ज्ञान पर सत्ता

उच्च शिक्षा

ज्ञान पर सत्ता

ओंकार सिंह

भारतीय उच्च शिक्षा एक मौन परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, जिसमें नियुक्तियों के बीच शिक्षण या अनुसंधान में वापस आए बिना एक ही व्यक्ति को विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति के रूप में बने रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। हालाँकि नियम इस प्रथा पर रोक नहीं लगाते हैं, लेकिन कुलपति के रूप में निरंतर कार्यकाल और शिक्षण और अनुसंधान से लंबे समय तक अनुपस्थिति ऐसे शैक्षणिक नेतृत्व की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है, खासकर कक्षा में छात्रों की बदलती आकांक्षाओं के संबंध में।

विवादास्पद मुद्दा विश्वविद्यालय नेतृत्व की प्रभावकारिता से संबंधित है, क्योंकि एक विश्वविद्यालय एक निगम नहीं है और कुलपति इसका सीईओ नहीं है। निःसंदेह, अकादमिक प्राधिकार किसी व्यक्ति के सतत प्रशासन के माध्यम से प्राप्त विशेषज्ञता के बजाय ज्ञान सृजन के साथ जुड़ाव से उत्पन्न होता है। शिक्षण और अनुसंधान से लंबे समय तक अलगाव एक विश्वविद्यालय पर रूढ़िवादी नेतृत्व थोपने और इसकी शैक्षणिक आत्मा को कमजोर करने का जोखिम उठाता है।
शुरुआत में, विश्वविद्यालय के नेतृत्व की परिकल्पना ‘बराबर वालों में सबसे प्रमुख’ (primus inter pares) के रूप में की गई थी। इसमें एक निश्चित कार्यकाल के लिए जिम्मेदारी सौंपी जाती थी, जिसके पूरा होने पर व्यक्ति वापस अपने शिक्षण या शोध कार्य में लौट जाता था। एक निश्चित कार्यकाल के लिए की गई नियुक्ति, कुलपति (वाइस-चांसलर) को राजनीतिक, नौकरशाही और अन्य अनुचित दबावों से बचाती है। इससे उन्हें कठिन शैक्षणिक और प्रशासनिक निर्णय लेने में मदद मिलती है और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता भी सुरक्षित रहती है। हालाँकि, कुलपति के पद पर बने रहने की चाहत अक्सर व्यक्ति को समझौते करने के लिए प्रेरित करती है।

वहीं, सबकी सहमति पाने की कोशिश में, शैक्षणिक और नैतिक मूल्यों के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता कहीं पीछे छूट सकती है। यदि ऐसे लोगों को कुलपति के पद पर लगातार नियुक्त किया जाता है, जिनका शैक्षणिक कार्यों से कोई लेना-देना नहीं है, तो इससे वरिष्ठ प्रोफेसरों की बौद्धिक साख और उनके साथियों के बीच उनके प्रति सम्मान का लाभ उठाने का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है। समय के साथ, इस पद को केवल एक प्रशासनिक भूमिका—ठीक किसी नौकरशाह की तरह—मानने की धारणा गहरी हो जाती है। यह समझ उस भूमिका के लिए बिल्कुल अनुचित है, जिसका मुख्य उद्देश्य एक समृद्ध शैक्षणिक नेतृत्व प्रदान करना है। विश्वविद्यालय के नेतृत्व से यह अपेक्षा की जाती है कि वे शिक्षण और शोध के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए रखें, ताकि वे न केवल संस्थान का प्रशासन संभालें, बल्कि शैक्षणिक समुदाय के बीच सम्मान भी अर्जित करें और उनका सही मार्गदर्शन कर सकें।

