साहित्य आलोचना के सरोकार
स्त्री अस्मिता और सामाजिक परिदृश्य-2
ओमसिंह अशफ़ाक
(यह तो तय है कि आधी आबादी की उपेक्षा करके कोई भी समाज तरक्की नहीं कर सकता है। इसलिए बार-बार हम महिलाओं के मुद्दों पर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते रहते हैं।
“स्त्री अस्मिता” वाले इससे पहले लेख में हमने चार महिला कहानी कारों की कहानियों पर चर्चा की थी। उसकी अगली कड़ी में अब प्रस्तुत है ब्रह्म दत्त शर्मा, मुकेश, इकबाल सिंह और कुलबीर सिंह मलिक की स्त्री अस्मिता पर केंद्रित कहानियों की विवेचना-संपादक)
‘हरिगंधा’ (अंक-177) में छपी दो युवा-कहानीकारों- ब्रह्मदत्त शर्मा की ‘हम सब कातिल हैं’ और संतोष ‘मुकेश’ की ‘पगडंडियाँ’ नारी-संघर्ष की जमीन पर उगी कहानियाँ हैं।
‘हम सब कातिल’ में मधु के माध्यम से हमें उसके माता-पिता के जीवन की स्थितियों का विवरण मिलता है कि किस तरह पुत्र नहीं होने के कारण उनका जीवन ‘अपशकुन’ की तरह बीता और मधु के जीवन पर नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा।
मधु भ्रूण-लिंग परीक्षण के ‘अपराध’ में पकडी जाने पर पितृसत्ता के खिलाफ स्त्री-अस्तित्व बचाने के लिए अदालत के माध्यम से तर्कसंगत बहस करती है-
“मैं एक आखिरी बात आपसे और पूरे समाज से कहना चाहती हूँ जज साहब! अगर आप सचमुच भ्रूण-हत्या रोकना चाहते हैं और आने वाले समय में लाखों-करोड़ों अजन्मी बच्चियों को बचाना चाहते हैं, तो औरतों को अपने बराबर हक दीजिए।..
“उन्हें पुरूष के बराबर सम्मान दीजिए। स्त्री और पुरुष के बीच सारे भेदभाव मिटाकर तो देखिए फिर मेरे जैसी कोई औरत यहाँ कटघरे में खड़ी नहीं होगी..।”
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‘पगडंडियाँ’ की संतरा शहीद सैनिक की विधवा है। अपने दम पर डंगर-ढोर और खेत क्यार का काम संभालती है और अपने जेठ से अपने शील की रक्षा भी करती है।
बेटे अतुल और बेटी अलका को पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बना देती है। दोनों संतानों की शादी भी कर देती है। यहाँ तक की ममतावश बेटे-बहु की खाने-पीने की आदतों और सेहत की चिंता भी खुद करती है।
लेकिन समुचित इलाज के अभाव में अपनी सेहत का कबाड़ा कर लेती है क्योंकि बेटे-बहु के पास, दिल्ली में होते हुए भी, बावजूद खुद डॉक्टर होने के, अपनी मां का चैक-अप और इलाज कराने की फुर्सत नहीं है।
सच तो यह है कि मां का स्वास्थ्य बेटे-बहु के ज़ेहन का हिस्सा ही नहीं है। और आमतौर पर हमारे परिवारों में यही स्थिति है।
वो तो किल्ले बिकवा कर क्लीनिक खोलने की फिराक में आये हैं। ये सुनकर संतरा अंदर तक हिल जाती है- “हिस्सा ही लेना आता है तुझे! कोई जिम्मेदारी भी निभाई है आज तक !
और कान खोलकर सुन लो, अलका अपना ही नहीं, मेरा भी हिस्सा लेगी….।”
उधर बेटी है कि फोन पर मां की उदास आवाज से ही पहचान लेती है कि कोई गंभीर गड़बड़ है और वह मां को साथ ले जाने, इलाज करवाने के लिए अपनी सास को संग लेकर आ पहुँचती है।
मां अपनी बेटी की ससुराल में रहकर इलाज कराने में संकोच करती है तो अलका की सास आत्मीयता बढ़ाते हुए हौसला देती है- “बहनजी परंपरा इंसान के लिए है। इंसान परंपरा के लिए नहीं..!
