ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – सच्चा-प्यार

कविता

सच्चा-प्यार

ओमसिंह अशफ़ाक

धन-दौलत नहीं पास तुम्हारे !

तो भी क्यों हिम्मत हो हारे !

 

एक हुए कविवर शमशेर !

किया जीवन यादों में ढेर !

ऐसी चढ़ी प्रेम की पींग !

महकी ज्यों काबुल की हींग !

पग यौवन में, विरही-बेला !

जीवनभर वह रहा अकेला !

 

एक हुए सोहनी-महिवाल !

प्रेम का कैसा रूप विशाल !

दरिया अगम, माटी-का-मटका !

तृण आधार जीवन था लटका !

लेशमात्र न किया था शोक !

दरिया में दिया जीवन झोंक !

 

एक हुए हैं, रांझा हीर !

जग ने सुनी प्रेम की पीर !

बदन दो पर रूह थी एक !

जीवन उनका कितना नेक !

अंबर में हैं तारे जितने !

सहे कष्ट जीवन में इतने !

 

एक हुए हैं, यूसुफ-जुलेखा !

सच्चा प्यार सभी ने देखा !

सूफी-संत भी करें बखान !

सारी दुनिया करती मान !

किया है जिसने सच्चा प्यार !

कब मानी है, जग से हार!

(अगस्त ’93)

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