दलित/पिछड़ा आंदोलन पर हिंदुत्ववाद का प्रभाव: कुछ सवाल

दलित/पिछड़ा आंदोलन पर हिंदुत्ववाद का प्रभाव: कुछ सवाल

 

शंभुनाथ

 

भारत में वर्तमान दौर के दलित/पिछड़ा आंदोलन पर हिंदुत्ववाद का क्या प्रभाव पड़ा है, इसका अध्ययन नहीं हो रहा है। मुझे लगता है कि कुछ ये  प्रश्न असंबोधित हैं :

1)कांग्रेस के शासन में दलित आंदोलन प्रखरता से उभर रहा था, कांग्रेस का जनाधार खिसक रहा था और ’जात पर न पात पर…मुहर लगाओ हाथ पर’ का आवेग एक अति संक्षिप्त काल तक बने रहने के बाद हिन्दी क्षेत्र में वस्तुतः दलित आंदोलन 1985 के बाद  तेजी से बढ़ा था। आज के शासन में वह आंदोलन किस दशा में है?

क्या हमारे देश में फिलहाल एक ही आंदोलन है, एक ही विमर्श  है– हिंदुत्ववादी विमर्श और यह बाकी को प्रायः निगल या दबा चुका है?

2) क्या पहचान की राजनीति सीमित होकर अंततः प्रतिनिधित्व की महत्वाकांक्षा में सीमित हो गई? राजनीति और बौद्धिक क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व प्राप्त करके अपनी अच्छी पोजीशन बना लेने वाले क्षमतावान दलितों/पिछड़ों ने अपने समुदाय के पिछड़ेपन और उत्पीड़न को मिटाने के लिए सच्चा प्रयास कितना जारी रखा है और वे क्या रचनात्मक कार्य कर रहे हैं?

3) हिंदुत्ववादी आंदोलन ने दलितों के प्रति समावेशन  की भाषा अपनाई— ’सब हिंदू हैं, जाति अंग्रेजों की साज़िश है, दलित–वंचित भी राष्ट्र निर्माता हैं… ।’ यह समावेशन समानता पर नहीं, अधीन करने वाली एकरूपता पर आधारित रहा है। फिर भी दलित/पिछड़ा पहचान को हिंदू राष्ट्र की सहायक पहचान की तरह देखने की प्रवृत्ति को कितनी सफलता मिल रही है और परिणाम स्वरूप दलित आंदोलन का मूल प्रश्न—जाति उन्मूलन, भेदभाव तथा उत्पीड़न की समाप्ति का भाव धीरे-धीरे धार्मिक एकता की भाषा में अब कितना दबता जा रहा है?

4) दलित आंदोलन बौद्धिक स्तर पर ब्राह्मणवाद का विरोध करता है, पर उसका राजनीतिक संघर्ष मुख्यतः पिछड़े समुदायों से दिखता रहा है। क्या दलितों का बिखराव इस समय चरम पर नहीं है? क्या दलित आवाज में आत्मनिरीक्षण का कोई तत्व पैदा हो रहा है या यह आंदोलन वस्तुतः सत्ताभोग  या प्रतिनिधित्व के उत्सव में बदल चुका है?

5) ’स्वानुभव’ से थोड़ा बाहर निकलकर अपनी चेतना में ’संवेदना’ को भी जोड़े बिना, ‘अन्य’ उत्पीड़नों के अनुभव में भी हिस्सेदारी के बिना, एकतरफा बोलने की जगह व्यापक संवाद के बिना क्या दलित लेखक का  कुछ नया दे पाना संभव है?

6) दलितों की आवाज के लिए अभी भी बाजार जरूर सजा हुआ है, यह संस्कृति उद्योग का भी एक महत्वपूर्ण विषय है। पर क्या राजनीति में दलित की आवाज बर्गेनिंग के कौशल तक सीमित नहीं होती जा रही  है ? क्या दलित/पिछड़े लोग राजनीति और बाजार दोनों के द्वारा ’हजम कर लेने की साजिश’ के शिकार नहीं होते जा रहे हैं?  क्या अपने प्रश्नों में विस्तार लाने की जगह ’प्रतिनिधित्व की तृप्ति’ ही अंतिम नियति है?

7) सनसनीपूर्ण और एकतरफा उत्तेजक बातों का जो सिलसिला दलित और थोड़ा बहुत स्त्री विमर्श ने शुरू किया था, हिंदुत्ववादी इनसे भी ऊंचे स्वर में उत्तेजक बातें करने लगे और बाकी पर छा गए! क्या सनसनी/उत्तेजना  और सामाजिक विभाजन की जगह जीवन में तर्क और मानवीय संबंधों का बुद्धिपरक पुनर्वास, प्रेम की गरिमा की फिर से स्थापना संभव है?

ये कुछ प्रश्न मन में जन्मे हैं। वंचितों की विभिन्न आवाजों में ऐसे नहीं तो कुछ अन्य किस्म के ही सही नए प्रश्न जन्मने चाहिए, संवाद होना चाहिए। अन्यथा वंचितों की अलग–अलग हर आवाज प्रवाहशील नदी बनने की जगह अंततः कुएं की नियति प्राप्त कर सकती है!

शंभुनाथ के फेसबुक वॉल से साभार

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