मास्टर धर्मचंदः हर भूमिका में अव्वल, सबका ख्याल रखने वाले उम्दा इन्सान

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-92

 

मास्टर धर्मचंदः हर भूमिका में अव्वल, सबका ख्याल रखने वाले उम्दा इन्सान

 

सत्यपाल सिवाच

 

कुरुक्षेत्र जिले के गांव गढ़ी रोड़ान निवासी मास्टर धर्मचंद ऐसे शख्स हैं जिन्हें अपने परिचय के तीन दशकों में उत्तरोत्तर अधिक पसंद करने लगा हूँ। सहज ही विश्वास नहीं होता कि एक आदमी में इतनी तरह का हुनर होता है। वे संवेदनशील इंसान हैं; समर्पित शिक्षक हैं ; संगठन के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं; जिम्मेदार नागरिक हैं; जागरूक किसान हैं और घर-परिवार में अनेक प्रकार भूमिका निभाते हुए सबका ख्याल रखने वाले हैं। ऐसा मानने वाला मैं ही अकेला नहीं हूँ, बल्कि जो भी उन्हें जानता है कुछ ऐसे ही जानता है।

उनका जन्म 10 नवम्बर 1952 को गांव मिर्जापुर जिला कुरुक्षेत्र में श्रीमती पानोदेवी और श्री गोपालाराम के घर हुआ। वहाँ केवल एक एकड़ जमीन थी जिससे निर्वाह मुश्किल था तो इनके पिता जी 1968 में गढ़ी रोड़ान आकर बस गए। धीरे-धीरे परिवार ने मेहनत करके 51 एकड़ जमीन बना ली। पिता का पुश्तैनी काम खेती व पशुपालन रहा जिसे आगे बढ़ाते हुए माँ साथ में घर का काम संभालतीं। धर्मचन्द सहित परिवार में तीन भाई और एक बहन हैं। तीनों भाइयों का संयुक्त परिवार है।

धर्मचंद ने इतिहास और हिन्दी विषयों में एम. ए. डिग्री हासिल की और बी.एड. करके 01 अगस्त 1981 को एस.एस. मास्टर बन गए। उससे पहले वे सन् 01 सितंबर 1979 को राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सीवन में लिपिक नियुक्त हुए थे। अध्यापक के रूप में उनकी पहली नियुक्ति छह माह आधार पर राजकीय उच्च विद्यालय बाखली में हुई । सर्वकर्मचारी संघ के संघर्ष के समझौते के आधार पर इनकी सेवाएं 1987 में 1 नवंबर 1986 से नियमित हो गई। इन्हें 28 फरवरी 2004 को प्रवक्ता इतिहास के रूप में पदोन्नत करके राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय भागल भेजा गया। यहीं से वे 30 नवंबर 2010 को सेवानिवृत्त हुए।

वैसे तो धर्मचंद नौकरी में आने के कुछ समय बाद ही रेग्युलराइजेशन से सम्बन्धित संघर्षों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। सन् 1986 से वे हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के साथ जुड़ गए और अपनी सेवानिवृत्ति तक लगातार सक्रिय रहे। उन्होंने सर्वकर्मचारी संघ के संघर्षों व संगठन में महती भूमिका निभाई।

सन् 1986-87 का कर्मचारी आन्दोलन हजारों कार्यकर्ताओं के लिए न केवल प्रेरणास्रोत रहा, बल्कि संघर्ष की पाठशाला भी बना। धर्मचंद अपने क्षेत्र में कर्मचारी आंदोलन के भरोसेमंद और समझदार नेता की तरह विकसित हुए। वे 1992 से 1998 तक यूनियन के पिहोवा खंड के प्रधान रहे। 1998 से 2004 तक जिला कुरुक्षेत्र के अध्यापक संघ के जिला सचिव रहे और 2003 से 2005 तक कुरुक्षेत्र जिला में सर्व कर्मचारी संघ के जिला सचिव के पद पर भी काम किया।

बहुत आग्रह कर उन्हें 2004 से 2008 तक राज्य सचिव और 2008 से 2011 तक राज्य उप प्रधान की जिम्मेदारी दी गई। घरेलू जिम्मेदारियों व यूनियन के काम में तालमेल के लिए वे जिला स्तर पर ही काम करना चाहते रहे हैं। उनका मिजाज़ ऐसा है कि कोई काम स्वीकार कर लिया तो उसे दिल से भरपूर ऊर्जा के साथ पूरा करते हैं। संघर्षों के दौरान वे मजबूती के साथ मोर्चे पर रहते। इसके चलते अनेक बार पुलिस से झड़प हुई अथवा हिरासत में भेजा गया। सन् 1993 की हड़ताल में मुकदमे दर्ज हुए जो आन्दोलन का समझौता होने पर ही वापस हुए।

