ग्रामीण यथार्थ की परतें और नये कथाकार

साहित्य आलोचना के सरोकार

ग्रामीण यथार्थ की परतें और नये कथाकार

ओमसिंह अशफ़ाक

 

 

इस लेख में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि समकालीन ग्रामीण यथार्थ क्या है, कैसा है?

 

और नए कथाकार उस यथार्थ को किस तरह समझते, पकड़ते और चित्रित करते हैं।

 

इस संदर्भ में हमने पाँच कहानियों को विवेचना के लिए चुना है।

 

और ये पाँचों कथाएँ इनके रचनाकारों की पहली कहानी के रूप में पाठकों के सामने आयी हैं।

 

संयोगवश इनमें दो महिला और तीन पुरुष रचनाकार हैं।

 

भौगोलिक अवस्थिति के लिहाज़ से भी ये पाँचों रचनाकार हरियाणा की चारों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं।

 

प्रथम कहानी होने के बावजूद पाँचों में से तीन कहानीकार वय अनुसार युवा नहीं बल्कि प्रौढ़ और परिपक्व कहे जायेंगे।

 

वे कहानी के बजाय अन्य गद्य विधाओं में लिखते भी रहे हैं।

 

शायद इनमें शारदा यादव (‘संघर्षमय जीवन’) युवा लेखिका कही जा सकती हैं।

 

जो दक्षिण हरियाणा के छोटे लेकिन ऐतिहासिक शहर नारनौल में रहती हैं।

 

रतन लाल (‘हादसा’) भी वहीं पास के कस्बे महेंद्रगढ़ के निवासी हैं।

 

मनीषा प्रियंवदा (‘भागवन्ती’) का जन्म कालका में हुआ और ससुराल सिरसा में है।

 

इस तरह वह उत्तरी एवं पश्चिमी दोनों हरियाणा की नुमाइंदगी की हकदार हैं।

 

वीरेश (‘तरेड़’) बेशक पंचकूला में रहते हैं, परंतु उनकी कहानी का प्लॉट पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अवस्थित है।

 

जोकि हरियाणा राज्य की पूर्वी सीमा से एकदम सटता हुआ इलाका है।

 

जिसको सांस्कृतिक तौर पर हरियाणा से नत्थी करते हुए स्व०लेखक हरपाल सिंह ‘अरूष’ (मुज़फ्फरनगर) ने ‘कौरवी संस्कृति’ के नाम से पहचानने का सुझाव दिया है।

 

जिसका विस्तार वे हरियाणा के बाहर पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ भू-भागों तक हो जाना बताते हैं।

 

माजिद मेवाती की कहानी(‘स्त्री की कीमत’) मेवात जैसे पिछड़े और मुस्लिम बहुल इलाके में स्त्रियों की खरीद-फरोख्त पर केंद्रित है।

 

और उनकी पशुवत स्थिति की समस्या से पूरे परिवेश की मौलिकता के बीच यथार्थवादी चित्रण के साथ हम सबकी आँखें खोल देती है।

 

हम देख सकते हैं कि पितृसत्ता और कन्या भ्रूणहत्या के नतीजे कितने भयानक हैं।

 

**

 

शारदा यादव की कहानी (‘संघर्षमय जीवन’) नायिकाप्रधान कहानी है।

 

इसमें ब्राह्मण जाति की लड़की शक्तिबाला के दलित जाति के लड़के प्रशान्त के साथ प्रेमवश शारीरिक संबंध हो जाते हैं।

 

वह तीन माह की गर्भवती हो गई है। तभी उसकी सहेली सुमन उसे अपने माता-पिता से सारी बात बता देने और तुरंत शादी करने की सलाह देती है।

 

परंतु शादी में जातिवाद की दीवार आड़े आ जाती है और शक्तिबाला को मज़बूरन घर से भागकर प्रशान्त के साथ कोर्ट में शादी करनी पड़ती है।

 

दोनों रिवाड़ी कस्बे में किराये के घर में रहकर खूब खुश हैं, प्रशान्त किसी प्राइवेट स्कूल में हैडमास्टरी और शाक्तिबाला घर पर ही ट्यूशन करती है।

 

छः माह बाद पहले बेटे का जन्म और तीन साल बाद दूसरे बेटे का आगमन होता है।

 

प्रशान्त के दोस्त होटल में पार्टी की जिद्द करके ले जाते हैं, जहाँ से लौटते समय उनकी कार (टैक्सी) की ट्रक से टक्कर हो जाती है।

