मंजुल भारद्वाज की कविता – अमलतास

कविता

अमलतास

मंजुल भारद्वाज

हाथ में आते आते
यूं फिसल जाती है
ज़िंदगी कभी हवा
कभी पानी
कभी मिट्टी
कभी आग़
कभी आकाश हो जाती है!

हर सफ़े पर
फल नहीं होता
यह फ़लसफ़ा
ज़िंदगी हर सफ़े पर
लिख जाती है!

यह कुदरत
कमाल करती है
ज़िंदगी और मौत
एक साथ
लेकर चलती है!

बिखरता है
दरकता है
टूटता है
यकायक
नया अंकुरित होता है !

सृजन
प्रक्रिया ग़ज़ब है
खोने के ग़म को
पाने की खुशी से
भर देती है!

एक चिंगारी
ख़ाक कर देती है
और
एक बूंद ख़ाक को
अंकुरित कर हरा भरा !

विरोधाभास है यह
या समग्रता
धूप और छांव
एक साथ रहती हैं !

क़तरा क़तरा रिश्ता रहा
जश्न का चराग़
जलकर राख हो गया
अपनी राख में उग
वो अमलतास हो गया !

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