“आपने बेटी की अंतर्जातीय शादी करते हुए परंपरा को तोड़ा है, यह तो कुछ भी नहीं..चलने वालों से ही पगडंडियाँ बनती हैं, रास्ता तो लोग खुद बना लेंगे।”
ये नयी स्थितियों में, नये बनते मानवीय-रिश्तों की जमीन है जिसमें दो समधिनों का रिश्ता बहनापे में बदल रहा है।
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कहानी की दूसरी मुख्यः जमीन है- भारत के संदर्भ में दलित-आदिवासी-पिछड़ा समाज और विश्व के संदर्भ में नस्लभेद-रंगभेद।
संयोगवश भारतीय समाज का ये हिस्सा भी कुल जनसंख्या का आधा भाग बनता है, करीब पचपन करोड़ जोकि सदियों से दमन-उत्पीड़न और शोषण का शिकार रहा है।
जाहिर है कोई भी देश अपनी आधी से ज्यादा आबादी की उपेक्षा करके तरक्की नहीं कर सकता है। तरक्की छोड़िये सभ्य कहलाने का हक भी नहीं रख सकता है।
कहानी की ये जमीन भी बहुत उर्वर है क्योंकि उनका ‘मुक्ति-संग्राम’ अभी जारी है। इस जमीन में मानवीय संबंधों की गरमाहट अभी बची हुई है।
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इकबाल सिंह की कहानी ‘सबसे बड़ा शिवाला’ (अंक-176, हरिगंधा) इस तरफ इशारा करती है:
रिक्शा चालाक, रामकिशन आठ वाली ट्रेन देखकर मुड़ने ही लगा था कि रेलवे लाइन पार कर रहे बुजुर्ग दम्पत्ति ने हाथ का इशारा किया।
“कहाँ जाओगे बुजुर्गों?” रामकिशन ने पूछा।
“बस अड्डे” बुजुर्ग आदमी ने बताया।
“बुजुर्गों! इस वक्त तो किसी तरफ भी बस नही जाएगी।”
“अब फिर किधर चलें? बुजुर्ग आदमी ने औरत से पूछा।”
“तुम मेरे घर चलो” और किसी जवाब से पहले रामकिशन बोल पड़ा।
लेकिन अजनबीपन और संकोच के चलते बुजुर्ग दम्पत्ति रिक्शा को धर्मशाला ले जाते हैं, परंतु रामकिशन अपने घर जाकर रात भर उनके लिए चिंतित रहता है।
उसे अंदाजा हो चुका था कि बुजुर्ग दम्पत्ति किसी मजबूरी में घर छोड़कर निकले हैं और रोहतक वृद्ध आश्रम में जाना चाहते हैं।
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अगली सुबह वह उनको अपने घर ले आता है- “अब रामकिशन और गोमती (पत्नी) खुशी से कूदते फिर रहे थे। अजनबी बुजुर्गों के साथ गोमती ने कुछ ही क्षणों में रिश्तेदारी-गांठ ली:
‘माताजी-पिताजी’ कहती का कंठ सूख रहा था।” घर में तेल-मालिश करते और चाय पीते हुए बातों-बातों में पता चल गया कि उनके नाम भगवानदास और शकुन्तला हैं।
“बहु को अपने मायके का घमंड था। जब भी बोलती थी तो टेढ़ा ही बोलती थी। हमें कुत्तों समान समझती थी, हर वक्त दुतकारती रहती थी।”
रामकिशन का अंदाजा सौ फीसदी सही था। बुजुर्ग मियाँ-बीबी अगले दिन रोहतक के लिए चलने लगे तो रामकिशन ने दूसरा पासा फेंका- “माता जी हमारी जाति हरिजन है।
यदि हरिजनों के घर ठहरना आप पसंद नहीं करते तो बेशक चले जाओ। वैसे यहाँ किसी प्रकार की तंगी नहीं होगी।”
अब भगवान दास और शकुंतला के पास कोई जवाब नहीं था। इस प्रकार लगभग डेढ़ वर्ष बीत गया।
एक दिन बुजुर्ग-दम्पत्ति रामकिशन की रिक्शा में बैठकर अपने गांव में बुढ़ापा-पैंशन का फार्म भरने जाते हैं तो वहाँ उनका बेटा सतीश उनके पैरों में पड़कर माफी मांगता है।
रामकिशन कहता है- “पिता जी, मेरा दिल तो नहीं मानता कि आपको यहाँ छोड़कर जाऊं पर बेटी मंटू की तरफ देखते हुए आपको सतीश के पास रहना होगा।
वैसे मैं और गोमती चक्कर लगाते रहेंगे और अपने हिस्से की सेवा करेंगे। इस तरह इस कथा का सुखान्त होता है कि दलित- मेहनतकश वर्ग में अभी इंसानियत का टोटा नहीं पड़ा है।