 

शक्तिबाला नाजुक हालत में विधवा होकर ससुराल पक्ष पर आश्रित हो प्रशान्त के गाँव में बच्चों सहित रहने लगती है।

जो पहले से ही आर्थिक संकट की चपेट में हैं।

 

इस स्थिति में माता-पिता के अंदर मानवीयता का भाव जागता है, तो वहाँ शक्तिबाला और दोनों बच्चों को आश्रय मिल जाता है।

 

लेकिन उसकी भाभी-भाई की नाराज़गी के चलते उसे जल्दी ही मायका भी छोड़ना पड़ता है।

 

अन्ततः शक्तिबाला नारनौल में किराए के मकान में आकर एक प्राइवेट स्कूल में जॉब करती है।

 

यहां स्कूल मालिक की यौन उत्पीड़न की हरकत के चलते उसे थप्पड़ मारकर नौकरी छोड़ देती है।

 

लेकिन तभी उसे अन्य स्कूल में जॉब मिल जाती है, जिसका मालिक सद्चरित्र और नेक इंसान है।

 

अब शक्तिबाला अपनी बचत और लोन से खुद का घर बनाने और दोनों बच्चों को पढ़ाने में सफल होती है।

 

बड़ा बेटा नेवी में भर्ती हो जाता है और छोटा बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर रहा है।

 

पंद्रह साल के अंतराल पर यहाँ उसकी सहेली सुमन की बाज़ार में शक्तिबाला के साथ दूसरी बार अचानक भेंट होती है।

 

और सुमन इस तरह उसके जीवन युद्ध का विवरण जानकर अत्यधिक खुशी और संतुष्टि का अनुभव करती है।

 

**

 

मनीषा प्रियवंदा की ‘भागवन्ती’ भी कहानी की नायिका है परंतु उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थिति सांमती परिवेश में है।

 

कालका में उसका मायका और विराटनगर के समीप घग्घर (नदी) के पार बुर्ज गाँव में मुखिया के घर में ससुराल है।

 

दोनों जगह जमींदार परिवार है। फर्क बस इतना है कि मायके में वह स्वेच्छा से घरेलू कार्य कर लेती है लेकिन ससुराल में तो पति कुलदीप ने उसे अवैतनिक नौकर बना छोड़ा है।

 

जहाँ पहाड़ी इलाका होने से पीने का पानी भी नीचे घाटी में उतरकर ढोना पड़ता है।

 

अत्यधिक शारीरिक श्रम भागवन्ती की समस्त ऊर्जा को शरीर से निचोड़ लेता है और वह बहुत कमज़ोर हो जाती है।

 

बावजूद इसके क्रमशः चार बच्चों को पैदा करके उसके शरीर का निचला हिस्सा यानी दोनों टाँगें अशक्त होकर उसे चलने-फिरने में असमर्थ बना देती हैं।

 

पी.जी.आई. चंडीगढ़ में उसकी छाटी बहन के आग्रह पर बहनोई उसको रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन के लिए भर्ती कराता है तो पति खून देने से पीछे हट जाता है।

 

क्योंकि उसने तो दूसरी शादी कर ली है और अब इस स्त्री की उस जमींदार को क्या ज़रूरत है?

 

नतीजतन भागवन्ती को चंडीगढ़ से इलाज के बाद फिर अपने मायके कालका लौटना पड़ता है और पति वायदा करके भी उसे लेने नहीं आता है।

 

समय बीता, उसके बच्चे बड़े और विवाहित हुए, परिवार बढ़ा तो बंटवारा और अलगाव भी हुआ और अब वे बच्चे अपनी माँ भागवन्ती को अपने साथ लिवा ले गए।

 

भागवन्ती सौतन के बच्चों को भी बड़ा स्नेह करती परंतु पति कुलदीप ने तब भी उसकी सुध नहीं ली।

 

और अंततः भागवन्ती अपनी जीवन यात्रा समाप्त करके एक दिन इस दुनिया से चल बसी।

 

अब भागवन्ती के मृत शरीर पर झूठी शान और रस्मोरिवाज के तहत उसका पति गोटे किनारी वाला दुपट्टा ओढ़ाता है।

 

और मायके की ओर से बड़ी भाभी बेशकीमती ओढ्नी ओढ़ा देती है।

 

**

 