पहले के समय के विपरीत, अब देश में कुलपतियों की बार-बार होने वाली नियुक्तियों (यानी एक ही व्यक्ति का बार-बार कुलपति बनना) के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। जो व्यक्ति लगातार कुलपति के रूप में काम करता रहता है, उसका शैक्षणिक कार्यों से जुड़ाव टूट जाता है, जिसके कई परिणाम हो सकते हैं। निस्संदेह, जो व्यक्ति लगातार इस भूमिका में रहता है, वह विश्वविद्यालय का नेतृत्व करने में अधिक आत्मविश्वासी, प्रभावशाली और अनुभवी हो जाता है।
हालाँकि, एक ऐसा शैक्षणिक नेता जो लगातार कई कार्यकालों तक कुलपति बना रहता है और इस बीच कभी भी अध्यापन (पढ़ाने) के काम में नहीं लौटता, उसका मुख्य शैक्षणिक और शोध कार्यों से संपर्क टूट जाना तय है। इसमें कक्षा और प्रयोगशाला से जुड़े आज के मुद्दे, पाठ्यक्रम, छात्रों की बदलती आकांक्षाएं और चुनौतियां, शोध की प्राथमिकताएं, कैंपस जीवन और ज्ञान-विज्ञान में हो रहे नए बदलाव शामिल हैं।

इस तरह के अलगाव से नेतृत्व का ध्यान शैक्षणिक कार्यों के बजाय केवल नियमों के पालन (compliance) पर केंद्रित हो सकता है। शिक्षाविदों को बार-बार कुलपति नियुक्त करना—बिना इसके कि वे बीच में अपने प्रोफेसर के कर्तव्यों पर वापस लौटें—इसे योग्यता के बजाय सत्ता में बैठे लोगों के साथ तालमेल बिठाने के ‘इनाम’ के रूप में भी देखा जा सकता है। इससे उनकी शैक्षणिक साख (legitimacy) पर भी सवाल उठ सकते हैं।

कुछ गिने-चुने लोगों का ही बार-बार अलग-अलग विश्वविद्यालयों में कुलपति (वाइस-चांसलर) के तौर पर नियुक्त होना, संस्थानों के कामकाज और उनमें बदलाव लाने के तरीकों को एक ढर्रे (स्टीरियोटाइप) में बांध देता है। इससे नई सोच पनप नहीं पाती और उन अन्य विद्वानों के लिए मौके कम हो जाते हैं, जो अलग-अलग तरीकों से विश्वविद्यालयों को बेहतर बनाने में योगदान देना चाहते हैं। जिन काबिल शिक्षाविदों की पहुंच प्रभावशाली लोगों तक नहीं होती, उन्हें मौका न देने से उनकी उम्मीदें टूट जाती हैं; जो लोग जोखिम उठाना चाहते हैं, उनका हौसला गिरता है; बहस और असहमति में उनकी भागीदारी कम हो जाती है; और नए दृष्टिकोणों तथा नवाचार (इनोवेशन) के रास्ते बंद हो जाते हैं। लंबे समय में, ऐसे हालात उच्च शिक्षा के लिए नुकसानदेह साबित होते हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘करियर वाइस-चांसलर’ का यह मॉडल उन लोगों के लिए तो उपयुक्त है जो सत्ता और नेटवर्क को संभालने में माहिर हैं, लेकिन उन लोगों के लिए बिल्कुल नहीं जो शैक्षणिक गुणवत्ता, शैक्षणिक ईमानदारी और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को मजबूत करने के प्रति समर्पित हैं। नतीजतन, इससे पूरा विश्वविद्यालय तंत्र सच्चे शैक्षणिक नेतृत्व की एक व्यापक श्रेणी तक पहुँचने से वंचित रह जाता है।

उच्च शिक्षा नियामक, यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने विश्वविद्यालयों के विभिन्न पदों—जिनमें कुलपति (वाइस-चांसलर) का पद भी शामिल है—पर नियुक्तियों के लिए न्यूनतम मानक तय किए हैं। हालाँकि, ऐसा कोई नियम नहीं है जिसके तहत किसी व्यक्ति को वापस शैक्षणिक कार्यों में लौटना पड़े (यानी कोई ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ नहीं है)। साथ ही, अलग-अलग विश्वविद्यालयों में लगातार कुलपति के रूप में काम करने की कोई समय-सीमा भी तय नहीं है। यदि कोई कुलपति लंबे समय तक ज्ञान-सृजन, अध्यापन और शोध से दूर रहता है, तो इससे नेतृत्व का विद्वता और ज्ञान के सृजन व प्रसार से नाता टूट जाता है। यह दूरी धीरे-धीरे विश्वविद्यालय के शैक्षणिक स्वरूप को खोखला कर सकती है।

