कविता
मैं शून्य में ताकता रहता हूँ !
-मंजुल भारद्वाज
मैं शून्य में ताकता रहता हूँ
शून्य बड़ा हो जाता है
शून्य
एक एक क्षतिज पार कर
निराकार हो जाता है !
मेरा सृजन चैतन्य
उस निराकार से जुड़कर
उसे आकार देने के लिए
समर्पित हो जाता है !
निराकार –आकार
आकार-निराकार
मेरे जीवन के सिरे हो गए हैं !
निराकार से आकार
आकर से निराकार की
अद्भुत यात्रा मेरा जीवन है !
यह अद्भुत यात्रा
रंग देती है
अपने रंग में
उन सबको जो
जीवन में रंग की चाहत रखते है !
रंग की चाहते रखने वाले
मुझे रंगकर्मी बनाते हैं !