उपरोक्त दोनों कहानियाँ हमारे समाज में स्त्री की त्रासदी से हमें परिचित कराती हैं।

 

शक्तिबाला अपने हमउम्र दलित युवक से स्वाभाविक प्रेम कर बैठती है, क्योंकि दोनों आमने-सामने रहते हैं।

 

वे प्रतिभावान हैं, साहित्य और शिक्षा के संपर्क ने उनके सामने नये विचारों की आज़ादी की आकांक्षा की एक खिड़‌की खोल दी है।

 

शक्तिबाला कॉलेज में ‘बेस्ट एक्स्ट्रैस’ का अवार्ड ले चुकी है, तो प्रशान्त भी होनहार लड़का है, अंग्रेज़ी में एम.ए., हर क्लास में बहुत अच्छे अंक लेता है।

 

परंतु दोनों के विवाह में तथाकथित जातिगत ऊँच-नीच आड़े आ जाती है जो उनके अब तक सामान्य और सुखी जीवन को कष्टपूर्ण बना देती है।

 

उसके बाद प्रशान्त की दुर्घटना में मौत से तो शक्तिबाला के ऊपर विपत्तियों का पहाड़ ही टूट पड़ता है।

**

 

शक्तिबाला के चरित्र में हमें एक संघर्षशील, साहसी, तर्कशील और हार न मानने वाली युवती के दर्शन होते हैं।

 

परंतु भागवन्ती परिस्थितियों को “भाग्य का फेर” मानकर उनसे समझौता कर लेती है।

 

हालांकि दोनों पात्रों में प्रतिभा की कमी नहीं है। उनके व्यक्तित्व में यह अंतर परिवेशगत है, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ है।

 

भागवन्ती को उच्च शिक्षा का अवसर नहीं मिला है जहाँ उसका परिचय नये विचारों, नये मूल्यों और नयी उमंगों से हो सकता था।

 

इसलिए पिछड़ी हुई सामाजिक रूढ़ियों और पितृसत्तात्मक अन्याय का विरोध करना वह नहीं सीख पायी है। और इस सबको अपनी नियति के रूप में स्वीकार करके चलती है।

 

खटती रहती है और अपना पूरा जीवन बेमकसद होम कर देती है जबकि शक्तिबाला के समक्ष चुनौतियाँ ज़्यादा जटिल होने के बावजूद वह परिस्थितियों को बदलने का निरंतर प्रयास करती है।

 

“जातिवाद और पितृसत्ता” से टकराती हुई एक दिन सफल हो जाती है और स्वयं को अपनी शतों पर समाज में स्थापित कर लेती है।

 

**

 

‘संघर्षमय जीवन’ में लेखिका की दृष्टि सामाजिक घटनाओं के पीछे क्रियाशील यथार्थ को पकड़ लेती है।

 

यहाँ पाठक भी समझ जाता है कि यह जातिवाद और पितृसत्ता ही है जो जवां दिलों की जिंदगी के फैसलों में बाधा बनकर अड़ा हुआ है।

 

जो उन्हें अपने निर्णय खुद करने की आज़ादी नहीं देता है।

 

उधर भागवन्ती से पाठक की हमदर्दी तो जुड़ती है, उसके साथ हो रहे अन्याय से अफसोस और वितृष्णा भी होती है।

 

परन्तु लेखिका भागवन्ती के माध्यम से पाठक के मन में अपने हकों के लिए लड़ने, अन्याय का प्रतिवाद और संघर्ष करने का जज्बा पैदा नहीं कर पाती है।

 

इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि भागवन्ती शक्तिबाला से दो पीढ़ी पहले का (करीब 50 वर्ष पूर्व) पात्र है।

 

सामंती परिवार में है और स्त्री चेतना का पर्याप्त विकास उसमें नहीं हुआ है।

 

दूसरा कारण लेखिका के अंदर ‘द्वन्द्वात्मक दृष्टि’ का अभाव हो सकता है।

 

जिसके चलते वह यथार्थ के उन पक्षों, जिनमें द्वन्द्व और संघर्ष चलता रहता है, वहाँ फोकस करके, उनको उभारकर पाठकों के सामने नहीं ला पायी है।

 

इस संबंध में हम प्रेमचंद और दूसरे यथार्थवादी लेखकों से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

 

प्रेमचंद ने अपने युग में भी बहुत से संघर्षशील स्त्री पात्रों को गढ़ा है।

 

