दी जाती है।
हालांकि संवेदना गद्य में भी उतना ही जरूरी तत्व है। संवेदनहीन गद्य ठस्स और उबाऊ हो सकता है। वह पाठकों को बाँधकर रखने में असमर्थ रहता है।
लेकिन यहाँ यह प्रश्न भी विचारणीय हो जाता है कि फिर भौतिक विज्ञान के विषयों से संबंधित लेख पाठक कैसे रुचि लेकर पढ लेता है?
जबकि वहाँ तो सिर्फ ज्ञान की प्रधानता होती है और संवेदना गैर-हाज़िर रहती है।
इस संबंध में हम यह कह सकते हैं कि वहाँ क्रिया, प्रतिक्रिया व प्रयोगों की संश्लेषणात्मक प्रक्रिया की उत्सुकता मौजूद होती है।
और नतीजों की प्रत्याशा का कौतुहल भी पाठक को बाँधे रहता है।
परंतु तमाम वैज्ञानिक प्रयोगों और शोध कार्यों के पीछे भी, थोड़ा दूर लेकिन गहरे में, विज्ञान लेखक के मन में मानव कल्याण की संवेदना भी सक्रिय रहा करती है।
जो उन्हें शोध और प्रयोगों के लिए क्रियाशील बनाती है। वही संवेदना उनके शोध और लेखन को पढ़ते समय पाठक के मन में ‘ट्रांसमिट’ हो जाती है अथवा जग जाती है।
बिना ‘सामाजिक-सोद्देशयता’ और उसके प्रति ‘संवेदना’ के कोई वैज्ञानिक ‘निरुद्देश्य’ आविष्कार नहीं करेगा।
बीमारियों के बचाव के सैकड़ों प्रकार के वेक्सीन और दवाइयाँ और परमाणु की ईज़ाद भी इसी संवेदना के तहत हुई हो सकती है।
यह अलग बात है कि बाद में उनका प्रयोग कौनसी भावनाओं के दबाव में और किन संवेदनहीनों द्वारा, किस उद्देश्य के लिए कर लिया जाता है?
जापान के हीरोशिमा और नागासाकी शहरों पर सन् 1942 में अमरीका द्वारा परमाणु बम गिराये गए थे।
कहते हैं कि उसके बाद अमरीका का खोजकर्ता वैज्ञानिक उस सदमें से विक्षिप्त हो गया था?
यह घटना उस वैज्ञानिक की आहत संवेदना को ही प्रकट करती है। खैर, यह थोड़ा अवांतर प्रसंग है।
यहाँ पर हमारा उद्देश्य विज्ञानपरक लेखन पर विचार करना न होकर हिंदी साहित्य पर चर्चा करने तक ही सीमित है।
यहाँ मुक्तिबोध की महत्वपूर्ण अवधारणा ‘ज्ञानात्मक संवेदन’ और ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ को क्रमशः गद्य और पद्य के संदर्भ में लागू माना जा सकता है।
यानी गद्य-रचना में पहले ज्ञान और फिर संवेदना उपजती है।
वहीं कविता की रचनाप्रक्रिया तो बेशक संवेदना से प्रस्फुटित होती है लेकिन उसके पीछे/साथ ज्ञान का आना भी लाज़िमी होता है।
अन्यथा ‘ज्ञान से रिक्त’ संवेदना निरी ‘भावुकता’ बनकर व्यर्थ हो सकती है जिससे साहित्य की कोई समृद्धि और समाज का भला हो सकना मुश्किल होता है।
फिर भी रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में ‘ज्ञान’ और ‘संवेदना’ के बीच ‘टाइम और स्पेस’ का इतना फासला नहीं है कि उनको सहजता से अलगाया जा सके।
कभी तो ये दोनों गुत्थमगुत्था होते हैं और कभी-कभी ‘ओवरलेपिंग’ वाली स्थिति हो सकती है।
कुछ-कुछ गुणासूत्र (‘क्रोमोसोम्स’) की तरह आपस में लिपटे हुए हो सकते हैं।
लेकिन अच्छे रचनाकार में इन दोनों की मौजूदगी आवश्यक है।
अन्यथा उसकी रचना निरर्थक, मूल्यहीन और अनुपयोगी हो सकती है।
जिस हद तक आलोचना-कर्म को रचनात्मक-कर्म माना गया है, उस हद तक आलोचक के अंदर भी उक्त दोनों गुणों की उपस्थिति आवश्यक कही जायेगी।
