विधानसभा चुनाव
बंगाल से सबक
प्रेमकुमार मणि
बंगाल विधान सभा के चुनावी नतीजों ने कम से कम उत्तर भारतीय राजनीति को गहरे प्रभावित किया है. कहा जा रहा है गंगोत्री से गंगासागर तक भगवा राज फैल गया. राजनीति पर विचार करने वाले लोग भाजपा की इस प्रकार के जीत से अचंभित हैं. बंगाल की 294 सदस्यों वाली विधानसभा में उसे 206 सीटें मिली हैं. पिछले पंद्रह वर्षों से शासन में रहने वाली ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस को केवल 80 सीटें मिली हैं. ममता स्वयं अपना चुनाव हार गईं. शेष दलों को कुल मिला कर आठ सीटें मिल सकीं. इनमे कांग्रेस और वाम दल शामिल हैं.
वोट प्रतिशत को देखा जाय तो भाजपा को 44. 9 फीसद वोट मिले, जब कि तृणमूल को 40 फीसद. कांग्रेस को लगभग 03 और लेफ्ट को लगभग 04 फीसद वोट मिले हैं. अन्य के हिस्से शेष लगभग 8 फीसद वोट गए हैं.
बंगाल की स्थिति को समझने केलिए हमें वहां की डेमोग्राफी, इतिहास और राजनीति पर एक नजर डालनी होगी. सबसे पहले डेमोग्राफी पर एक नजर.
पिछली जनगणना ( 2011 ) के अनुसार धार्मिक तौर पर वहाँ हिन्दू लगभग 70 फीसद और मुसलमान 27 फीसद हैं. शेष तीन फीसद में ईसाई, बौद्ध, सिक्ख और जैन आदि हैं. सामाजिक तौर पर अनुसूचित जाति के 23.5 और जनजाति के 5.8 फीसद लोग हैं. ओबीसी 16 फीसद और सामान्य जाति के 25 फीसद लोग हैं. सामान्य जाति में ब्राह्मण, कायस्थ और बैद्य या बोदी प्रमुख हैं. कहा जाता रहा है कोलकाता का आरम्भिक इतिहास ब्राह्मणों और कायस्थों के संघर्ष का इतिहास रहा है. ऊपर से उदार दिखने वाले बंगाली भद्रजन भीतर से प्राय: अनुदार होते हैं. रवींद्रनाथ टैगोर इनलोगों को बड़ा-बड़ा छोटा लोग कहते थे.
लेकिन बंगाल की डेमोग्राफी, राजनीति और मिजाज को समझने केलिए हमें अविभाजित बंगाल को भी देखना चाहिए. अविभाजित बंगाल में मुसलमान बहुमत में थे. यानी पचास फीसद से अधिक की आबादी उनकी थी. और यहीं प्रश्न खड़ा होता है कि भारत के पश्चिमोत्तर हिस्से में तो लम्बे समय तक पेशावर और लाहौर शासन का केंद्र रहा और अरबी और तुर्क और मोगल लोगों का पश्चिम से ही आक्रमण हुआ. इसलिए उस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी अधिक हुई. लेकिन इस सुदूर पूरब के बंग देश में मुस्लिम आबादी कैसे घनीभूत हुई ? जबकि यह सत्ता के केन्द्र से दूर था. इसके दो कारण थे. पहला तो यह कि इस इलाके में इस्लाम का प्रचार सूफियों ने अधिक किया. इसलिए दलितों, कारीगरों और किसानों में इस्लाम का अधिक प्रभाव हुआ. कुछ ब्राह्मण हिन्दू राजाओं ने भी राज हासिल करने केलिए इस्लाम कबूल किया और फिर उन्होंने अपनी प्रजा को इस्लाम कबूल करने केलिए विवश किया. लेकिन बड़ा कारण सूफियों का प्रचार ही रहा. इसलिए इस क्षेत्र में इस्लाम तो आया लेकिन अरबी सांस्कृतिक वर्चस्व उतना मजबूत नहीं हुआ जितना पश्चिमोत्तर इलाके में. इसलिए बंगला भाषा और पहनावे का प्रभाव मुसलमानों पर भी बहुत हद तक बना रहा. यह भी सच्चाई है कि 99 फीसद बंगीय मुसलमान धर्मांतरित हैं. यानि आनुवंशिक तौर पर ये लोग देशज है.
