लेखक वह है जो लिखता रहे

लेखक वह है जो लिखता रहे

जनवादी लेखक संघ, दिल्ली का 10 वाँ राज्य सम्मेलन संपन्न

4 अप्रैल, 2026 को दिल्ली के सुरजीत भवन में जनवादी लेखक संघ, दिल्ली का 10 वाँ राज्य सम्मेलन संपन्न हुआ। इस एकदिवसीय सम्मेलन में चार सत्र आयोजित हुए।यह सम्मेलन *”हमारा समय और लेखक की भूमिका”* विषय पर केंद्रित था।

कार्यक्रम का आरंभ करते हुए दिल्ली जलेस के सचिव ने अतिथि और श्रोताओं का स्वागत करते हुए कहा कि हमारा समय खतरनाक है और इसमें लेखक की भूमिका राजनीतिक है। कार्यक्रम की शुरुआत जन नाट्य मंच के कलाकार पुरुषोत्तम जी की बुलंद आवाज़ में साहिर लुधियानवी की ग़ज़ल *’ख़ुदा-ए-बर्तर तिरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है’* और नज़ीर अकबराबादी की नज़्म *’दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी’* से हुई जो आज के युद्ध की भयावह स्थिति को बखूबी चित्रित करती हैं। इस क्रम में DUTA के पूर्व अध्यक्ष नंदिता नारायण ने फैज़ के नज़्म ‘हम देखेंगे ‘ का पाठ किया और तत्कालीन वैश्विक परिदृश्य में साम्राज्यवाद विरोधी जंग की बात करते हुए कहा कि “ईरान हमारे लिए लड़ रहा है।”

उद्घाटन सत्र का संचालन करते हुए प्रेम तिवारी ने कहा कि “हम वो दिन लायेंगे जब दुनिया की सरकारें हथियारों के बजट को किताबें खरीदने में इस्तेमाल करेंगी। ”

उद्घाटन भाषण देते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने साम्राज्यवादी ताकतों के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा *”हम छोड़ेंगे नहीं, हम देखेंगे। अपने मुद्दों को ले कर चलेंगे और कभी दबेंगे नहीं।* अपने संघर्षों को याद करते हुए उन्होंने संगठन और संघर्ष से जुड़े कई किस्से सुनाए। उन्होंने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि हम संघर्ष के रचनात्मक तरीकों को भूल रहे हैं – “We have killed Creativity.”

उमा जी ने यह भी कहा कि ” किसी और को उनके देश प्रेम पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।” फैज़ की नज़्म को याद करते हुए कहा कि हम छोड़कर भागेंगे नहीं।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित एन. सुकुमार ने अपने वक्तव्य में डेमोक्रेसी पर गंभीर चर्चा की और जनतांत्रिक संघर्ष में भाग लेने वालों के दायित्व पर विस्तार से बात की।

उन्होंने कहा कि “हम सब राजनीति से किसी न किसी तरह जुड़े हुए हैं, हम अपने आप को इससे अलग नहीं रख सकते।”

*आज की लड़ाई सामूहिक है, हम सब का शत्रु एक है अतः सभी संगठनों को एकजुट होकर संघर्ष करना चाहिए। स्वतंत्र का विचार हम सब के मूल में है।*

उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र तक अपने को विस्तृत करने तथा अनुवाद के माध्यम से ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ाने की बात पर बल दिया।

अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने कहा कि समय कैसा भी हो हमें अपना काम करते रहना है। अपना समय भी आयेगा।

इस उद्घाटन सत्र के बाद दिल्ली जलेस के कार्यकारी अध्यक्ष बली सिंह ने सभी साथियों का औपचारिक स्वागत करते हुए जलेस की स्थापना के महत्त्व को रेखांकित किया। और साथ ही आज के दौर में प्रजातंत्र पर व्यंग्य करते हुए कहा कि “आज डेमोक्रेसी की परिभाषा ” Buy the People, far the people and off the people होकर रह गई है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि आज के समय में सबसे बड़ा खतरा लोकतांत्रिक संगठनों पर ही है। कार्यक्रम के वैचारिक सत्र का संचालन दिल्ली जलेस के उपाध्यक्ष संजीव कौशल ने की।

