हिन्दी क्षेत्र की चिंता और चिंतन!
इन्तज़ार की यातना से घिरा समय!
बोधिसत्व
आप पिछले एक दो सप्ताह की हिन्दी इलाके की चर्चा पर ध्यान दें और इसी समय विश्व की राजनीति पर निगाह डालें! और साथ ही भारत के पाँच राज्यों के चुनावी संघर्ष पर ध्यान दें तो पायेंगे कि हिन्दी क्षेत्र पर किसी का कोई प्रभाव नहीं है! और गहराई में जाएँगे तो एक फूहड़पन चमकता हुआ दिखेगा! आज फूहड़ होने में सफलता के संजीवन सूत्र सहज ही पाये जा सकते हैं! देखने पर अवश्य दिखेगा! उपेक्षा पूर्ण दृष्टि कुछ भी तो नहीं देखने समझने देती!
किसी कवि से अंतरराष्ट्रीय चिंता पर एक वार्ता एक पंक्ति मिले तो बतायें! किसी संपादक की कलम से सांप्रदायिक संघर्ष में लाचार हो रही जनता कि असहायता पर कोई विमर्श की पंक्ति दिखे तो बतायें! हर समय छीछालेदर, हुड़दंग, लिहाड़ी, प्रतिशोध, अनावश्यक गुटीय पक्षधरता और इसी के आस पास का वातावरण बनाया जा रहा है! ऐसे जैसे यही चिंता उचित और जायज है! संकट का पुष्प खिल गया है और हम उसे देख कर भी किसी और चिंता में लिप्त हैं! हमें हिसाब बराबर करना है! किसी को ईरान बना कर कुचल देना है!
मणिपुर जैसी घृणित घटना बिहार में घटी है हम निर्लिप्त हैं! भारत में अपनी देसी एप्स्टीन फाइलें परत दर परत खुल रही हैं लेकिन हम हिन्दी वाले लिहाड़ी या थुक्का फजीहत से आगे जा ही नहीं रहे हैं। कविता असमर्थ हो गई है अपनी निर्मिति में उसने अपनी प्रहार शक्ति खो दी है। इस पर ध्यान रहे कि कविता को इरादतन पहले फूहड़ और वल्गर बनाया गया ताकि आप उसे गंभीरता से न लें! अब पूरे विमर्श को कौतुक में बदला जायेगा ताकि आप हर विमर्श में एक मजाक का तत्त्व खोजते रहें!
संकट इतना गहरा है कि किसी को नंगा किया जा रहा होगा और एक भाषा के लोग उसे जाती गोत्र सवर्ण अवर्ण के खाँचे में डाल कर रील की तरह देखने में रात दिन लगे रहेंगे! किसी मान्य कवि का अपमान किया जाएगा और बड़ा वर्ग उसकी अवमानना पर वैसे ही चुप रहेगा जिस तरह लोग लिंचिंग पर चुप रहते हैं! हम टार्चर कैंप में आनंद खोजने की सीमा पर खड़े हैं! अब डिटेंशन कैंप अलग से बनाने की आवश्यकता नहीं रही इसलिए उसकी क्रूरता का भय नहीं देख पा रहे हम!
हम उस बंधक की तरह हो गये हैं जो जेल की दीवार पर किसी प्राचीन पोथी की सदुक्ति पर निहाल होकर अपनी अकारण गुलामी में गौरव प्राप्त कर ले रहा है! जितने सांप्रदायिक तुलसी जितने सांप्रदायिक हैं उतने ही सूर कबीर मीरा रहीम रसखान जायसी केशव भी हैं! जितने साम्प्रदायिक मैथिलीशरण गुप्त हैं उतने ही निराला, पंत, महादेवी, दिनकर और नरेश मेहता भी हैं! दिनकर की पंक्तियाँ ‘याचना नहीं अब रण होगा। संग्राम महा भीषण होगा’ का उपयोग वर्ग संघर्ष में हुआ या नहीं लेकिन वास्तविक सांप्रदायिक शक्तियों ने उसी पंक्ति को अपने पक्ष में प्रयोग कर लिया! क्या इस पंक्ति को दिनकर ने सांप्रदायिक दृष्टि से लिखा था? क्या उनके उपयोग के कारण हम दिनकर को सांप्रदायिक मान लें?
