रावण के पुतले के साथ काकरोच के पुतले का दहन क्यों? यह जेन जी का अपमान

रावण के पुतले के साथ काकरोच के पुतले का दहन क्यों? यह जेन जी का अपमान

  • युवाओं को कॉकरोच कहने वाली मानसिकता को जवाब देना होगा

ओमप्रकाश तिवारी

जिस मानसिकता ने इस देश के युवाओं को “कॉकरोच” कहकर अपमानित किया, उसे यह समझ लेना चाहिए कि युवा अब चुप रहने वाले नहीं हैं।

 

जिस अपमानजनक सोच के विरोध में सोशल मीडिया पर “कॉकरोच पार्टी” जैसे प्रतिरोध के प्रतीक सामने आए और जिसने आगे चलकर Gen Z के व्यापक आक्रोश और आंदोलन का रूप लिया, उसी सोच का यदि अब पुतलों के माध्यम से प्रदर्शन किया जा रहा है, तो यह केवल एक पुतले का मामला नहीं है।

 

यह युवाओं के सम्मान और लोकतांत्रिक असहमति का सवाल है।

 

यदि रावण के पुतले के साथ कॉकरोच का पुतला बनाया गया है और उसे दशहरे पर जलाने की तैयारी है, तो सवाल सीधा है—

 

आखिर कॉकरोच किसका प्रतीक है?

किसे कॉकरोच बताया जा रहा है?

और किसे रावण के साथ जलाने का संदेश दिया जा रहा है?

 

अगर इसका निशाना युवा हैं, Gen Z है या उनका आंदोलन है, तो यह केवल घटिया प्रतीकवाद नहीं है—यह युवा विरोधी मानसिकता का खुला प्रदर्शन है।

 

युवाओं की तुलना रावण से कैसे की जा सकती है?

 

युवा सवाल पूछते हैं तो क्या वे रावण हो जाते हैं?

 

युवा व्यवस्था से जवाब मांगते हैं तो क्या वे रावण हो जाते हैं?

 

युवा भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अवसरों की कमी, अन्याय और सत्ता के अहंकार पर सवाल उठाते हैं तो क्या उन्हें राक्षस बना दिया जाएगा?

 

नहीं!

 

लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला दुश्मन नहीं होता।

 

असहमति रखने वाला देशद्रोही नहीं होता।

 

और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाला रावण नहीं होता।

 

अगर किसी सत्ता, संगठन या व्यक्ति को युवाओं के सवाल पसंद नहीं हैं तो वह उनके सवालों का जवाब दे। तर्क से जवाब दे। तथ्य से जवाब दे। लोकतांत्रिक तरीके से जवाब दे।

 

लेकिन युवाओं को कॉकरोच बताकर या उनके प्रतीक को रावण के साथ जलाकर जवाब देना कायरता है, राजनीति नहीं।

 

दशहरा बुराई के प्रतीक का दहन है, युवाओं के अपमान का लाइसेंस नहीं।

 

रावण का पुतला जलाना एक धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है। लेकिन उसी मंच और उसी प्रतीकात्मकता का इस्तेमाल यदि किसी जीवित सामाजिक वर्ग—विशेषकर युवाओं—को अपमानित करने के लिए किया जा रहा है, तो समाज को सवाल पूछना ही होगा।

 

किसी विचार से लड़ना है तो विचार से लड़िए।

किसी आंदोलन का विरोध करना है तो तर्क से कीजिए।

युवाओं से असहमति है तो बहस कीजिए।

लेकिन युवाओं को अमानवीय प्रतीकों से जोड़कर उनका दहन करने का संदेश मत दीजिए।

 

जो लोग ऐसा कर रहे हैं और जो लोग इसका समर्थन कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि वे केवल एक पुतले का समर्थन नहीं कर रहे—वे एक ऐसी मानसिकता को वैधता दे रहे हैं जिसमें युवाओं की आवाज को घृणा और अपमान के जरिए कुचलने की कोशिश की जाती है।

 

और सरकार कहाँ है?

 

सरकार को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेना चाहिए।

 

प्रशासन को जांच करनी चाहिए कि ऐसे पुतले कहां लगाए गए, किसने लगाए, उनका उद्देश्य क्या था और क्या उनके माध्यम से किसी वर्ग या युवा समुदाय को जानबूझकर अपमानित करने का प्रयास किया गया।

 

यदि कानून का उल्लंघन हुआ है तो FIR होनी चाहिए।

 

यदि किसी के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

 

यदि सार्वजनिक व्यवस्था या सामाजिक सौहार्द प्रभावित होने की आशंका है तो प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।

 

और युवाओं को भी अपना विरोध शांतिपूर्ण, संगठित और कानूनी तरीके से दर्ज कराना चाहिए। शिकायत करें, पुलिस-प्रशासन को ज्ञापन दें, वीडियो और प्रमाण सुरक्षित रखें और जहां आवश्यक हो वहां कानूनी कार्रवाई की मांग करें।

 

कानून हाथ में नहीं लेना है—कानून को अपना हथियार बनाना है।

 

सरकार चुप रही तो सवाल सरकार से भी होगा

 

यदि सरकार ऐसे मामलों पर चुप रहती है, शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं करती और युवाओं के अपमान को नजरअंदाज करती है, तो युवाओं को सरकार से पूछना चाहिए—

 

क्या आप युवाओं के साथ हैं या युवाओं के अपमान के साथ?

 

सरकार को तय करना होगा कि वह युवाओं के सवालों का जवाब देगी या उन्हें अपमानित करने वालों के सामने खड़ी रहेगी।

 

और यदि सरकार लगातार युवाओं के अपमान पर मौन रहती है, तो लोकतांत्रिक तरीके से यह सवाल उठाना बिल्कुल जायज़ है कि—

 

क्या यह सरकार युवा विरोधी हो चुकी है?

 

यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है।

 

यह किसी एक संगठन के खिलाफ नहीं है।

 

यह किसी एक पुतले के खिलाफ भी नहीं है।

 

यह उस मानसिकता के खिलाफ लड़ाई है जो युवाओं को समस्या समझती है।

 

याद रखिए—

 

युवा समस्या नहीं हैं।

युवा सवाल हैं।

युवा शक्ति हैं।

युवा भविष्य हैं।

 

और भविष्य को कॉकरोच कहकर नहीं जलाया जा सकता।

 

युवाओं का अपमान बंद करो।

युवाओं को राक्षस बताना बंद करो।

युवाओं की आवाज दबाना बंद करो।

 

सवाल पूछने वाले युवाओं से डरना बंद करो—उनके सवालों का जवाब दो।

 

**अब युवा चुप नहीं रहेगा।

 

अब युवा सवाल पूछेगा।

अब युवा जवाब मांगेगा।

और लोकतांत्रिक तरीके से अपने सम्मान की लड़ाई लड़ेगा।

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