‘संघर्षमय जीवन’ की लेखिका में हमें ‘ज्ञानात्मक संवेदन’ दिखायी पड़ता है।

 

जबकि ‘भागवन्ती’ की लेखिका में ‘संवेदना’ तो पर्याप्त है परंतु ‘ज्ञानात्मकता’ की कमी कहीं रह गई लगती है।

 

मुक्तिबोध के अनुसार दोनों ‘ज्ञानात्मक संवेदन’ और ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ का साथ-साथ होना आवश्यक है।

 

तभी लेखक क्रियाशील और महत्वपूर्ण यथार्थ को पकड़ सकता है जो कि उत्कृष्ट रचना के लिए ज़रूरी है।

 

जहाँ तक कहानी में पठनीयता, रवानगी, रोचक कथानक, चरित्र-चित्रण, संवाद, परिवेश और वातावरण निर्माण का पक्ष है; दोनों कहानियाँ इस दृष्टि से भी सफल कही जायेंगी।

 

यहाँ कुछ प्रसंगों का संक्षिप्त अंश उद्धृत है :

 

“शाम के पाँच बजे थे। पेड़ों से छन-छन कर धूप बस स्टैंड के अंदर आ रही थी। ‘अनाउंसर’ आने वाली बसों के बारे में सूचना प्रसारित कर रहा था।

 

पक्षियों की कोलाहल के कारण लाउडस्पीकर की आबाज स्पष्ट सुनाई नहीं दे रही थी।

 

तीव्र गर्मी के कारण बदन से पसीना चू रहा था..। लगता था सारा खून पसीना बनकर निकल जाएगा। सांय-सांय करती लू भी जी का जंजाल बनी थी।

 

बस का इंतज़ार करते-करते मेरी आँखें पथरा गई थीं।

 

स्कूल कैडर में अंग्रेज़ी लैक्चरार की ‘पोस्ट’ के लिए यहाँ रोहतक में इंटरव्यू देने के लिए मैं आई थी।

 

मेरे पति भी साथ आने की जिद कर रहे थे, परंतु मैंने ही मना कर दिया था। छेड़ते हुए मैंने कहा था, “नौकरी लगने पर भी क्या मुझे छोड़ने-लेने जाओगे?

 

आत्म-निर्भर नहीं बनने दोगे मुझे।”

 

गर्मी के मौसम में किसी बस स्टैंड पर फंसे यात्री का इससे ज़्यादा विश्वसनीय चित्रण और क्या हो सकता है।

 

जो लोग साधारण बसों में सफर करते हैं उन्हें हर मौसम में ऐसी यातना झेलनी पड़ती है।

 

“इंतज़ार की घड़ी बहुत लंबी होती है, एक घंटा ऐसे लगता है मानों एक युग बीत गया हो..।

 

“थोड़ी देर में नारनौल रूट की बस आ गई। मैं भागकर बस में घुस गई, बड़ी मुश्किल से सीट पाने में सफल हो पाई।

 

“यहाँ बस का दस मिनट का ‘स्टोपिज’ है। उमस के कारण अंदर सवरियों का बुरा हाल है। बाहर खड़े-खड़े कुछ तो हवा मिल रही थी..।

 

“निर्धारित समय पर बस चली। मैं खिड़‌कियों से बाहर देखने लगी। कहाँ गया वो पुराना रोहतक ?

 

“कितनी हरियाली थी यहाँ उस समय। अचानक यह कंक्रीट के जंगल में कैसे तबदील हो गया?

 

ये सवाल मेरे मन में घूमते रहे। करीब बीस मिनट बाद कुछ पेड़ नज़र आए।”

 

अब यहाँ नीचे प्रकृति चित्रण और वातावरण निर्माण करती कुछ पंक्तियाँ उद्धृत की जा रही हैं:

 

“बस के कलानौर पहुँचने के साथ ही मूसलधार बारिश शुरू हो गई। घुमड़-घुमड़ कर बादल बरस रहे थे। बीच-बीच में बिजली भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाती थी।

 

बस सामान्य रफ्तार से दौड़ी जा रही थी,ज्यों ही यह दादरी स्टैंड पर रुकी, एक महिला अंदर घुसी और मेरे आगे वाली सीट पर खिड़की के पास बैठ गई।

 

वह चेहरा मुझे कुछ परिचित-सा लगा, लेकिन उसका नाम याद नहीं आ रहा था।

 

दिमाग पर कुछ ज़ोर डाला तो मानस-पटल पर एक आकृति उभरी जिसका नाम था- “शक्तिबाला”। कहीं यह शक्तिबाला तो नहीं?