इस जमीन ने विशेषकर मराठी-साहित्य को बहुत समृद्ध बनाया है
लेकिन दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों के संघर्ष में अनेक मुश्किल अड़चनें हैं। मसलन सांमप्रदायिक-फूट, जातिवाद, ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता शोषक वर्ग के जखीरे में प्रमुख अस्तर-शस्तर हैं। जिनके इस्तेमाल से मानवीय-संघर्षों को तहस-नहस किया जाता है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था- “हम मनुष्यत्व पाने का प्रयत्न कर रहे हैं।” और इसी ‘मनुष्यत्व के प्रयत्न’ में ही रोज-रोज, नई-नई कहानियाँ जन्म ले रही होती हैं।
कोई कहानी सांप्रदायिकता से टकराती है, तो कोई पितृसत्ता से भिड़ जाती है। कभी कोई कहानी मनुवादी आचार-संहिता का सरेआम उल्लंघन कर डालती है।
तब” ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता” कुपित होकर एक साथ उस पर टूट पड़ते हैं, नतीजतन तीन-तीन बहनों को एक साथ आत्महत्या करनी पड़ती है अथवा फांसी पर लटका दिया जाता है।
‘महाभारत’ से भी ज्यादा खतरनाक ये युद्ध सूर्यास्त के बाद भी बंद नहीं होता है। यह युद्ध बिना बताये, बिना चेतावनी, कहीं भी, किसी भी समय थोप दिया जाता है!
भले ही सड़क हो, मंदिर हो, खेत-खलिहान हो या फिर घर के अंदर ही क्यों न हो। कई बार तो अंदाजा ही नहीं रहता कि कितने कमंडल-भर खून पीकर “सांप्रदायिकता के शैतान” का खप्पर शांत होगा?
ऐसे में 1962 के नोबेल पुरस्कार विजेता स्टाइन बेक के भाषण के अंश बहुत याद आते हैं :
“साहित्यकार की जिम्मेदारी है कि वह कि हमारे दोषों और दुर्बलताओं का पर्दाफाश करे, हमारे काले और खतरनाक सपनों को घसीटकर रोशनी में लाए ताकि हम सुधरें।”
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1947 की सांप्रदायिकता को आधार बनाकर उसी जमीन से एक कहानी ‘कब्रिस्तान की बेरियाँ’ (हरिगंधा, अंक 166) कुलबीर सिंह मलिक की कलम से निकली है:
“मिर्जापुर गांव जिले के उस भाग में था जहाँ गांवों में कोई भी मुस्लिम परिवार नहीं बचा था। बंटवारे से पहले इस गांव में कुछ मुस्लिम परिवार थे। मुख्यतः उनका पेशा जुलाहे, तेली या खेत-मजदूरी का था।
बड़े बुजुर्ग बताते थे कि “हिंदू और मुस्लिम परिवारों में” बहुत ही सौहार्दपूर्ण रिश्ते थे। पर बंटवारे के दौर में न जाने लोगों में क्या पागलपन का दौरा आया कि दोनों कौम एक-दूसरे के खून की प्यासी हो गई।..
“कौमी और सियासी जुनून का खामियाजा उन बेकसर लोगों को भुगतना पड़ा जो जहाँ कहीं अल्पसंख्या में थे।”
बुजुर्गों के उपरोक्त बयान में पछतावा भी है, क्षमाभाव भी और जुनून के तहत हुए भयानक नुकसान का अफ़सोस भी जो मनुष्य में शैतानी-भाव को पछाड़कर इंसानी भाव जगाता है।
हमें कुछ बेहतर इंसान बनने की सीख देता है।
अगर ऐसा न होता तो घटना के तीस-बरस बाद तक नेकी नंबरदार गहनों का संदूक ‘किसी की अमानत’ के तौर पर संभालकर रखता नहीं रखता।बावजूद घर में आर्थिक तंगी और ब्याह-शादियों के?
और न ही वो सब गहनें अख्तर जुलाहे की बेटी एवं एकमात्र वारिस को इतने सुकून से सौंपे जा सकते थे।
नेकी नंबरदार को तो बस इमराना की शिनाख्त होने का इंतजार था और वह उसी क्षण हो गई थी जब सर्द-रात के अंधेरे में नेकी नंबरदार ने कब्रिस्तान की बेरियों की जड़ों में इमराना को कुदाल से मिट्टी खोदते पाया और “उसने आवाज लगाई- कौन?”
