रिश्ते अब निभाए नहीं जाते… “मैनेज” किए जाते हैं

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रिश्ते अब निभाए नहीं जाते… “मैनेज” किए जाते हैं

  • बढ़ते तलाक: आधुनिकता या रिश्तों का संकट?

 डॉ. रीटा अरोड़ा

 

“हम साथ रहते हैं… लेकिन अब साथ जैसा कुछ बचा नहीं।” काउंसलिंग रूम में बैठी महिला ने धीमे स्वर में कहा।

पति सामने कुर्सी पर चुप बैठा था। दोनों पढ़े-लिखे, सफल और आर्थिक रूप से स्वतंत्र थे। समस्या सिर्फ इतनी थी कि दोनों सही होना चाहते थे। कोई रिश्ता समझना नहीं चाहता था। दोनों बस उसे “मैनेज” कर रहे थे।

हाल ही में महानगरों की फैमिली कोर्ट्स से जुड़ी कई रिपोर्टों ने एक चिंताजनक तस्वीर सामने रखी। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में तलाक के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। कई वैवाहिक परामर्श केंद्रों का कहना है कि अब रिश्ते वर्षों की असहमति से नहीं, बल्कि कुछ महीनों की “इमोशनल डिस्कनेक्शन” से टूट रहे हैं। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, युवा दंपतियों के बीच सबसे सामान्य शिकायत अब “समय की कमी” नहीं, बल्कि “भावनात्मक दूरी” बन चुकी है।

यह केवल कानूनी संकट नहीं है। यह समाज की बदलती मानसिकता का संकेत है।

भारतीय समाज में विवाह केवल दो लोगों का निजी फैसला नहीं माना जाता था। यह एक सामाजिक और भावनात्मक संस्था थी, जिसके केंद्र में केवल प्रेम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, धैर्य और परिवार की निरंतरता होती थी। सात फेरे केवल धार्मिक रस्म नहीं थे; वे जीवन के उतार-चढ़ाव में साथ बने रहने का प्रतीक थे।

लेकिन आज विवाह की परिभाषा तेजी से बदल रही है।

अब रिश्तों में स्थिरता कम और “कमिटमेंट” शब्द भारी लगने लगा है। लोग साथ तो रहना चाहते हैं, लेकिन बिना किसी भावनात्मक जिम्मेदारी के। यही कारण है कि रिश्ते निभाए कम और “मैनेज” ज्यादा किए जा रहे हैं।

वर्तमान समय में आधुनिक जीवनशैली ने व्यक्ति को अधिक स्वतंत्र बनाया है, लेकिन साथ ही अधिक आत्मकेंद्रित भी। कॉर्पोरेट संस्कृति, प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत उपलब्धियों की दौड़ ने युवाओं के भीतर “सेल्फ-प्रायोरिटी” की सोच मजबूत की है। अब करियर, निजी स्पेस और व्यक्तिगत इच्छाएँ रिश्तों से ऊपर रखी जाने लगी हैं।

समस्या महत्वाकांक्षा में नहीं है।

समस्या उस सोच में है, जहाँ विवाह “शेयर्ड जर्नी” के बजाय “पर्सनल कन्वीनियंस” बनता जा रहा है। पहले विवाह का अर्थ था – “हम दोनों मिलकर जीवन चलाएँगे।” अब कई रिश्तों में यह बदलकर हो गया है – “जब तक मुझे खुशी मिल रही है, तब तक रिश्ता ठीक है।” यही सोच रिश्तों को अस्थायी बना रही है।

डिजिटल दुनिया ने इस मानसिकता को और गहरा किया है। अब रिश्ते “फॉलो”, “म्यूट” और “ब्लॉक” की भाषा में जीए जा रहे हैं। छोटी-सी असहमति पर लोग बातचीत करने के बजाय इमोशनल डिस्टेंस बना लेते हैं। धीरे-धीरे संवाद खत्म होने लगता है और अहंकार बातचीत की जगह ले लेता है।