तभी कोई आलोचक किसी रचना की सही-सही व्याख्या करने में समर्थ हो सकेगा।
असल में मुक्तिबोध की उपरोक्त अवधारणा द्वन्द्वात्मक है और ‘द्वन्द्व का सिद्धान्त’ यूँ तो हिगेल की देन है।
लेकिन हिगेल के द्वन्द्ववाद पर ‘भाववाद’ प्रभावी था।
इसलिए कॉर्ल मार्क्स ने उसका श्रेय हिगेल को ही देते हुए कहा था कि मैंने तो सिर्फ हेगेल के सिद्धांत को सीधा पैरों पर खड़ा किया है
जोकि सिर के बल (यानी शीर्षासन की मुद्रा में) खड़ा हुआ था।
‘द्वन्द्ववाद’ का सार यह है कि ब्रह्मांड की बुनियाद में ही ‘द्वन्द्व’ है।
प्रकृति में द्वन्द्व है तो फिर प्रकृतिजन्य चीजें भी द्वन्द्वहीन नहीं हो सकती हैं।
वस्तु में भी द्वन्द्व है और मनुष्य में भी है। कुछ भी स्थिर नहीं है। सारी सृष्टि द्वन्द्व से संचालित है।
इसलिए सब ‘वस्तुओं और घटनाओं’ के पीछे द्वन्द्र सक्रिय है जिसको अनदेखा करके इन वस्तुओं-घटनाओं की विश्वसनीय व्याख्या नहीं कर सकते हैं।
इसलिए साहित्य को भी द्वन्द्वात्मक दृष्टि के बिना ठीक से नहीं रचा और न ही समझा जा सकता है।
कारण? साहित्य भी जीवन से जुड़ा होता है और जीवन प्रणाली द्वन्द्व से संचालित होती है।
जिस साहित्य में द्वन्द्वात्मक दृष्टि होती है, वही हमें ज़्यादा तर्कसंगत विश्वसनीय और मूल्यवान लगता है।
यथार्थवादी साहित्य इसीलिए ज़्यादा चर्चा में रहता रहा है चाहे वह गद्य में हो या कविता में।
जिस रचनाकार की घटनाओं के पीछे क्रियाशील यथार्थ को पकड़ने की दृष्टि, जितनी प्रखर और द्वन्द्वात्मक होती है। उसकी रचना उतनी ही सार्थक बन जाती है।
प्रखरता ज्ञान से संबंद्ध है और संवेदना द्वन्द्वात्मकता का विकास करती है।
इसके साक्ष्य भक्तिकाल के साहित्य से लेकर आज के ताजातरीन साहित्य तक में देखे जा सकते हैं।
कबीर के साहित्य से कुछ उदाहरण देखें :
जो तू भामन भमनी जाया।
आन बाट काहे न आया।
कबीर की ‘द्वन्द्वात्मक दृष्टि’ जातिगत ऊँच-नीच के भेदभाव की जाँच पड़ताल करती हुई उपरोक्त सवाल खड़ा करती है।
और भेदभाव की तमाम संरचना को ध्वस्त करके तथाकथित उच्च जातियों के समक्ष, यथार्थवादी साक्ष्य के जरिए एक नैतिक प्रश्न खड़ा कर देती है।
यही कि जब सबकी प्रजनन क्रिया समान है तो फिर जन्म के आधार पर कोई ब्राह्मण और कोई अछूत कैसे हो सकता है। इसी तरह:
तू कहता है कागद लेखी,
मैं कहता हूँ आँखिन देखी।
कबीर निरक्षर हैं। झोपड़ी में उसका निवास है और झोपड़ी काशी में स्थित है।
दूसरी और मठाधीश शास्त्रों में लिखे का हवाला देते हुए उसे शास्त्रार्थ करने की चुनौती दे रहे हैं।
शास्त्र को कबीर पढ़ नहीं सकते हैं लेकिन अपने अनुभव और व्यावहारिक ज्ञान के जरिए द्वन्द्वात्मक दृष्टि के चलते, शास्त्रों की ओट में किए जा रहे भेदभाव, पक्षपात और शोषण के जाल को पहचान जाते हैं।
और उपरोक्त दो पंक्तियाँ बोलकर शास्त्र की आड़ में खड़ी की गई झूठ और धोखे की टाटी को ध्वस्त कर डालते हैं। अब मठाधीश निरुपाय हो जाते हैं।
कबीर कहते हैं कि मुझे नहीं पता तुम्हारे शास्त्रों में तुमने क्या-कुछ झूठ-सच्च लिख रखा है?
