सुरेन्द्र राणा : रोडवेज यूनियन व सर्वकर्मचारी संघ के हर संघर्ष में भागीदार

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-102

सुरेन्द्र राणा : रोडवेज यूनियन व सर्वकर्मचारी संघ के हर संघर्ष में भागीदार

सत्यपाल सिवाच

अम्बाला जिले के नारायणगढ़ क्षेत्र के गांव समानवा में एक साधारण किसान परिवार में सुरेन्द्र राणा का जन्म 5 मार्च 1957 को हुआ। उनकी माँ का नाम श्रीमती केलादेवी और पिता का नाम श्री गुलाब सिंह है। फिलहाल उनका परिवार नारायणगढ़ के वार्ड नंबर 1 में रहता है। वे सात बहन-भाई हैं। उन्होंने दसवीं तक शिक्षा प्राप्त की और हरियाणा रोडवेज में इलेक्ट्रीशियन पद पर नियुक्त हो गए। वे दिनांक 01 मार्च 1980 को सेवा में आए और 31 मार्च 2015 को सेवानिवृत्त हो गए। उनका और शिमला रानी का विवाह 1मई 1978 को हुआ था। इनके दो बच्चे हैं। एक बिजनेस करता है और एक दूसरे देश में है। वे महसूस करते हैं कि अब तो बूढ़े हो गए हैं। अब बहुत सलाह देने या कुछ करने लायक नहीं रहे हैं।

वे हरियाणा। रोडवेज वर्कर्स यूनियन (सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा) में सक्रिय रहे। संघ के गठन के बाद जो कार्यकर्ता नारायणगढ़ में जुड़े उनमें सुरेन्द्र राणा भी शामिल थे। हरियाणा रोडवेज सब-डिपो नारायणगढ़ प्रधान पद रहे और दो वर्ष राज्य में भी पदाधिकारी रहे। एक बार जिला अम्बाला के सर्व कर्मचारी संघ के प्रधान रहे हैं। अधिकारी द्वारा दुर्व्यवहार करने पर डटकर मुकाबला किया। उस लड़ाई में कर्मचारियों ने भी खूब साथ दिया। उसके बाद से ये लगातार सक्रिय होकर हरियाणा रोडवेज कर्मचारियों नेतृत्व करते हुए संघर्ष में रहे और लगातार 22 साल तक सब-डिपो में प्रधान रहे।

सन् 1986 से लेकर 2015 तक हरियाणा रोडवेज अथवा सर्वकर्मचारी संघ के जितने भी संघर्ष हुए सब में भाग लिया। चाहे जेल जाना हो, चाहे टर्मिनेट किया गया, उनमें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। चाहे ट्रांसफर हुई हो वे निर्भय होकर संगठन और संघर्ष में रहे। इसे कर्मचारी आन्दोलन के अनुभव से निकले कुर्बानी के जज्बे के रूप में देख सकते हैं। वे तीन बार जेल गये।

उन्हें लगता है कि सर्वकर्मचारी संघ के कर्मचारियों के साथ रहने का बहुत ही बढ़िया अनुभव रहा और आनंद आया। यद्यपि वे अंतिम दौर में कुछ समय रोडवेज यूनियन के पूर्व अध्यक्ष हरिनारायण शर्मा के साथ अलग संगठन में चले गए थे लेकिन स्थानीय स्तर पर अपने पुराने साथियों से जुड़े रहे।

सुरेन्द्र राणा ने महसूस किया कि आन्दोलनों में रहने की वजह से परिवार पीछे से परेशान रहता था, परन्तु परिवार नहीं मानी। उन्हें सन्तुष्ट करने और समझाने की कोशिश करते रहे। सब बाधाओं के बावजूद यूनियन के कार्यों में रुचि रखी। वे कहते हैं – मेरा किसी भी राजनेता से कोई संबंध नहीं था। अधिकारियों से यूनियन नेता के रूप में जान-पहचान रहती है, लेकिन कभी निजी लाभ नहीं उठाया। हाँ, संगठन के प्रभाव में कर्मचारियों की जायज समस्याओं का निपटारा करवाया। उनका कहना है कि वे साधारण व्यक्ति हैं, इसलिए कोई असामान्य बहादुरी का काम करने का दावा नहीं करते।

उनकी यह राय बहुत अहम है – आज के दौर के नेताओं में दम नजर नहीं आता। उन्हें लगता है अधिकतर बिकाऊ हैं और कर्मचारियों का कोई काम नहीं हो पाता। अधिकारी से मिलकर उनके कहने पर हड़ताल करते हैं और उनके आदेश पर खोल देते हैं।  यह आज के नेताओं का कल्चर है। इस पर मंथन किए जाने की जरूरत है।

 (साभार – सतीश सेठी, पूर्व महासचिव)

लेखक : सत्यपाल सिवाच

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