जो वास्तविक सांप्रदायिक कवि लेखक हैं आज उनको सरकार ने चुन लिया है या उन्होंने सरकार को चुन लिया है। अपने इर्द गिर्द सांप्रदायिक कवि खोजने हों तो इस तरह खोजने का यत्न करें। सांप्रदायिकता कम्यूनलिज्म के संदर्भ में और सांप्रदायिकता अध्यात्म और संस्कृति सभ्यता के संदर्भ में एक ही नहीं हो सकती। रहीम पुष्ठिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित भक्त थे लेकिन उनकी मंजिल मोक्ष थी वही लक्ष्य तुलसीदास का भी था और वैसा ही मंतव्य सभी सगुण निर्गुण सूफी और नानक आदि का भी था। असद जैदी हों या अरुण कमल राजेश जोशी, ज्ञानेंद्रपति हों या मंगलेश डबराल सब के काव्य लक्ष्य एक है जन साधारण की विपदा और उस विपदा में उसकी मनुष्यत्ता की जय!
हिन्दी कविता में केदार नाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, चंद्रकांत देवताले, अशोक वाजपेयी, लीलाधार जगूड़ी, सोमदत्त, वीरेन डंगवाल या कुमार विकल, सुदीप बनर्जी, धूमिल, प्रयाग शुक्ल, वेणु गोपाल, ऋतुराज नवीन सागर और नरेश सक्सेना सब ने अपनी कविता में मनुष्य को श्रेष्ठ माना है उसके धर्म पंथ या मजहब को नहीं। नाम अनेक गिनाए जा सकते हैं। ध्यान में यह बात रहे की हिन्दी की मूल काव्य धारा कभी भी क्रूरता के पक्ष में सांप्रदायिक नहीं रही! वह सदैव उदार और जीवन में संजीवन की खोज करती रही है! वह तमाम यत्नों उपायों के बाद भी विफल नहीं हुई है! वह विफल न हो यह हमें भी ध्यान में रखना होगा!
सांप्रदायिक शक्तियों के लिए अयोध्या के औजार है तो उससे मुकाबला कर रहे लोगों के लिए एक घाव! इस घाव का दुःख अनेक ढंग से अनेक कवियों ने कहा है! इसी व्यथा को हिन्दी महत्वपूर्ण कवि असद जैदी ने इस प्रकार दर्ज किया है। यह कविता क़ब्रों-मक़बरों को उनके नक़्क़ाशी-क्षेत्रफल आदि के अनुसार देखने का विरोध नहीं करती बल्कि विनम्रता से यह कहती है कि ये क़ब्रें पीढ़ियों के दुखों का संचित धरोहर हैं! हमें यह भी विचार करना है कि इस कविता या ऐसी कविताओं की चर्चा कितनी और कैसी हुई है! विचार करेंगे तो कुछ परिणाम अवश्य मिलेगा!
अयोध्या में कुछ क़ब्रें
इस मलबे के पीछे कुछ दूर जाकर
नदी के उस तरफ़ कई कब्रें हैं
जिनमें दबी हैं कुछ कहानियाँ
जंग लगा एक चिमटा
ताँबे का प्याला
एक तहमद एक लाठी एक दरी
मेंहदी से रंगे बाल
2×3 इंच का नीले शीशे का
चमकदार टुकड़ा
और इसी तरह कुछ अटरम-सटरम
हर शै ख़ामोश
लेकिन अपनी जगह से कुछ सरकी हुई
हर शै, दम साधे,
हमारी तरह,
किसी इन्तज़ार में। (असद जैदी, सामान की तलाश)
हिन्दी की पीड़ा अब उदासी और इन्तज़ार की यातना में बदल गई है! किसी को अच्छे दिनों का इन्तज़ार है भले वो भरम हो तो किसी को अंधेरे के मिटने का इन्तज़ार है! यह एक लंबी लड़ाई है इसे आपसी कलह और अहंकार की अकड़ मुद्रा से नहीं जीता जा सकता!
यह लेखक के अपने निजी विचार हैं, इससे सहमति जरूरी नहीं है।