“ताऊ मैं हूँ इमराना आपके पड़ौसी अख़्तर जुलाहे की बेटी जिसे तीन दिन आपने अपनी चने की बुखारी में छिपा कर रखा था।”
दरअसल जिस शाम (1947) में इमराना के मां-बाप की हत्या की गई थी, उससे ठीक पहले उसकी मां इमराना को कब्रिस्तान की बेरियों में साथ ले गई थी, और वहाँ उसने अपने गहने गाड़ दिए थे।
कथाकार के पिताजी के बयान से भी इस बात का पता चलता है कि “उस शाम अगर वो उस बुराई के खिलाफ उठ खडे होते तो शायद वो जघन्य कांड न हो पाता।”
यानी सांप्रदायिक माहौल में असजग व्यक्तियों की सामान्य चूक भी इतनी भारी पड़ जाती है कि नुकसान की भरपाई की गुंजाईश भी नहीं बचती है?
बहरहाल तीस साल बाद इस दुःखद कथा का सुखद अंत होता है, जब “इमराना गांव के लोगों का प्यार और नेक नियति देखकर भावुक हो गई।..
“उसकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली वह सिमरन ताई (नेकी की पत्नी) से लिपटकर बेटी की तरह सुबक रही थी।..
“इमराना की आँखों से निकलती वो अश्रुधारा गांव के चेहरे पर कहीं अतीत में पुती कालिख को धोने के लिए बेताब थी।”
स्पष्ट ही है कि हरियाणा भी जातिवाद, सामंतवाद और सांप्रदायिकता के शैतान के प्रभाव एवं आक्रमण से अछूता नहीं है।
यहाँ भी गाहे-बगाहे, गोहाना, दुलिना, पहराबर, फरमाणा, महमदपुर, हरसोला़ और जाटू-लुहारी जैसे कांड होते ही रहते हैं।
जब सजग कथाकारों-कवियों की नज़र उन पर अटक जाती है तो वे कांड, कहानी कविता का हिस्सा बनकर पत्रिकाओं-किताबों में दर्ज हो जाते हैं अन्यथा समय की गर्द के नीचे दबकर छुप जातें हैं।
परंतु ये स्थितियाँ संवेदनशील लेखक को बहुत परेशान करती हैं, रुलाती हैं, इसलिए कबीर को कहना पड़ा था :
सुखिया सब संसार है, खावे और सोवै !
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवै !!
कबीर के बाद के छह सौ सालों में यों तो काफी कुछ बदल गया है, पर गनीमत ये है कि अनेक रचनाकारों की संवेदना के तेवर भौंथरे नहीं हुए हैं। आज भी ये त्रासदियाँ उनको बेहद दुःखी करती हैं।
सच्चे साहित्यकार के सरोकार क्या हैं, वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की ये दो पंक्तियाँ सटीक इशारा करती हैं :
उठता हाहाकार जिधर है !
उसी तरफ अपना भी घर है !!
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ब्रह्मदत्त शर्मा, संतोष ‘मुकेश’ इकबाल सिंह और कुलबीर सिंह मलिक की उपरोक्त कहानियाँ कथ्य और शिल्प की दृष्टि से भी पुख्ता हैं।
इनका कथानक, संवाद, भाषा-शैली और लोकेशन यथार्थपरक है जोकि इन रचनाओं की विश्वसनीयता को बढ़ाती है।
इन कहानियों का उद्देश्य और संदेश जन-हितैषी है जोकि इन्हें व्यष्टिपरक दायरे से निकलकर समष्टिपरक बनाता है।
समकालीन स्थितियों में अपनी जमीन तलाशती चारों कहानियाँ हमें आश्वस्त करती हैं कि इनके रचनाकार अपना यथोचित विकास करते हुए हिंदी साहित्य को समृद्ध करेंगे और अपनी रचनाधर्मिता को हमेशा मानवीय सरोकारों से संपृक्त रखेंगे।
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‘कहानी ‘हम सब कातिल हैं’ के बाद ब्रह्म दत्त शर्मा के तीन कहानी संग्रह ‘चालीस पार’ (2010) ‘मिस्टर देवदास’ (2014) ‘पीठासीन अधिकारी’ (2020) और दो उपन्यास, ‘ठहरे हुए पलों में’ (2016) तथा ‘आधी दुनिया पूरा आकाश'(2024) आ चुके हैं जिनका पाठकों ने गर्म जोशी से स्वागत किया है।
उनकी कहानियां भी कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं।
हमें खुशी है कि इस रचनाकार ने हमारे पूर्व आँकलन को सच साबित कर दिखाया है। शेष लेखकों से भी हमारी यही अपेक्षा बनी रहेगी।
(मूल लेख 2014, पुनः संपादित अपडेटेड 2026)
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