उन्होंने सभा में उपस्थित रामशरण जोशी CPI(M) के राज्य सचिव अनुराग सक्सेना , राजीव कुंवर ज़वरीमल पारख हरियश राय , देवेंद्र चौबे, सत्यनारायन, विमल कुमार, अवधेश श्रीवास्तव, शशिशेखर सिंह, विजय झा और बलवंत कौर का स्वागत करते हुए दोस्ताना संगठनों के प्रतिनिधियों के रूप में आमंत्रित प्रलेस की अर्जुमंद आरा, जसम की अनुपम सिंह, दलेस के हीरालाल राजस्थानी, जन नाट्य मंच की माला हाशमी , इप्टा के मनीष, अभादलम की हेमलता महिश्वर और NSI के सुभाष गाताडे को अपने वक्तव्यों के लिए मंच पर आमंत्रित किया।

सभी प्रतिनिधियों ने इस बात पर बल दिया कि वर्तमान संकट के दौर में सबसे बड़ा खतरा जनपक्षधर लेखक संगठनों पर है। इस परिस्थिति में सभी संगठनों को एकजुट होकर लड़ने की जरूरत है। तभी इन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों से लड़ सकते हैं। इसके साथ ही वर्तमान समय में लेखकों की सामाजिक – राजनीतिक भूमिका ,युद्ध की विभिषिका , एप्स्टीन फाइल से पूंजीवादी व्यवस्था के संबंध और शोषण के विविध स्वरूपों आदि पर तीखी बात रखी।

कार्यक्रम के इस विचार सत्र की अध्यक्षता चंचल चौहान, इब्बार रब्बी और खालिद अशरफ़ ने की।इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित शाश्वती मजुमदार ने *”हमारा समय और लेखक की भूमिका”* विषय पर बात करते हुए कहा कि लेखक का कार्य लोगों को सच्चाई बताना है। बस इतना बताना आवश्यक नहीं है कि फासीवाद खतरनाक है बल्कि उसके पीछे के कारणों को बताना भी आवश्यक है।

इस सत्र के लिए मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित समयांतर के संपादक पंकज विष्ट ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि “सत्ताएं हमेशा दमनकारी रही हैं, खतरा तब होता है जब हम उनको चुनौती देते हैं। फासीवादी ताकतें आदमी – आदमी के बीच और भारतीय समाज के बीच अंतर पैदा करती हैं ये धर्म के नाम पर आतंक फैलाकर लोगों में भय जगाती हैं।”

इस सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए इब्बार रब्बी ने तीखे व्यंग्य के साथ कहा कि हमारा देश यूरोप से आगे निकल चुका है। हिटलर और मुसोलिनी का स्वदेशी संस्करण यहां उपलब्ध है।इस क्रम में जलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंचल चौहान ने आज के समय और समाज पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “इंसानियत खराब हो चुकी है। आज स्कूल में बच्चों को कट्टरता सिखाई जा रही है।” उन्होंने यह भी कहा कि “इंटरनेशनल फाइनेंस कैपिटल का सबसे घिनौना रूप फासीवाद है। लेखक वह है जो लिखता रहे, जो लिखना बंद कर दे वह लेखक नहीं है।”

जलेस के राष्ट्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह ने प्रेमचंद के वक्तव्य को दुहराते हुए कहा कि साहित्य का उद्देश्य सत्ता का पिछलग्गू बनना नहीं बल्कि राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।उन्होंने यह भी कहा कि “आज के वक्त में यह जरूरी है कि हम अपनी बेचैनी बचा कर रखें। बेचैनी को बचायेंगे तो बदलाव होगा। आगे नलिन रंजन ने युवाओं के योगदान को महत्व देते हुए कहा कि युवा हवा को भांपने की क्षमता रखते हैं, भविष्य को समझने की ताकत रखते हैं। बेचैनी को बचाएंगे तो बदलाव होगा।”