 

फिर अगले पल मन में यह आशंका उभरी “इसकी उम्र और शक्तिबाला की उम्र में तो दिन रात का अंतर लग रहा है।

 

“वह तो मेरी हमउम्र थी और यह तो इतनी बड़ी उम्र की.. नहीं, शक्तिबाला नहीं हो सकती।”

 

उपरोक्त उद्धरण में बाद की पंक्तियाँ लेखिका की ‘द्वन्द्वात्मक सोच’ का स्पष्ट नमूना प्रस्तुत करती हैं।

 

ऐसा लेखक यथार्थ के हर कोने में झाँकने और स्थितियों की पूरी नाप-जोख और पड़ताल के बाद ही अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचता है।

 

इससे विवरण की ‘एक्यूरेसी’ और ‘विश्वसनीयता’ असंदिग्ध हो जाया करती है।

 

नीचे उद्धृत पंक्तियों से लेखिका के कहानी बुनने और कहानी कहने के कौशल से पाठक का परिचय हो जाता है।

 

कैसे कथानक को ‘फ्लैश बैंक’ या ‘फैंटेसी’ के जरिए आगे बढ़ाया जाता है:

 

‘शक्तिबाला’ शब्द जहन में आते ही मैं यादों के मेले में खो गई।

 

“शक्तिबाला मेरी बचपन की सहेली थी। उसका घर हमारे घर से कुछ ही दूरी पर था। पहली कक्षा से बी.एड. तक की शिक्षा साथ ग्रहण की थी हमने।

 

पढ़ने-लिखने में हमेशा अव्वल रहती थी वह। कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़कर भाग लेती थी।

 

“लेकिन नाटकों में उसकी रुचि सबसे ज़्यादा थी। हर वर्ष उसे कॉलेज में ‘बेस्ट एक्ट्रेस’ का अवार्ड मिलता था। हर भूमिका को बड़ी संजीदगी से वह निभाती।

 

“बी.एड. के दौरान तो वह पूरे राज्य में प्रथम रही थी, विधवा का रोल बखूबी निभाया था उसने।”

 

कहानी के संवाद भी एकदम सटीक और चुटीले हैं: “तो फिर दिक्कत क्या है? कर लो शादी!” सुमन ने राहत की साँस छोड़ते हुए कहा था।

 

“कर लो शादी- जैसे तूने कहा और मैं चली गई ससुराल। मेरे माता-पिता तो इसकी इजाजत नहीं देंगे।” बेचैन होकर शक्तिबाला ने कहा।

 

“तू बात चलाकर तो देख। ऐसे कब तक इंतज़ार करती रहोगी डर-डरकर….”

 

“शक्तिबाला के मन में द्वन्द्व चल रहा था शेक्सपियर के नायक हैमलेट के ‘टू बी और नॉट टू बी’ की तरह..

 

“क्या कहा शादी करेगी उस हरिजन लड़के से?” अंगारे बरसाते हुए उसके पिता ने कहा था।”

 

**

 

मनीषा ने ‘भागवन्ती’ में अपने ननिहाल की दुनिया का बड़ा बाल सुलभवर्णन किया है जोकि बहुत स्वाभाविक और विश्वसनीय है।

 

“पीले रंग की घुटनों से ऊँची मलमल की कुर्ती और काले रंग की खुली सलवार पहने थी।

 

काले रंग के दुपट्टे में उसका स्वर्णिम चेहरा दमक रहा था।”

 

भागवन्ती इससे बेखबर थी कि कुलदीप उसे पसंद करने आ रहा है और इस सादगी और सौंदर्य पर वह मुग्ध हो जायेगा।

 

ससुराल में “कोई दवा दारू न करता। एक दिन तो जब वह बहुत तंग हो गई थी।

 

“अपनी अंगूठी किसी के यहाँ गिरवी रखकर कुछ रुपयों का प्रबंध कर अकेली छोटे बच्चों के साथ मायके चली आयी।

 

इस बीच उसके दो बेटियाँ और दो बेटे भी हो चुके थे।

 

उसने “पति को कभी दोषी नहीं माना। पति के दूसरी शादी कर लेने पर भी वह हमेशा अपने पति का पक्ष लेती..

