ई-20 पेट्रोल: सरकार ने माना माइलेज घटेगा, लेकिन क्या पूरी सच्चाई अभी सामने आनी बाकी है?

बीच बहस में

ई-20 पेट्रोल: सरकार ने माना माइलेज घटेगा, लेकिन क्या पूरी सच्चाई अभी सामने आनी बाकी है?

ओपी तिवारी

केंद्र सरकार, ऑटोमोबाइल कंपनियों और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि ई-20 (20% इथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल के उपयोग से वाहनों का माइलेज 2 से 6 प्रतिशत तक कम हो सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इससे इंजन या फ्यूल सिस्टम को कोई नुकसान नहीं होता।

यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से सरकार का जोर इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा देने पर रहा है और आम लोगों की माइलेज संबंधी शिकायतों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया गया। अब जब स्वयं सरकार और वाहन कंपनियां माइलेज में कमी स्वीकार कर रही हैं, तो कुछ स्वाभाविक सवाल खड़े होते हैं।

क्या वास्तविक परिस्थितियों में माइलेज की कमी केवल 2 से 6 प्रतिशत ही है? करोड़ों पुराने वाहनों पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा? और यदि सब कुछ वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित है तो परीक्षणों का पूरा डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?

विज्ञान क्या कहता है?

इस पूरे विवाद का उत्तर विज्ञान में छिपा है।

पेट्रोल की ऊर्जा क्षमता (Calorific Value) लगभग 43 मेगाजूल प्रति किलोग्राम होती है, जबकि इथेनॉल की केवल 26.8 से 27 मेगाजूल प्रति किलोग्राम। यानी इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में लगभग 35 से 38 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है।

यही कारण है कि कुछ लोग यह दावा करने लगते हैं कि माइलेज भी 30 से 35 प्रतिशत घट जाएगा। लेकिन यह निष्कर्ष वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।

क्योंकि वाहन में 100 प्रतिशत इथेनॉल नहीं, बल्कि केवल 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल मिलाया जाता है।

यदि ऊर्जा का सरल गणित लगाया जाए तो ई-20 पेट्रोल की कुल ऊर्जा सामान्य पेट्रोल से लगभग 6 से 7 प्रतिशत कम बैठती है।

यानी केवल ऊर्जा घनत्व के आधार पर देखा जाए तो 5 से 7 प्रतिशत तक माइलेज कम होना वैज्ञानिक रूप से अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है।

फिर सरकार केवल 2 से 6 प्रतिशत क्यों कह रही है?

यह संभव है कि सरकार द्वारा बताए गए आंकड़े नियंत्रित परिस्थितियों (Controlled Tests) में किए गए परीक्षणों पर आधारित हों।

वास्तविक सड़क पर माइलेज अनेक बातों पर निर्भर करता है—

* ट्रैफिक
* तापमान
* ड्राइविंग शैली
* वाहन की स्थिति
* इंजन की ट्यूनिंग
* टायर प्रेशर
* वाहन की उम्र

इसी कारण एक ही मॉडल की दो गाड़ियों में भी माइलेज अलग-अलग हो सकता है।

इसलिए 2 से 6 प्रतिशत का सरकारी आंकड़ा हर वाहन पर लागू नहीं किया जा सकता।

30 प्रतिशत माइलेज कम होने की बात कहां से आई?

सोशल मीडिया और कुछ विशेषज्ञ 25 से 30 प्रतिशत तक माइलेज कम होने की बात करते हैं।

असल में यह आंकड़ा इथेनॉल की कम ऊर्जा क्षमता से निकाला जाता है।

लेकिन वहां एक महत्वपूर्ण गलती हो जाती है।

इथेनॉल में ऊर्जा 35 प्रतिशत कम है, ई-20 पेट्रोल में नहीं।

ई-20 में तो केवल 20 प्रतिशत इथेनॉल है।

इसलिए वैज्ञानिक गणित 30 प्रतिशत माइलेज घटने का समर्थन नहीं करता।

हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों या विशेष इंजनों में इससे अधिक कमी दिखाई दे सकती है, लेकिन उसे सामान्य नियम नहीं माना जा सकता।

सबसे बड़ा सवाल—पुरानी गाड़ियों का क्या?