धर्मचंद का मानना है कि सर्वकर्मचारी संघ व साझा संघर्षों का होना बहुत लाभदायक रहा है। इसके चलते अनेक उपलब्धियों के साथ आत्मविश्वास भी बना है। पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए इनका बड़ा बेटा वीरेन्द्र सिंह भी हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के जिलाध्यक्ष के रूप में विरासत को आगे बढ़ा रहा है।

धर्मचंद ने अपने सेवाकाल में सभी संघर्षों में अगली कतारों में रहकर भाग लिया। इस दौर में उन्हें अपने परिवार की ओर से भी पर्याप्त सहयोग मिलता रहा है। यद्यपि वे घरेलू जिम्मेदारी के प्रति भी गंभीर रहे हैं लेकिन भाइयों व स्वजनों के सहयोग से आपस बातचीत करते हुए घर व समाज दोनों काम कर पाए। इनके किसी राजनेता से कोई निजी संपर्क नहीं रहे। इसी तरह अधिकारियों से भी कोई ऐसी नजदीकी नहीं रही। तब निजी काम करवाने की निर्भरता तो योग्यता व मेरिट पर ही रही। जिस पर इन्हें फख्र है। इन्हें अपने किए कार्यों पर इसलिए भी गर्व रहा है कि कभी ऐसी गलती नहीं की जिसके लिए पछताना पड़े।

मास्टर धर्मचंद चाहते हैं कि भावी पीढ़ी के शिक्षक कक्षा में बच्चों के प्रति समर्पित रहें। शतप्रतिशत परिणाम लाने के लिए काम करें। अध्यापन करते हुए सरकार के निजीकरण की नीतियों के खिलाफ संघर्ष करते रहें। वे हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के नारे “अध्ययन, अध्यापन व संघर्ष” को जीवन दर्शन मानते हैं। इन्हें लगता है कि ज्यादा सुविधाओं की वजह से आज कर्मचारी आंदोलन से  विमुख हो रहे हैं। उन्हें अतीत के गौरवपूर्ण संघर्षों से जुड़ना चाहिए।

धर्मचंद का विवाह श्रीमती संतरा देवी के साथ 11 मार्च 1974 को हुआ। इनके दो लड़के  और एक लड़की है। बड़ा लड़का वीरेंद्र सिंह राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय बाखली में इंग्लिश प्रवक्ता के पद पर कार्यरत है व हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ कुरुक्षेत्र  जिले का प्रधान भी है।  पुत्रवधू बबीता देवी पीटीआई के पद पर राजकीय उच्च विद्यालय पिण्डारसी जिला कुरुक्षेत्र में कार्यरत हैं। छोटा बेटा डॉक्टर जसबीर जागलान गवर्नमेंट कॉलेज पिहोवा में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत है। बेटी सुदेश बाला एम. ए. अंग्रेजी, बी.एड. और डी.एड. हैं और दामाद डॉक्टर नरेश सगवाल जूलॉजी डिपार्मेंट कुरूक्षेत्र यूनिवर्सिटी कुरुक्षेत्र में प्रोफेसर हैं। पोती प्रयुक्ति दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट है और वर्तमान में yeshiva यूनिवर्सिटी न्यूयॉर्क से MS  मैथमेटिक्स  की है व USA में ही PH.D. में दाखिले के लिए अप्लाई किया हुआ है।

आज तक तीनों भाइयों का  परिवार एकसाथ है। धर्मचंद खुद तीनों परिवारों की जिम्मेवारी उठा रहे हैं। भाइयों के बच्चे भी सरकारी कर्मचारी हैं स्कूल में और घर में भी शिक्षा की ओर ज्यादा ध्यान दिया है रिटायरमेंट के बाद कृषि की ओर पूरा ध्यान है पूरे मन के साथ खेती कर रहे हैं। खुद प्रोस्टेट कैंसर के मरीज होते हुए कैंसर जैसी बीमारी को पीछे कर दिया है। चंडीगढ़ पीजीआई से ईलाज चला हुआ है। अब घर पर स्वस्थ हैं। अच्छे विचार, सादगी और कृषक जीवन ही उनकी ताकत का स्रोत है। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच

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