जानी हुई बात है कि भारत में ब्रिटिश राज का आरम्भ बंगाल से हुआ. अंग्रेज समुद्री रास्ते से भारत आये थे. और यह पहली बार था जब किसी विदेशी ताकत का पूरबी क्षेत्र से भारत में प्रवेश हुआ था. 1757 के पलासी युद्ध में सिराजुदौला की हार का एक विश्लेषण हमारे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने किया और दूसरा विश्लेषण बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘ आनंदमठ ‘ में किया. दोनों तरह के विश्लेषण घटना के बहुत बाद में सामने आये. बंकिम का आनंदमठ हमें यही बतलाता है कि भारत में ब्रिटिश राज का हिन्दू मानस ने स्वागत किया था. कुछ इसी तरह का स्वागत महाराष्ट्र में पेशवा राज की हार और कम्पनी राज की जीत का जोतिबा फुले ने किया था. बंकिम को अनुभव हुआ कि अंग्रेज हमें मुस्लिम राज से मुक्त कर गए हैं, उसी तरह फुले को अनुभव हुआ कि अंग्रेज हमें ब्राह्मण राज से मुक्त कर गए हैं. इसीलिए बंकिम और फुले-आंबेडकर की सोच में एक सेतु दीखता है.
लेकिन हम बंगाल पर लौटते हैं. चूँकि बंगाल का भद्र हिन्दू-लोक अंग्रेजों में कहीं न कहीं मुक्तिदाता का भाव देखता था इसलिए वह उनसे उसी रूप में जुड़ा. इसी के फलस्वरूप वहाँ नवजागरण की लकीरें उभरीं. ऐसा नहीं था कि पूरा हिन्दू समाज अंग्रेजों से सीखना चाहता था, किन्तु एक छोटा-सा समूह ऐसा जरूर था. राजा राममोहन राय की जद्दो-जहद को देखने से कुछ बातें सामने आती हैं. अंग्रेजों ने मुख्य रूप से मुस्लिम शासकों से सत्ता हासिल की थी. इसलिए मुसलमानों में अंग्रेज विरोध अधिक घनीभूत था. इसका प्रभाव 1857 में देख सकते हैं. अंग्रेजों ने भी मुसलमानों के भद्र-लोक को हर स्तर पर कुचल देने की नीति अपनाई हुई थी. लेकिन इस बीच बंकिम का आनंदमठ एक अलग पाठ प्रस्तुत करता है. यह लगभग ऐसा ही है जैसा फुले ने गुलामगिरी में ब्राह्मणों के विरुद्ध सांस्कृतिक उद्घोष किया है. आनंदमठ मुस्लिमराज के विरुद्ध सांस्कृतिक संघर्ष का फलसफा प्रस्तुत करता है. वन्दे मातरम भारत का नहीं, सप्त कोटिजन बंग देश का गान है. यह अलग बात है कि बंकिम इस सप्त कोटि के बहुलांश पर सांस्कृतिक हमला करते हैं. दुर्भाग्यपूर्ण है कि बंकिम का सम्यक मूल्यांकन आज तक नहीं हुआ है. यह भी सही है कि मुस्लिम राज और मुस्लिम जन में वह भेद भी करते हैं, जैसे फुले ब्राह्मण-वाद और ब्राह्मण-जन में करते हैं.
राष्ट्रीय आंदोलन का आरम्भ बंगाल में होता है. कांग्रेस की स्थापना केलिए ह्यूम ने सबसे पहले कोलकाता विश्वविद्यालय के स्नातकों को ही पत्र लिखा था और आरंभिक राष्ट्रीय गतिविधियां बंगाल से ही हुईं. 1902 में अनुशीलन समिति की स्थापना हुई और अब राष्ट्रीय आंदोलन सीधे ब्रिटिश राज के खिलाफ होने लगा. यह राष्ट्रीयता का प्रथम चरण था. हमारे नेताओं को यह अनुभव हुआ कि इसके लिए सामाजिक जाग़ृति और एकता आवश्यक है. ब्रिटिश शासक भी यह समझ रहे थे कि जिस रोज भारत के लोग अपने सामाजिक मतभेदों को समाप्त कर एकबद्ध हो जाएंगे हम अंग्रेज यहाँ राज नहीं कर सकेंगे. कर्ज़न ने इसी समय होशियारी से मुसलमानों के असरफ हिस्से में यह बात बैठाई कि भारत के असली शासक तो आपलोग हो. और मुस्लिम नवाब तबके के लोग समझ भी गए. मुस्लिम लीग कर्ज़न के सहयोग और सलाह से स्थापित हुई. पहली राजनीतिक कार्रवाई यह हुई कि बंगाल को दो हिस्सों में विभाजित किया गया. कहा तो यह गया कि यह सब प्रशासनिक सुविधा केलिए किया जा रहा है किन्तु वास्तविकता यह थी कि कर्ज़न हिन्दू और मुस्लिम बंगाल बना रहे थे. ( यह भारत विभाजन का पूर्वाभ्यास भी था. ) 1905 में हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने इस बंग विभाजन के खतरे को समझा और इसके विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया. इसके दो परिणाम आये. एक तो बंग विभाजन रद्द हुआ और दूसरा ब्रिटिश इंडिया की राजधानी कोलकाता से हट कर दिल्ली में स्थापित हुई.