मैं तो बस यह जानता हूँ कि जो अन्याय सबकी आँखों के सामने हो रहा है, तुम उसे कैसे न्यायोचित ठहरा सकते हो?
यानी प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या जरूरत है? तब सारा शास्त्र ज्ञान एक तरफ धरा रह जाता है।
रैदास के साहित्य में भी हमें इसी द्वन्द्वात्मक दृष्टि के अनेक साक्ष्य मिल जाते हैं :
मन चंगा तो कठौती में गंगा।
इस एक सूक्ति से रैदास सारे पाखंड की नींव को ढहा देते हैं।
उनके इस वाक्य से सारा कर्मकांड, सारा बाह्याचार निरर्थक हो जाता है।
वह कहते हैं कि प्रतिदिन गंगा में डुबकी लगाने से कुछ होने वाला नहीं है। यदि तुम अपने मन का मैल यानी छलकपट दूर कर लो तो तुम्हें गंगा नहाने की जरूरत ही नहीं रहेगी।
इस भाव के चलते ‘श्रम के पसीने’ से तरबतर गंगा तो रैदास की कठौती में बहती है जबकि निठल्ले लोग उसे न देखकर काशी के घाटों पर बहते जल में स्नान करके स्वयं को धन्य समझते हैं।
लेकिन बार-बार गंगा स्नान करके भी उनके मन का मैल नहीं धुलता है क्योंकि उन्होंने श्रम के द्वारा आजीविका अर्जित करके अपनी द्वन्द्वात्मक दृष्टि को आत्मसात नहीं किया है।
इसी प्रकार आगे एक जगह रैदास कहते हैं-
कहै रैदास खलास चमारा।
जो हम सहरी, सो मीत हमारा।।
यानी ये जाति-पाति निरर्थक है, जो हम जैसे शोषण ग्रस्त लोग हैं, वे सब हमारे मित्र हैं, चाहे उनकी जाति कुछ भी हो।
आखिर तो रैदास अपनी मन पसंद सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था का खुलासा भी कर देते हैं:
ऐसा चाहों राज मैं जहाँ मिले सबन को अन्न।
छोट बड़न सब सम बसें, रैदास रहे परसन्न ।।
उपरोक्त दोहे के जरिए रैदास स्पष्टतः समाजवाद के पक्ष में खड़े हो जाते हैं।
रैदास ऐसा राज्य चाहते हैं जिसमें छोटे-बड़े सब ‘समान व्यवहार’ के अधिकारी/पात्र बनकर रहें और कोई भी ‘भूखा-प्यासा’ न रहे, सबके विकास के ‘समान अवसर’ उपलब्ध हों।
और यह 600 साल पहले की लिखत है।
जो लोग समाजवादी व्यवस्था को ‘विदेशी विचार’ कहकर गरियाते रहते हैं वे संत रैदास के विचार की तौहीन ही कर रहे होते हैं।
गुरुग्रंथ साहिब के ज्ञान का अपमान भी कर रहे होते हैं क्योंकि गुरुवाणी का अधिकांश भाग रैदास-काव्य ही है।
रैदास के व्यक्तिगत जीवन से भी द्वन्द्वात्मक दृष्टि के साक्ष्य मिलते हैं।
उन्होंने तथाकथित उच्च जाति के लोगों से कोई पक्षपात अथवा भेदभाव नहीं किया है।
अन्यथा वह राजपूत जाति से संबंधित ‘उच्चकुल वधु’ मीराबाई को अपना शिष्यत्व क्यूँ प्रदान करते?
जबकि मीराबाई की जाति से संबंधित अधिसंख्य (या सभी) परिवार आज भी अपनी बेटी का नाम ‘मीरा’ नहीं रखते हैं।
उनकी मान्यता है कि मीरा ने एक “शूद्र को गुरु” धारण करके राजपूत जाति का अपमान किया था?