विश्वविद्यालयों की प्रगति केवल प्रशासनिक दक्षता पर नहीं, बल्कि नई सोच और बौद्धिक रूप से सक्रिय नेतृत्व पर निर्भर करती है। कुछ व्यक्तियों को लगातार कुलपति (वाइस-चांसलर) बनाए रखने की प्रथा—जिसमें वे अपने कार्यकाल के बीच शिक्षण या शोध कार्य में वापस नहीं लौटते—व्यापक बहस का विषय होनी चाहिए। ऐसा लगता है कि इसमें अकादमिक मूल्यों के बजाय प्रशासनिक सुविधा को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। किसी विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में अगला कार्यकाल संभालने से पहले, कम से कम दो सेमेस्टर तक शिक्षण या एक साल तक शोध कार्य करने का एक अनिवार्य अंतराल (कूलिंग-ऑफ पीरियड) क्यों नहीं होना चाहिए?

सरकार, नियामक संस्थाओं और पूरे अकादमिक जगत को इस असंतुलन को सुधारने पर विचार करना चाहिए, ताकि नेतृत्व के पदों पर अन्य योग्य प्रोफेसरों को भी मौका मिल सके। उनकी नई सोच विश्वविद्यालयों को नैतिक और चारित्रिक रूप से समृद्ध कर सकती है। मजबूत अकादमिक पृष्ठभूमि वाले नए कुलपतियों की नियुक्ति से उन्हें एक ठोस आधार मिलता है, और साथ ही संस्थान के नेतृत्व को लेकर उनकी कार्यशैली में एक नयापन और अनिश्चितता (सकारात्मक अर्थ में) बनी रहती है। यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है ताकि विश्वविद्यालय बिना किसी डर के एक ऐसे स्वतंत्र स्थान के रूप में काम कर सकें, जो अकादमिक स्वतंत्रता और बहुलवाद को बढ़ावा दे, और साथ ही अपने निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप अपनी स्वायत्तता और विश्वसनीयता बनाए रखे।

शैक्षणिक गुणवत्ता पर केंद्रित, नैतिक और अडिग संस्थागत नेतृत्व तभी संभव है जब संबंधित व्यक्तियों की भविष्य में इसी तरह के पदों को पाने में कोई दिलचस्पी न हो। विश्वविद्यालयों को ऐसे शैक्षणिक संस्थानों के रूप में देखा जाना चाहिए, जहाँ शिक्षण, सीखने की प्रक्रिया, मूल्यांकन और शोध को मजबूत करने के लिए लगातार नए विचारों और गतिविधियों का प्रवाह बना रहे। लगातार ‘करियर वाइस-चांसलर’ (पेशेवर कुलपति) नियुक्त करने से विश्वविद्यालय का नेतृत्व नौकरशाही का रूप ले सकता है, जो उचित नहीं है। विश्वविद्यालय में शिक्षण और शोध के क्षेत्र में एक बेहतर बौद्धिक भविष्य और नई ऊर्जा लाने के लिए, यह सोचना बहुत जरूरी है कि ऐसे कुलपतियों के लंबे समय तक पद पर बने रहने के क्या परिणाम हो सकते हैं, जिनका शिक्षा से कोई गहरा जुड़ाव नहीं है और जो इसे केवल एक कॉर्पोरेट करियर की तरह देखते हैं।

द टेलीग्राफ से साभार

ओंकार सिंह, वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय, देहरादून के पूर्व कुलपति हैं और मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर के संस्थापक कुलपति भी रह चुके हैं।

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