 

“अपने अंतिम समय में वह बहुत कमज़ोर हो गई थी..अब उसे मौत का भय नहीं सताता था।

 

“वह निश्चिंत थी कि जिस घर में उस की डोली आयी थी, उसी घर से उसकी अर्थी निकलेगी।”

 

उपरोक्त उद्धरण पुष्टि करता है कि भागवन्ती पूरी तरह ‘पितृसत्तात्मक विचारधारा’ की गिरफ्त में थी।

 

“अंतिम संस्कार के समय मायके से भाई-भाभियाँ आयीं। बड़ी भाभी ने ही उसे नहलाया, उसका श्रृंगार किया सजाया।

 

“आँखों में काजल लगाया, बिन्दी सुर्खी लगायी, सुर्ख जोड़ा (शादी वाला) पहनाया और अंतिम दर्शन के लिए आंगन में लिटाया।”

 

यानी जिस सुहाग ने उसका जीवन यातानाग्रस्त बनाकर रखा, मरने के बाद भी उसी सुहाग के लिए समस्त श्रृंगार किए गए।

 

पर अब उसे इससे कोई लाभ नहीं हो सकता था। उसके लिए तो सुहाग जवानी में उजड़ चुका था।

 

अब भी उस मृतदेह पर उसी जालिम पति का अधिकार स्थापित किया जा रहा था जिसने उसका जीवन नर्क बनाकर रखा।

 

यानी स्त्री देह मरकर भी आज़ाद नहीं हो सकती।

 

स्त्री-अधिकार-चेतना से संपन्न किसी लेखिका को यहाँ पर ऐसे तमाम प्रश्न उठाने का अवसर उपलब्ध था।

 

जो पाठक वर्ग की चेतना को विकसित करके स्त्री समाज को और अधिक संपन्न बनाने में सहायक हो सकते थे।

 

**

 

‘हादसा’ कहानी हमें दक्षिणी हरियाणा के ग्रामीण परिवेश में व्याप्त शराबखोरी से उत्पन्न परिवार-विनाश-लीला की गंभीरता का ज्ञान कराती है।

 

जहाँ पहले पिता, फिर बड़ा भाई, फिर बहनोई और फिर मझला भाई शराबखोरी के चलते मौत का ग्रास बनते हैं।

 

और पीछे छोड़ जाते हैं अपने परिवारों के ऊपर ढेर सारी मुसीबतें।

 

ये घटनाएँ हादसा नहीं बल्कि त्रासदियां हैं।

 

**

 

नशा एक ऐसी शै है, जो सभी मुश्किलों का काल्पनिक और क्षणिक समाधान पेश करता है।

 

हर दिक्कत से बचने के लिए नशा एक व्यक्तिगत आसान रास्ता उपलब्ध कराता है।

 

अपनी परेशानियों से आँख चुराने के लिए व्यक्ति नशे की शरण में जाकर कुछ राहत ढूँढना चाहता है।

 

लेकिन मुसीबतों ने तो इस तरह दूर होना नहीं होता है। उल्टे नशे की एक और मुसीबत व्यक्ति अपने गले में डाल लेता है।

 

और परेशानियों, दिक्कतों, मुश्किलों से दूर रहने के लिए धीरे-धीरे वह चौबीसों घंटे नशे की गिरफ्त में रहने लगता है।

 

क्योंकि नशा उसके बचे-खुचे आत्मविश्वास को भी खत्म कर डालता है।

 

और होश में आते ही उसे फिर मुश्किलों का भय डराने लगता है और उससे आँख चुराने के लिए उसे फिर तुरंत नशे की खुराक की तलब होती है।

 

इस तरह उसके जीवन में एक दुष्चक्र प्रारंभ हो जाता है,जो उसे सेहत की दृष्टि से नष्ट कर देता है।

 

उसके परिवार को आर्थिक तौर पर और आस-पड़ौस को सामाजिक तौर पर तोड़ देता है।

 

**

 

रतनलाल की कहानी से हम कुछ ऐसी ही सीख ले सकते है। नशाखोरी अकेले दक्षिणी हरियाणा की नहीं बल्कि पूरे राज्य की गंभीर समस्या बन गई है।

 

कमोबेश पूरे देश में इसने तबाही मचा रखी है।

 

यथार्थ के धरातल पर खड़ी यह छोटी-सी कहानी आत्मकथात्मक शैली में समस्या का चित्रण करती है।

