घर : सिर्फ दीवारें नहीं, रिश्तों की साँसों से बना एक संसार
मकान खरीद लिए… घर बनाना भूल गए
डॉ रीटा अरोड़ा
“पापा, नया घर बहुत सुंदर है…” बेटे ने चमकती आँखों से कहा।
पिता मुस्कुराए। फिर धीरे से बोले – “बस कोशिश करना बेटा… इसमें आवाज़ें कम और अपनापन ज्यादा रहे।”
कुछ पल के लिए कमरा शांत हो गया। शायद पहली बार किसी ने समझा कि घर केवल सजावट से नहीं बनता।
आज लोग जिंदगी का सबसे बड़ा सपना “अपना घर” मानते हैं। सालों की कमाई, लोन, ईएमआई और मेहनत के बाद एक खूबसूरत मकान तैयार होता है। महंगे मार्बल, मॉड्यूलर किचन, बड़ी बालकनी, इम्पोर्टेड फर्नीचर और दीवारों पर महंगे पेंट… सब कुछ होता है।
लेकिन सवाल यह है – क्या केवल इन चीजों से “घर” बन जाता है? सच्चाई यह है कि मकान ईंट-पत्थरों से बनता है, लेकिन घर रिश्तों से बनता है। एक मकान आपको धूप और बारिश से बचा सकता है, लेकिन जीवन के तूफानों से केवल घर बचाता है।
घर वह जगह है जहाँ थका हुआ इंसान सुकून ढूंढता है। जहाँ कोई पूछता है – “खाना खाया?”
और यह छोटा-सा सवाल भी दवा जैसा लगने लगता है। घर की असली नींव धैर्य होती है। जब अलग-अलग स्वभाव के लोग एक साथ रहते हैं, तब मतभेद होना स्वाभाविक है। हर व्यक्ति का सोचने का तरीका अलग होता है।
लेकिन घर तब बनता है जब कोई एक व्यक्ति बहस जीतने के बजाय रिश्ते बचाने का फैसला करता है।
कई बार माँ चुप रह जाती है।
कई बार पिता गुस्सा पी जाते हैं।
कई बार भाई अपनी जिद छोड़ देता है।
यही छोटे-छोटे धैर्य घर की दीवारों को टूटने से बचाते हैं। बिना धैर्य के सबसे खूबसूरत घर भी धीरे-धीरे तनाव का स्थान बन जाते हैं।
घर की दूसरी सबसे बड़ी ताकत है – त्याग। त्याग हमेशा बड़े बलिदान का नाम नहीं होता। कई बार यह बहुत छोटी चीजों में छिपा होता है। माँ अपने हिस्से का अच्छा फल बच्चों की प्लेट में रख देती है। पिता अपनी इच्छाएँ रोककर बच्चों की फीस भरते हैं। बच्चे बड़े होकर अपने बुजुर्ग माता-पिता की सुविधा के लिए अपनी आदतें बदलते हैं। यही त्याग घर को जोड़कर रखता है। जहाँ हर व्यक्ति केवल “मुझे क्या चाहिए?” सोचने लगे, वहाँ रिश्ते धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगते हैं। क्योंकि घर “मैं” से नहीं, “हम” से चलता है।
आज के समय में एक और चीज धीरे-धीरे कम होती जा रही है – लिहाज। लिहाज का अर्थ डर नहीं होता। उसका अर्थ होता है – सम्मान। पहले घरों में एक मर्यादा होती थी। बोलने का तरीका, बड़ों के सामने व्यवहार, छोटे बच्चों की भावनाओं का ख्याल – यह सब बिना सिखाए घर के माहौल से सीख लिया जाता था। सच बोलना जरूरी है, लेकिन हर सच को कठोर शब्दों में बोलना जरूरी नहीं। जहाँ लिहाज खत्म होने लगता है, वहाँ रिश्तों में कड़वाहट आने लगती है।
घर की सबसे महत्वपूर्ण आदत शायद “निभाना” है। आज का समय “यूज़ एंड थ्रो” का समय बनता जा रहा है। चीजें खराब हों तो लोग बदल देते हैं। धीरे-धीरे यही सोच रिश्तों में भी आने लगी है। जरा-सी अनबन हुई नहीं कि लोग अलग होने का रास्ता ढूंढने लगते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं होता। घर वह जगह है जहाँ कमियों के बावजूद साथ निभाया जाता है।
पहले लोग टूटी हुई चीजें फेंकते नहीं थे। उन्हें ठीक करते थे। रिश्तों के साथ भी यही सोच होती थी। उन्हें समय दिया जाता था, समझा जाता था और सुधारने की कोशिश की जाती थी। यही “रिपेयरिंग” की आदत मकान को घर बनाए रखती थी। आज हम दीवारों को चमकाने में बहुत समय लगा रहे हैं, लेकिन रिश्तों की धूल साफ करना भूलते जा रहे हैं। झूमर घर को रोशन कर सकता है, लेकिन चेहरों की चमक केवल प्रेम और अपनापन ला सकता है।
लोगों को घर की ऊँची दीवारें याद नहीं रहतीं।
उन्हें याद रहता है –
घर में कितना सुकून था,
कितना अपनापन था,
और कौन बिना कहे भी उनके मन की थकान समझ लेता था।
क्योंकि आखिर में घर की खूबसूरती उसकी सजावट से नहीं, उसमें रहने वाले लोगों के व्यवहार से दिखाई देती है।
शायद इसलिए सच्चाई यही है –
*दीवारों से मकान की ऊँचाई नापी जाती है,*
*लेकिन धैर्य, त्याग, लिहाज और निभाने से घर की गहराई।*