महानगरों में फैमिली कोर्ट्स और वैवाहिक परामर्श केंद्रों के बाहर बढ़ती भीड़ केवल कानूनी विवाद नहीं दिखाती, बल्कि भावनात्मक टूटन का बढ़ता संकट भी दिखाती है। इंस्टेंट दुनिया ने रिश्तों के प्रति धैर्य भी कम कर दिया है। खाना इंस्टेंट, मनोरंजन इंस्टेंट, शॉपिंग इंस्टेंट – और अब समाधान भी इंस्टेंट चाहिए। रिश्तों में कठिनाई आते ही लोग सुधार से ज्यादा “एग्ज़िट” का रास्ता तलाशने लगते हैं।

आर्थिक आत्मनिर्भरता ने महिलाओं और पुरुषों दोनों को निर्णय लेने की शक्ति दी है। यह सकारात्मक बदलाव है। लेकिन जब आत्मनिर्भरता सहयोग के बजाय अहंकार का रूप लेने लगे, तब संघर्ष शुरू होता है। “मुझे किसी की जरूरत नहीं” जैसी सोच सुनने में मजबूत लग सकती है,

लेकिन यही मानसिकता रिश्तों की भावनात्मक जड़ों को कमजोर कर देती है। रिश्ते बराबरी से चलते हैं, लेकिन बराबरी का अर्थ यह नहीं कि कोई झुके ही नहीं। कई बार घर बचाने के लिए बहस जीतना नहीं, अहंकार छोड़ना जरूरी होता है।

संयुक्त परिवारों में बड़े बुजुर्ग एक संतुलनकारी शक्ति होते थे। पति-पत्नी के बीच तनाव बढ़ता तो दादा-दादी, चाचा-चाची या माता-पिता रिश्तों को टूटने से पहले संभाल लेते थे। घर में एक “लोक-लाज” होती थी। एक मर्यादा, जो लोगों को शब्दों और व्यवहार की सीमा याद दिलाती थी।

अब न्यूक्लियर फैमिली ने सुविधा तो दी है, लेकिन भावनात्मक सहारा कम कर दिया है। लोग घरों में साथ रहते हुए भी मानसिक रूप से अकेले होते जा रहे हैं। सबसे बड़ा असर बच्चों पर पड़ रहा है, जो टूटते रिश्तों और भावनात्मक दूरी के बीच बड़े होकर परिवार की स्थिरता और सुरक्षा को महसूस ही नहीं कर पाते।

समाज के लिए यह केवल सामाजिक बदलाव नहीं, एक गंभीर चेतावनी है। यदि आने वाली पीढ़ियाँ केवल अधिकारों की भाषा सीखेंगी और कर्तव्य की नहीं तो भविष्य में परिवार केवल कानूनी व्यवस्था बनकर रह जाएँगे, भावनात्मक आधार नहीं।

समाधान आधुनिकता का विरोध नहीं है। समय का पहिया पीछे नहीं घूम सकता।लेकिन आधुनिक सोच और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। भले ही लोग अलग शहरों या अलग घरों में रहें, लेकिन भावनात्मक रूप से जुड़े रहना अभी भी संभव है।

परिवारों में संवाद बढ़ाने, वैवाहिक परामर्श, योग शिविरों, फैमिली वर्कशॉप्स और इमोशनल एजुकेशन जैसी पहल अब समय की जरूरत बन चुकी हैं।

युवाओं को यह समझाना होगा कि – स्वतंत्रता का अर्थ संबंधों से मुक्त हो जाना नहीं है। विवाह केवल आकर्षण नहीं, जिम्मेदारी भी है। जो समाज रिश्तों को बचाने की कला भूल जाता है, वह धीरे-धीरे सुविधाओं से भरा हुआ लेकिन भीतर से खाली समाज बन जाता है।

शायद इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है –

क्या हम आधुनिक हो रहे हैं, या धीरे-धीरे भावनात्मक रूप से अकेले होते जा रहे हैं?

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