पुरस्कार सामाजिक आश्वासन हैं

भारतीय भाषा परिषद ने नरेश सक्सेना और दिव्या विजय को किया सम्मानित

1 मई को भारतीय भाषा परिषद के पुरस्कार समारोह में कन्नड़, असमिया, उर्दू, गुजराती, बांग्ला, मलयालम के साहित्यकारों के अलावा हिंदी के नरेश सक्सेना और श्रीमती दिव्या विजय को क्रमशः एक लाख राशि का कर्तृत्व समग्र सम्मान और इक्यावन हजार राशि का युवा पुरस्कार और मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया ! इस अवसर पर शंभुनाथ ने संवाद सत्र का अध्यक्षता की। प्रस्तुत है उनका दिया हुआ अध्यक्षीय वक्तव्य!

 

पुरस्कार सामाजिक आश्वासन हैं

शंभुनाथ

 

कोई भी पुरस्कार, वह जितना बड़ा हो, लेखक का गौरव बढ़ा नहीं सकता। भारतीय भाषा परिषद का यह पुरस्कार समारोह (1 मई) केवल यह संदेश है कि समाज अभी इतना कृतघ्न नहीं हुआ है कि वह अपने साधक और उच्च कर्तृत्व से सम्पन्न साहित्यकारों को भूल जाये! पुरस्कार एक सामाजिक आश्वासन है!!

ऋग्वेद का कथन है, ’कस्मै देवाय हविषा विधेम’, हम किस देवता को हवि दें? आज उसी की दार्शनिक प्रतिध्वनि इस सवाल में है, ’हम किस लिए रचें?’ धर्मग्रंथ है, इतिहास है, समाजविज्ञान है, राजनीति है। सुंदर, स्वादिष्ट और आरामदायक चीजों से सजा बाजार है। फिल्म, म्यूजिक और क्रिकेट की दुनिया की बड़ी–बड़ी हस्तियां हैं। फिर साहित्य और लेखक की क्या जरूरत है? लेखक की जरूरत इसलिए है कि जहां धर्मग्रंथ, इतिहास, राजनीति आदि चुप रह जाते हैं वहां साहित्य बोलता है, लेखक बोलता है!

कल्हण 11वीं सदी के कश्मीरी इतिहासकार थे। उन्होंने अपने संस्कृत ग्रंथ ’राजतरंगनी’ में लिखा है, ’ हे कवि, तुम्हारे बिना यह जगत अंधा है।’ जो समाज साहित्य से विमुख होता है उसे अंधा होते देर नहीं लगती। आज समाज में साहित्य की भारी उपेक्षा है, लेखक अजनबी है। फिर भी चरैवेति– चरैवेति की तरह मैं कहता हूं, रचैवेति– रचैवेति! सिर्फ चलते रहो– चलते रहो काफी नहीं है, रचते रहो–रचते रहो!

लेखक इस अर्थ में भी विलक्षण होता है कि वह भीड़ से अलग हटकर सोचता है। उसकी निष्ठा ’लोकप्रिय’ की जगह ’सत्य’ के प्रति होती है। वह प्रचार की जगह अनुभव को महत्व देता है। बल्कि वह ’स्वानुभव’ का अतिक्रमण करके संवेदना की आंख से भी संसार को देखता है।

उदाहरण के तौर पर रामायण के पहले श्लोक में ही वाल्मीकि एक मिथुनरत क्रौंच पक्षी का वध करने का प्रतिवाद करते हैं और बहेलिया को शाप देते हैं। समझने की जरूरत है, क्या वाल्मीकि का क्रौंच के साथ कोई रिश्ता था? वह न उनकी जाति का था, न धर्म और जेंडर का! फिर भी वाल्मीकि ने उसके दुख से पीड़ित होकर हस्तक्षेप किया। उस क्षण कविता का ही जन्म नहीं हुआ, स्वानुभव के समानांतर संवेदना का महत्व भी स्पष्ट हुआ! कहना न होगा कि प्रथम श्लोक का यह छोटा सा बीज ही रामायण बना– क्रौंच की तरह ही सीता राम से अलग की गई थी!

इसका अर्थ है, लेखक केवल मनुष्य समाज नहीं संपूर्ण पर्यावरण और सृष्टि की अंतरात्मा की आवाज है! लेखक बार– बार याद दिलाता है कि हम उपभोक्ता नहीं मनुष्य हैं, हम वस्तु नहीं मनुष्य हैं!

लेखक एक–एक शब्द की गरिमा के लिए जूझता है और भाषा को पतन से बचाता है। कुछ नहीं बच पाता मनुष्य के पास न उसकी पहचान, न उसका आनंद और न उसकी संवेदना, जब भाषा का पतन हो जाता है। भाषा का पतन स्वतंत्रता का पतन है!

हम इसलिए लिखते हैं कि कोई ’दूसरा’ न लगे, शब्दों को हिंसक से मानवीय बनाने के लिए लिखते हैं। जब–जब इतिहास और राजनीति ने खाइयां खोदी हैं लेखकों ने पुल बनाए हैं! हमारे लेखकों ने बताया है कि हमारी भाषा अलग हो सकती है, हमारी संस्कृति अलग हो सकती है पर हम सभी की एक साझी पीड़ा है, हम सभी की एक साझी मानवीय गरिमा है और हमारा एक साझा भविष्य है!

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