विचार सत्र के अंत में बजरंग बिहारी ने आमंत्रित वक्ताओं, अतिथियों एवं जलेस के रचनाकार साथियों का औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन किया।

दोपहर के भोजन के बाद सांगठनिक सत्र आरम्भ हुआ जिसमें अध्यक्ष मंडल के रूप में जलेस के राष्ट्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह , अध्यक्ष चंचल चौहान के साथ खालिद अशरफ,बली सिंह, हीरालाल नागर, रेणु बाला, संजीव कौशल और टेकचंद मच पर उपस्थित थे। इस सत्र में दिल्ली जलेस के सचिव प्रेम तिवारी ने राष्ट्रीय,अंतर्राष्ट्रीय और दिल्ली राज्य की सामाजिक, सांस्कृतिक , राजनीतिक और साहित्यिक परिस्थितियों पर विस्तृत रिपोर्ट का मसौदा प्रस्तुत किया। जिसे बहस के बाद, कुछ सुधारों के साथ पास कर दिया गया। इसके बाद खालिद अशरफ , गजेंद्र रावत, रेणु बाला, बजरंग बिहारी और संजीव कौशल ने विभिन्न मुद्दों पर प्रस्ताव प्रस्तुत किए जिसे सभा ने ध्वनिमत से पारित कर दिया।

सम्मलेन के समापन सत्र में हिंदी – उर्दू के महत्त्वपूर्ण कवियों ने काव्य-पाठ किया। इनमें इब्बार रब्बी , मदन कश्यप , दुर्गा प्रसाद गुप्त, राधेश्याम तिवारी, द्वारिकाप्रसाद चारुमित्र, जगदीश पंकज, हीरालाल नागर, जगमोहन राय , राकेशरेणु, जसवीर त्यागी , हीरालालराजस्थानी, बलविंद्र सिंह ‘बली’ , सुनील जस्पा, साधना कन्नौजिया, रानी कुमारी ,टेकचंद, श्याम सुशील , आलोक मिश्र, जावेद आलम , अशोक तिवारी, सुधा उपाध्याय , अनुपम सिंह , रत्ना भदौरिया, बजरंग बली कहाँर, कोमल , साहिल सिद्धार्थ, यशवंत, आदि कवियों ने ऐसी कविताएं पढ़ीं, जिसके केंद्र में वर्तमान समय की ज्वलंत समस्याओं – साम्राज्यवाद , युद्ध की विभिषिका , सांप्रदायिकता , अभिव्यक्ति की आज़ादी , बेरोज़गारी, मानवीय संबंध राजनीति आदि पर तीखा प्रहार था।

सम्मलेन में दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया , जेएनयू , अम्बेडकर विश्वविद्यालय के शोधार्थी, विधार्थी – सुदीप , आकाश केवट , निताशा तमसोय, प्रियंका, जसपाल, ओमकुमार, सुभाष, प्रिया, विनीत, राजन, नीता, सलिल, सौरभ, कारण , अंजलि रत्तो, अमन जी, सुनील, सूरज, विद्या भारती , अमित, ईश्वर कुमार, हर्ष वर्मा, योगेंद्र, स्वाति, तन्या, आदित्य, रजिया, साक्षी, सना, संजय यादव, नैन्सी आदि तथा शहर के जाने माने लेखक, रचनाकार , बुद्धिजीवी, पत्रकार , संपादक और शिक्षक भारी संख्या में उपस्थित थे।

इस काव्य गोष्ठी का शानदार संचालन कवि संजीव कौशल ने किया और कवियों – श्रोताओं और आयोजन में सहयोग देने वाले सभी साथियों का धन्यवाद ज्ञापन प्रेम तिवारी ने किया।

रिपोर्ट: रविरंजन कुमार, अंबिकेश द्विवेदी

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