 

जिससे उसकी विश्वसनीयता और अधिक बढ़ जाती है।

 

कहानी यह भी दिखाती है कि इतनी विकट परिस्थितियों में भी अभी तक उस समाज में बहन के रूप में, माँ के रूप में, छोटे भाई के रूप में और सहपाठी दोस्तों के रूप में स्नेह, सहयोग और आश्वस्ति के मूल्ये बचे हुए हैं।

 

जो मुख्य पात्र को संकट को झेल जाने की हिम्मत और प्रेरणा का बायस बनते हैं।

 

**

 

मैक्सिम गोर्की ने कभी लिखा था कि जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण भी आते हैं जब व्यक्ति सांत्वना के दो शब्द सुनने को भी तरस जाता है।

 

ऐसे संकट में वे दो शब्द उसके लिए संजीवनी का काम करते हैं।

 

“आज मैं किसे अपना सहारा मानूँ? भगवान ने न जाने कितने गम मेरी किस्मत में लिखे हैं।

 

“मेरी दसवीं की परीक्षा के दौरान ही पिताजी की मृत्यु हुई..फिर करतार भाई कि मौत जो मुश्किल से 46 वर्ष का था।

 

“अब इस भाई (मझले) की जुदाई ने तो मुझे अंदर से ही हिला दिया है। मुझे सांत्वना देने वाला कोई नहीं है। बच्चे सारे छोटे हैं..”

 

यहाँ लेखक की द्वन्द्वात्मक सोच का साक्ष्य भी मिलता है।

**

इस कहानी से हमें यह भी पता चलता है कि विकट परिस्थितियों में भी प्रतिभा रचनात्मक दिशा पा सकती है-

 

“मैं एक कबाड़ी की दुकान पर बैठकर गम भुलाने के लिए फिल्मी गीत सुनता था… यहीं से साहित्य के प्रति मेरा रुझान बढ़ा।

 

“साहिर लुधियानवी के प्रति आकर्षण भी इसी समय की देन है।”

 

निम्न पंक्तियों में हमें संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना के संकेत भी दिखाई पड़ जाते हैं :

 

“शराबी पिता के बच्चे होने के कारण हमारा रिश्ता अच्छे घरों में नहीं हो सका।

 

“बहन का विवाह भी एक शराबी व्यक्ति से हुआ। उसने कभी बहन को चैन की साँस नहीं लेने दी। मात्र 37 वर्ष की आयु में बहन विधवा हो गई।

 

“अब हमारे परिवार में चार विधवाएँ हैं। किसी को भी अचछा जीवन साथी नसीब नहीं हुआ।”

 

**

 

वीरेश की कहानी ‘तरेड़’ हरियाणा के पूर्वी-अंचल अथवा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँव के बदलते यथार्थ से हमारी मुठभेड़ कराती है।

 

आज उस गाँव को भी आवारा पूँजी की खुरचन ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है।

 

बाजारू मूल्यों ने गाँव के वातावरण को प्रदूषित करके ज़हरीला बनाया है।

 

अब गाँव भी हरामी पूँजी की चपेट में आकर भाईचारा, खून का रिश्ता और सारे नैतिक मूल्यों को भूल चुका है।

 

अब गांव भी मुनाफे का रिश्ता पकड़ रहा है जिससे परिवारों की एकता में तरेड़ आना शुरू हो गई है।

**

कहानी का नायक ‘मैं’ सुरक्षा बल की नौकरी करता है और दस माह बाद 72 घंटे की रेल-बस यात्रा करके अपने गाँव लौटता है।

 

यह सोचकर कि एक महीना अपनों के बीच बिताऊँगा। खेती-बाड़ी में उनका हाथ बटाऊँगा। अच्छा लगता है उनके साथ दुःख जोतना ओर सुख बोना..

