लघु कथा
बस, अब कुछ नहीं कहना…
डॉ रीटा अरोड़ा
“सुनिए, दवा समय पर ले लेना। हम दोनों अब सीनियर सिटिज़न हैं, थोड़ा ध्यान रखना चाहिए।”
“हाँ, सुन लिया!” अख़बार से नज़र उठाए बिना पति ने कहा।
दस मिनट बाद पत्नी ने फिर याद दिलाया, “मैंने दवा की बात कही थी।”
“अरे, एक बार में समझ नहीं आता तुम्हें? सुन तो लिया था!”
पत्नी कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “सुन लेना और बात पर ध्यान देना, दोनों अलग हैं।”
“अब तुम मुझे समझाओगी कि मुझे क्या करना है?” पति झुँझला उठे।
“समझाना नहीं चाहती। बस चाहती हूँ कि एक बार कहूँ तो आप सुन लें।”
“तो मैं क्या बहरा हूँ?”
“मैंने ऐसा कब कहा?”
“तुम्हारे कहने का मतलब ही यही है!”
पत्नी ने गहरी साँस ली। उम्र के इस पड़ाव पर वह बहस नहीं, थोड़ा साथ चाहती थी। लेकिन हर बात दो बार कहने के बाद भी उसे अपनी ही बात का स्पष्टीकरण देना पड़ता था।
“अच्छा, छोड़ो। क्या कह रही थीं?” पति ने चिढ़कर पूछा।
वह कुछ क्षण उन्हें देखती रही।
“कुछ नहीं।”
“अब यह नया नाटक! पहले बोलती हो, फिर चुप हो जाती हो।”
पत्नी ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा-
“बस, अब कुछ नहीं कहना आपको। जो एक बार कहने पर भी समझ न आए, उसे बार-बार समझाने की ताक़त अब मुझमें नहीं है।”
पति ने अख़बार फिर खोल लिया।
पत्नी वहीं बैठी रही। दोनों एक ही कमरे में थे, मगर उनके बीच पसरी ख़ामोशी में अब कौन किसकी बात सुनने को तैयार था-यह कहना मुश्किल था।
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