यहीं से बहस वास्तव में शुरू होती है।

भारत में ई-20 अनुकूल (E20 Compatible) वाहन पिछले कुछ वर्षों में ही बाजार में आने लगे हैं।

लेकिन देश की सड़कों पर करोड़ों वाहन ऐसे हैं जो 5, 7, 10 या 15 वर्ष पुराने हैं।

इनके इंजन, फ्यूल पाइप, रबर सील, गैस्केट और फ्यूल सिस्टम उस समय डिजाइन किए गए थे जब ई-20 पेट्रोल की कल्पना भी नहीं थी।

सरकार कहती है कि इन वाहनों पर भी कोई नुकसान नहीं होगा।

लेकिन प्रश्न यह है कि इस दावे का स्वतंत्र और दीर्घकालिक वैज्ञानिक प्रमाण कहां है?

क्या किसी विश्वविद्यालय ने 10 वर्ष पुराने वाहनों पर 5 लाख किलोमीटर तक अध्ययन किया है?

क्या अलग-अलग राज्यों की जलवायु में परीक्षण हुए हैं?

क्या उनके परिणाम सार्वजनिक किए गए हैं?

यदि नहीं, तो उपभोक्ताओं के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

इथेनॉल की एक और विशेषता

इथेनॉल केवल ईंधन नहीं है।

यह एक शक्तिशाली विलायक (Solvent) भी है।

साथ ही यह वातावरण से नमी (Moisture) भी आकर्षित करता है।

इसी कारण दुनिया के कई देशों में पुराने वाहनों के लिए विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

यदि किसी वाहन का फ्यूल सिस्टम ई-20 के अनुरूप डिजाइन नहीं है तो लंबे समय में रबर के कुछ हिस्सों, फ्यूल फिल्टर या इंजेक्टर पर प्रभाव पड़ने की आशंका से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि वाहन निर्माता भी केवल उन्हीं मॉडलों को E20 Compatible घोषित करते हैं जिनका परीक्षण किया गया है।

सरकार से पूछे जाने वाले पांच सवाल

यदि सरकार चाहती है कि लोग ई-20 पर पूरा भरोसा करें, तो इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए—

1. ई-20 परीक्षण की पूरी तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
2. कितने वर्ष पुराने वाहनों पर परीक्षण किए गए?
3. परीक्षण कितने किलोमीटर तक चलाए गए?
4. क्या IIT, IISc या किसी स्वतंत्र विश्वविद्यालय ने इन परीक्षणों की पुष्टि की?
5. यदि माइलेज कम होना स्वीकार किया जा रहा है, तो उपभोक्ता को होने वाले अतिरिक्त ईंधन खर्च की भरपाई कैसे होगी?

इथेनॉल के फायदे भी हैं

इस बहस का दूसरा पक्ष भी है।

सरकार इथेनॉल मिश्रण इसलिए बढ़ा रही है क्योंकि—

* कच्चे तेल का आयात कम होगा।
* विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
* गन्ना किसानों को नया बाजार मिलेगा।
* कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलेगी।
* ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।

इन उद्देश्यों से शायद ही किसी को असहमति हो।

लेकिन राष्ट्रीय हित के साथ-साथ उपभोक्ता हित भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

ई-20 पेट्रोल पर बहस केवल माइलेज की नहीं, बल्कि पारदर्शिता की भी है।

अब जबकि सरकार स्वयं माइलेज में कमी स्वीकार कर चुकी है, तो अगला कदम होना चाहिए—सभी परीक्षणों का विस्तृत डेटा सार्वजनिक करना।

यदि ई-20 वास्तव में सुरक्षित है, तो वैज्ञानिक प्रमाण जनता के सामने रखने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।

और यदि कुछ सीमाएँ हैं, तो उन्हें भी स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए।

नीतियाँ जनता के विश्वास से सफल होती हैं, केवल सरकारी घोषणाओं से नहीं।

वैज्ञानिक तथ्यों, स्वतंत्र परीक्षणों और पारदर्शी आंकड़ों के आधार पर ही ई-20 पेट्रोल को लेकर जनता का भरोसा पूरी तरह कायम किया जा सकता है।

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