 

वह अंदर जाकर बरामदे में चारपाई पर बैठ जाता है।

 

इस बीच मझला भाई गैलरी में मिला था तो “क्या हाल है” पूछता हुआ ऐसे गुज़र जाता है जैसे वह रोज़ ही उससे मिलता रहा हो।

 

“बच्चे मुझे घेरे खड़े हैं..उनकी उत्सुक निगाह बार-बार मेरे बैग पर जाती है। बैग खोलकर मैं उनके मतलब की चीजें उन्हें बाँटता हूँ। वे खुश हैं।”

 

अंदर कमरे में “बड़ी भाभी एक चारपाई पर लेटी सो रही है या सोने का बहाना कर रही है।

 

“मंझली भाभी उनके पास पीढ़े पर बैठी दवा जैसा कुछ लगा रही हैं। मैं उन्हें नमस्ते करता हूँ। उत्तर में वे “कैसे हो?” पूछ अपने काम में लग जाती हैं।”

 

“कुछ खोजता-सा मैं बाहर बैठक पर आ जाता हूँ। पिताजी नहीं हैं, कहीं गाँव में निकल गए होंगे। मंझला भी कस्सी फावड़ा उठाकर खेतों पर चला गया है।”

 

“मैं चारपाई पर लेटा अपने घर के व्यवहार में आये परिवर्तन के विषय में सोचने लगता हूँ।

 

“पहले जब छुट्टी पर आता था तो पिताजी और छोटे चाचा अपने पास बिठाकर बड़े स्नेह से घंटों तक मेरा हाल-चाल पूछते रहते थे।

 

“माँ अपने आंचल का सारा प्यार मेरी थाली में उड़ेल दिया करती थी। बड़े भैया और मंझला कितने प्रसन्न रहते थे। हम तीनों ही एक साथ खाना खाते थे।”

 

बदलाव के रहस्य को जानने हेतु कथा-नायक चचेरे भाई बलवंत (जिसकी शीघ्र ही शादी भी है और नायक उसी हिसाब से छुट्टी एडजस्ट करके आया है) से अपनी पत्नी के व्यवहार के बारे में पूछता है।

 

बलवंत-“क्या बात करते हो भाई साहब ! वे (कांता भाभी) तो गऊ हैं।”

 

पहेली को अनसुलझा छोड़ नायक सो जाता है। सफ़र की थकान उसे नींद के आगोश में ले गई है।

 

सूर्यास्त के समय नींद टूटी तो चबूतरे पर पिता, चाचा, भाई सब मौजूद हैं। वह भी उनके बीच जा बैठता है।

**

“तनख्वाह कुछ बढ़ी या नहीं? छोटे चाचा ऐसे लहजे में पूछते हैं, जैसे शरारती बच्चे से पूछा जाता है। पिलखन की एक शाखा अचानक हिली।

 

“इस नौकरी में तरक्की का भी कुछ चानिस है?” छोटे चाचा का दूसरा प्रश्न खाँसता है।

 

“मुंशी मास्टर का लड़का सहकारी समिति की नौकरी में मोटे पैसे कमा रहा है।” वे बताते हैं।

 

पिताजी बड़े भैया का नाम लेकर कहते हैं कि “वह तो कम पढ़ा लिखा होकर भी अच्छे पैसे कमा रहा है-ठेकेदारी में..”

 

नायक को उसका आक्रोश “बाँह पकड़कर उठाता है और आत्म नियंत्रण धकेल कर अंदर ले जाता है।”

 

नायक की पत्नी कांता सारे परिवार को खिला-पिला कर बर्तन भांडे कर रही है।

 

कुछ देर बाद मुस्कुराते हुए कमरे में प्रवेश करती है, चारपाई पर बैठकर पैर सहलाती हुई पूछ बैठती है, “अब आपको कितनी तनख्वाह मिलती है?”

 

नायक पत्नी के “एक तगड़ा झापड़ रसीद कर देता है।

 

“अनापेक्षित प्रहार से वह सन्न रह जाती है।” साथ वाले कमरे में बड़े भैया और भाभी की खिलखिलाहट स्पष्ट सुनाई पड़ती है।..

 

“कांता मेरे पैरों से लिपट जाती है। मुझे अपनी गलती का एहसास होता है..मैं उसे आलिंगनबद्ध कर लेता हूँ।”..

 

और नायक अपने आँसू छिपाने का प्रयास करता है।

 

“सब मिलाकर मुझे 7300 रुपये मिलते हैं। जिनको इतना नहीं मिलता वे भी तो गुज़र करते हैं।

 

‘मैं आपके साथ हूँ’, कांता ने मेरे कान में कहा…”

**

अगले दिन प्रातः नायक घर से तैयार होकर रिज़र्वेशन करवाने के लिए निकलता है।

 

“उसके व्यवहार में अनापेक्षित तल्खी और दृढ़ता देख चबूतरा और पिलखन का पेड़

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *