कलयुग से कठिन है यह छालयुग
शंभुनाथ
इन दिनों लोग तेजी से सत्यान्वेषी से झूठ के प्रचारक बनते जा रहे हैं। लोगों का बिना जांचे–समझे खुद महज प्रचारक बनकर रह जाना कैसा क्षय है और इससे सावधान होना क्यों जरूरी है?
पहली बात, मनुष्य का सत्यान्वेषी की जगह महज प्रचारक बन जाना उसकी आत्मगरिमा का ध्वंस है, यह मनुष्य की महत्ता का अंत है।
दूसरी बात , इससे व्यक्ति की ’क्रिटिकल थिंकिंग’ की क्षमता घटती है। और अंधविश्वास बढ़ते हैं जिसका अर्थ है आम तौर पर स्त्रियों और वंचित जातियों के अब तक के प्राप्त अधिकार भी बड़ी सफाई से छिनते जाना!
तीसरी बात, जब समाज में जांच–पड़ताल और सहृदयतापूर्ण बहस की जगह ’घोषणाएं’ ले लेती हैं, तो यह वस्तुतः यह भी एक बड़ा क्षय है। आज जिसे देखो वह कुछ न कुछ अंतिम सत्य की तरह घोषित कर रहा है। वह जटिल समस्याओं का सरल और गलत निदान बता रहा है। वह संवाद नहीं कर रहा है।
क्या वह देश बच सकता है जहां संवादहीनता हो? संचार क्रांतियां लगातार हो रही हैं पर संवादहीनता बढ़ रही है!
नतीजा यह निकलता है कि कई स्तरों पर क्रूर ध्रुवीकरण देश को अंततः गृहयुद्ध की दिशा में ले जाता है! विरोधी के मत को शत्रु का मत मान लेना अंततः इससे भिन्न नतीजा नहीं देगा।
राजनीति या साहित्य के लोग बहस में इधर वास्तविक मुद्दों पर नहीं केवल धर्म– जाति आधारित पहचान पर युद्ध कर रहे हैं। यह हिंदी क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है। उदाहरणस्वरूप इधर यूजीसी बिल एक प्रायोजित परियोजना की तरह आया है, चित भी मेरा और पट भी मेरा!
समझने की जरूरत है कि सत्ता ही समाज में ’भिन्नता’ का स्क्रिप्ट तैयार करती है। यह भले तात्कालिक फायदा दे, पर इससे दीर्घकालिक नुकसान है जो दिखाई नहीं देता। ऐसे में नए सिरे से सोचना और इस छलयुग से बाहर निकलना जरूरी है।