भारतीय राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन की विडम्बना रही कि अपने आरंभिक दौर में जिस ने बंग-भंग को वापस लेने केलिए मजबूर कर दिया था, अपने उत्कर्षकाल में भारत विभाजन की साजिश को विफल नहीं कर सके. इसलिए 1947 की आज़ादी हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के उत्कर्ष का भी दिन बना और चूँकि उसी रोज भारत विखंडित हुआ इसलिए पतन का दिन भी. इन दोनों स्थितियों की व्याख्या कम ही की जाती है.
भारत का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर हुआ. पाकिस्तान ने कुछ ही समय बाद अपने को इस्लामी राष्ट्र घोषित किया. भारत की संविधान सभा ने अपने को धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणराज्य की स्थापना की जहाँ हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर उपलब्ध करने का वायदा था. नेहरू के नेतृत्व में जब राष्ट्र निर्माण का कार्य आरम्भ हुआ तो अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों पर विशेष जोर दिया गया. विभाजन के समय दो हिस्सों में विभाजित पाकिस्तान में हिन्दुओं की संख्या लगभग 14 फीसद थी. भारत में मुसलमानों की संख्या 10 फीसद से कम थी. पूर्वी पाकिस्तान जो बंगाल का पूर्वी हिस्सा था, में 28 फीसद हिन्दू थे. लगभग उतने ही फीसद मुसलमान पश्चिमी बंगाल में थे. आज पश्चिमी बंगाल में मुसलमान तो लगभग उतने ही फीसद हैं, लेकिन बंगलादेश में हिन्दुओं की संख्या केवल 7 फीसद रह गयी है. पाकिस्तान में भी हिन्दुओं की संख्या में कमी आई है. भारत में मुस्लिम जनसंख्या पहले से बढ़ी है अर्थात उन्हें पर्याप्त अनुकूलता मिली है. क्या इन सब का असर हिन्दू मानस पर नहीं पड़ेगा? वह भी आज के साईबर युग में ! जब कि तमाम जानकारियां गूगल पर उपलब्ध हैं.
भारतीय मुसलमानों को इस बात पर जोर देना था कि वे भारतीय संविधान के अनुसार ढल सकें, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता उन्हें अधिक मानवीय स्थितियां सुलभ करा सकती थीं. किन्तु यहाँ जब वे एक कट्टर अरबी मुसलमान के तौर पर रहने पर जोर देंगे तब हिन्दुओं में भी यह भावना आएगी कि वे कट्टर सनातनी हिन्दू की तरह व्यवहार करें. भारत में स्थितियां तब नाजुक हुईं जब शाहबानो मामले में कट्टर मुसलमानों के दबाव में राजीव गांधी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को एक अध्यादेश द्वारा उलट दिया और संविधान की जगह शरीयत को वरीयता दी. यह मामला बाबरी मस्जिद के ढांचे के ध्वस्त किये जाने से सौ गुना अधिक गंभीर था. कांग्रेस का उसके बाद जो पतन आरम्भ हुआ सो फिर कभी रुका नहीं.
इसलिए आज हमारे समाजवादी और लोकतान्त्रिक मिजाज के साथी केवल भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस की इकतरफा आलोचना कर रहे हैं, उन्हें पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. आरएसएस और भाजपा जो पहले थी आज भी है. उसने कभी नहीं कहा कि हमारा लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वे हिन्दू राष्ट्र केलिए ही काम कर रहे हैं. पिछले तीन दशकों में उन्होंने लगातार जीत हासिल की है और समाजवादी लोकतान्त्रिक शक्तियां हारती रही हैं. क्यों ? आप ने सोच- विचार स्थगित कर दिया. अपने हर काम से संघ और भाजपा को बल प्रदान किया. आप यह भी नहीं बता सके कि संघ और भाजपा उसी रास्ते पर जा रही है जिस रास्ते पर जिन्ना और सुहरावर्दी थे. धर्मकेंद्रित राजनीति किसी राष्ट्र को मजबूत नहीं बना सकती. विज्ञान और आधुनिकता से उपलब्ध समझ के बल पर ही हम अपने समाज को सम्यक विकास के रास्ते पर ला सकते हैं.
मेरा अनुरोध होगा बंगाल के नतीजों से हम सबक लें. ममता बनर्जी और उनके तृणमूल के लिए मेरे दिल में कोई जगह नहीं है. यह ममता ही हैं जिन्होंने बंगाल में संघ और भाजपा केलिए अनुकूलता पैदा की. आज उन्हें वही हासिल हुआ है जो उन्होंने बोया था. फेसबुक वॉल से साभार
लेखक के अपने विचार हैं