यानि उच्च जातियों में अभी भी जातिगत घृणा और पक्षपात मौजूद है।
उपरोक्त संक्षिप्त विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि मध्यकाल के संत साहित्य में संत कवियों ने कविता के माध्यम से सामाजिक विषमताओं और भेदभावों की आलोचना का महत्वपूर्ण कार्य “द्वन्द्वात्मक दृष्टि” से किया है।
जबकि गद्य लेखन का प्रचलन मुख्यतः आधुनिक काल में ही शुरू हो सका है।
आधुनिक हिंदी साहित्य में द्वन्द्वात्मक दृष्टिकोण का विकास देखा जा सकता है;
गद्य में मुख्यतः हाली, बालमुकुंद गुप्त, प्रेमचंद, यशपाल, राहुल सांकृत्यायन, अमृतलाल नागर, राही मासूम रज़ा, भीष्म साहनी, रामविलास वर्मा, राजेंद्र यादव, मैत्रेयी पुष्पा आदि लेखकों मे है।
और अन्यों में (जिनकी संख्या भी सैकड़ों में है) सामान्यतः देखा जा सकता है।
इसलिए उन्होंने आलोचना को भी द्वन्द्वात्मक नज़रिया दिया है।
कविता में द्वन्द्वात्मक दृष्टि निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध (पद्य और गद्य दोनों ही) शमशेर, रघुवीर सहाय, महादेवी वर्मा, कात्यायनी आदि रचनाकारों में विशेषतः दिखाई पड़ती है।
और अन्यों में सामान्यतः पायी जा सकती है। उनके द्वारा आलोच्य काव्य में भी वही दृष्टि मिलती है।
उर्दू साहित्य के भी अनेक नाम ऐसे हैं जो इसी दृष्टि के चलते हिंदी जगत में भी उतने ही लोकप्रिय और चर्चित हैं।
इनमें मीर, गालिब, फैज़, साहिर लुधियानवी, मंटो (गद्य में) इब्ने इंसा, आदि नामों की लम्बी फेहरिस्त है।
जिनके साहित्य में निरंतर “द्वन्द्वात्मक विज़न” मौजूद रहता आया है, चाहे उन्होंने गद्य लिखा या ग़ज़ल-नज़्म की फॉर्म में अपना कलाम पेश किया।
दुष्यन्त तो बेशक हिंदी गजल के अगुवा ही हैं।
हिंदी गद्य साहित्य की विरासत बहुत समृद्ध है। यहाँ उसकी मुक्तसर चर्चा का प्रयास हुआ है।
जिसमें समाकालीन रचनाकारों, विशेषकर 20वीं सदी के आठवें दशक में आए जनवादी प्रभाव रखने वालों का तो नामोल्लेख भी नहीं हो सका।
उस पर भी व्यापक चर्चा की आवश्यकता है जोकि यहाँ संभव नहीं हो सकी है।
और यही तर्क जनवादी कविता पर भी पूरी तरह लागू होता है।
जनवादी कविता की विवेचना को लेकर इधर हरियाणा में तो पूर्णतः सन्नाटा व्याप्त है।
अभी हाल में ही ‘हरियाणा की कविता: जनवादी स्वर’ नाम से प्रो. सुभाष चंद्र, कुरुक्षेत्र वि.वि. कुरुक्षेत्र की एक पुस्तक आई है।
उसने इस मौन को तोड़ने का कुछ प्रयास ज़रूर किया है जोकि प्रशंसनीय ही कहा जायेगा।
आशा की जानी चाहिए कि दूसरे लेखक भी इस चर्चा में शामिल होंगे और इसे आगे बढ़ाने में योगदान करेंगे।
यह सही है कि गुज़री सदी के अंतिम दो दशकों में भी और आज भी, बहुत बेहतरीन कविता लिखी गई है और लगातार लिखी जा रही है।
दोनों ही विधाओं के आलोचकों को यह सब मालूम है।
परंतु उसका सही-सही मूल्याँकन द्वन्द्वात्मक दृष्टि के बिना संभव नहीं है।
अतः हिन्दी आलोचना यदि अपने साहित्य का ठीक-ठीक मूल्याँकन करना चाहती है तो उसे अपनी आलोचना दृष्टि को द्वन्द्वात्मक बनाना ही होगा।
जिसका अभी तक मुख्य धारा की आलोचना में अभाव रहा है।
(2014में)
