डॉ रीटा अरोड़ा की लघु कथा – पिंजरा

लघु कथा

पिंजरा

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“तुम हर बार मुझे रोक क्यों लेते हो?” चिड़िया ने पूछा।

“क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ,” पिंजरे में बैठे तोते ने कहा।

“या तुम्हें डर है कि मैं उड़ गई तो लौटूँगी नहीं?”

तोता चुप हो गया।

“तुम्हें पता है,” चिड़िया बोली, “खुला आसमान मुझे जितना प्रिय है, तुम्हारे पास लौटना भी उतना ही।”

“फिर उड़ती क्यों हो?”

“क्योंकि लौटना और लौटने के लिए मजबूर होना, दो अलग बातें हैं।”

तोते ने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया।

“अगर तुम नहीं लौटीं तो?”

चिड़िया मुस्कुराई, “तो समझना, तुम्हारा पिंजरा मेरे लिए घर नहीं था।”

वह उड़ गई।

दिन बीता। शाम हुई। तोता हर आहट पर चौंकता रहा।

तभी खिड़की पर पंखों की फड़फड़ाहट सुनाई दी। चिड़िया लौट आई थी।

“तुम वापस आ गईं!” तोता खुशी से चहका।

“हाँ, लेकिन एक बात याद रखना।”

“क्या?”

“तुम्हारा खुला दरवाज़ा मुझे तुम्हारे करीब लाया है, तुम्हारा डर नहीं।”

तोते ने पहली बार पिंजरे की सलाखों को देखा।

“तो प्यार में किसी को बाँधना नहीं चाहिए?”

चिड़िया ने कहा, “प्यार में इतना भरोसा तो होना ही चाहिए कि कोई अपनी मर्ज़ी से तुम्हारे पास रह सके।”

तोता मुस्कुराया। इस बार उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया।

उसे पहली बार समझ आया- किसी का पास रहना और किसी को रोककर रखना, एक बात नहीं है।

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