पुस्तक समीक्षा
पाप और विज्ञान : नैतिकता का सच
नमिता
जब समाज वेश्यावृत्ति, मानव तस्करी, यौन रोग, गर्भपात, व्यभिचार, तलाक और शराबबंदी जैसे मुद्दों पर चर्चा करता है, तो उसकी आवाज़ अक्सर एक जैसी होती है: यह सब ‘पाप’ है। धर्म द्वारा परिभाषित; कानून द्वारा दंडित; और समाज द्वारा शर्म और कलंक में ढका हुआ। फिर एक तरह की स्वीकारोक्ति भी आती है: ये बुराइयाँ हमेशा से मौजूद रही हैं और आगे भी रहेंगी। इन्हें पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
लेकिन क्या यह सचमुच सच है?
अपनी उल्लेखनीय पुस्तक ‘पाप और विज्ञान’ में कनाडाई वैज्ञानिक, लेखक और राजनीतिक चिंतक डायसन कार्टर इस गहरे विश्वास को चुनौती देते हैं। वे सवाल उठाते हैं: अगर विज्ञान ने प्रकृति के इतने रहस्यों को उजागर किया है, तो क्या सामाजिक समस्याएँ सच में हमारी समझ से परे हैं? क्या बुराई की जड़ों की पहचान नहीं की जा सकती? क्या नैतिकता कोई दिव्य आदेश है, या यह भी इतिहास और अर्थव्यवस्था द्वारा निर्मित एक संरचना है?
इन सवालों का उत्तर खोजने के लिए, कार्टर हमें 20वीं सदी के सबसे बड़े सामाजिक प्रयोग की ओर ले जाते हैं: 1917 का रूसी क्रांति। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था; यह व्यक्ति और समाज दोनों को मूल रूप से बदलने का प्रयास था। क्रांति के बाद बने सोवियत संघ ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया कि सामाजिक बुराइयाँ ‘सदैव’ हैं। उसने उन्हें नैतिक पतन के रूप में नहीं, बल्कि विशेष सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की उपज के रूप में देखा।
जहाँ पूंजीवादी समाज इन समस्याओं से निपटने के लिए पुलिस, अदालतों और नैतिक उपदेशों पर निर्भर रहा, वहीं कई बार इन बुराइयों (जैसे वेश्यावृत्ति, तस्करी, शराब) को खत्म करने का दिखावा करते हुए वास्तव में उनसे मुनाफा कमाया गया। इसके विपरीत, सोवियत दृष्टिकोण ने एक सीधा सवाल उठाया: इन तथाकथित ‘पापों’ से लाभ किसे होता है? अगर वेश्यावृत्ति है, तो इससे कौन कमाता है? अगर अवैध शराब का व्यापार है, तो मुनाफा किसकी जेब में जाता है?
जवाब स्पष्ट था: ये समस्याएँ केवल व्यक्तिगत चरित्र की कमजोरी नहीं, बल्कि शोषण और मुनाफे की संरचना से जुड़ी हुई थीं। इसलिए समाधान भी अलग था। वेश्याओं को अपराधी नहीं माना गया; बल्कि दलालों और वेश्यालय संचालकों को सजा दी गई। शराब पीने वालों को नहीं, बल्कि अवैध शराब व्यापारियों को निशाना बनाया गया। पीड़ितों को जेल नहीं भेजा गया, बल्कि उन्हें शिक्षा, रोजगार और पुनर्वास दिया गया। इसने नैतिकता की नई परिभाषा दी—जो दंड की बजाय संरचनात्मक बदलाव पर आधारित थी।
सोवियत प्रयोग की एक महत्वपूर्ण विशेषता महिलाओं की मुक्ति की दिशा में उठाए गए कदम थे। यह समझा गया कि जब तक महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तब तक समाज का नैतिक पुनर्निर्माण संभव नहीं है। इसलिए क्रांति के बाद महिलाओं को वोट का अधिकार, समान वेतन, मातृत्व लाभ और सामाजिक सुरक्षा दी गई। उन्हें घर की चारदीवारी से निकालकर सामाजिक उत्पादन में शामिल किया गया।
वेश्यावृत्ति को “नैतिक विफलता” नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी का परिणाम माना गया। 1923 के एक सर्वेक्षण में अधिकांश महिलाओं ने कहा कि यदि सम्मानजनक काम का अवसर मिले, तो वे इस जीवन को छोड़ देंगी। यह बात अपने आप में प्रचलित नैतिक सोच को उलट देती है।
क्रांति के शुरुआती वर्षों में “मुक्त प्रेम” की अवधारणा भी सामने आई, लेकिन जल्द ही स्पष्ट किया गया कि केवल यौन स्वतंत्रता ही असली मुक्ति नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता शिक्षा, स्वास्थ्य, सांस्कृतिक बदलाव और सामाजिक जिम्मेदारी से आती है। सोवियत समाज का लक्ष्य सिर्फ व्यवहार को नियंत्रित करना नहीं था, बल्कि मनुष्य के समग्र विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाना था।
कार्टर की पुस्तक का केंद्रीय तर्क यह है कि नैतिकता न तो स्थायी है और न ही कोई अलौकिक नियम। यह समाज की आर्थिक संरचना और उत्पादन संबंधों से तय होती है। जैसे-जैसे आर्थिक ढांचा बदलता है, वैसे-वैसे नैतिक मानदंड भी बदलते रहते हैं।
आज—जब सामाजिक समस्याओं पर चर्चा अक्सर भावनात्मक नारों या दमनकारी उपायों तक सीमित रह जाती है—‘पाप और विज्ञान’ हमें याद दिलाती है कि हर सामाजिक समस्या की जड़ में एक भौतिक स्थिति होती है। सही सवाल यह नहीं है कि समाज “क्यों” बिगड़ रहा है, बल्कि यह है कि “कौन-से” आंतरिक कारण इसके लिए जिम्मेदार हैं? और समाज का कौन-सा वर्ग इन विकृतियों से लाभ उठा रहा है और उन्हें बनाए रखना चाहता है?
यह पुस्तक केवल अतीत का दस्तावेज नहीं, बल्कि सोचने का निमंत्रण है—क्या हम अब भी हर चीज़ पर ‘पाप’ का ठप्पा लगाकर आंखें मूंदना चाहते हैं, या उन परिस्थितियों को बदलने की हिम्मत रखते हैं जो इन समस्याओं को जन्म देती हैं?
अंग्रेजी से अनुवाद:गुरमीत अंबाला

अनुवादक – गुरमीत अंबाला
