युद्ध पर बॉब डिलन की कविता: तुमने ही बनाईं सारी बंदूकें

युद्ध के विरुद्ध युद्ध-10

 

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। इस कड़ी में हमने ओमसिंह अशफ़ाक, जयपाल, रबीन्द्रनाथ टैगोर, पाश और महमूद दरवेश, राजकुमार कुम्भज की कविताएं प्रकाशित की हैं। आज प्रस्तुत है अमेरिकी कवि बॉब डिलन की कविता- तुमने ही बनाईं सारी बंदूकें । संपादक

 

कविता

तुमने ही बनाईं सार बंदूकें

बॉब डिलन

 

आओ युद्ध के मालिकों

तुमने ही बनाईं सारी बंदूकें

तुमने ही बनाए मौत के सारे हवाई जहाज

तुमने बम बनाए

तुम जो दीवारों के पीछे छिपते हो

छिपते फिरते हो तुम तिपाई के पीछे

मैं चाहता हूँ कि तुम जान लो

कि मैं तुम्हारे मुखौटे से देख सकता हूँ

तुमने कभी कुछ नहीं किया

लेकिन जो भी बनाया वह विनाश के लिए

तुम मेरी दुनिया से करते हो खिलवाड़

जैसे यह तुम्हारा छोटा सा गुड्डा हो

मेरे हाथों में बंदूक थमा कर

मेरी आँख से ओझल हो गए तुम

तुमने पीठ दिखाकर सरपट दौड़ लगा दी

जैसे बंदूक की गोली

 

किस्सों वाले जुडास की तरह

तुम झूठ बोलते और देते हो धोखा

विश्वयुद्ध फतह किया जा सकता है

ऐसा तुम भरोसा दिलाते हो मुझे

लेकिन मैं तुम्हारी आँखों से देखता हूँ

और मैं तुम्हारे दिमाग से देखता हूँ

जैसे मैं पानी के भीतर देखता हूँ

पानी जो मेरे घर की नाली में बहता है

तुमने ट्रिगर कर दिए हैं तेज

लोग और तेजी से करें फायर

फिर तुम आराम से बैठकर मजा लेते हो

काफी हो जाती हैं मौतें जब

तुम अपनी हवेली में दुबक जाते हो

नौजवानों के शरीर से बहता लहू

उन्हें उस लाल कीचड़ में दफनाता है

 

तुमने सबसे भयानक डर फैलाए हैं

नहीं मिलेगी मुक्ति जिनसे कभी

कि दुनिया में बच्चे न आएँ

मेरा अजन्मा अनाम शिशु न आए इस दुनिया में

तुम उस खून के काबिल भी नहीं

जो बहता है तुम्हारी नसों में

मैं जानता हूँ जितना

बढ़-चढ़ बहस करना

कह सकते हो तुम कि मैं हूँ जवानी के जोश में

नादान हूँ मैं

भले ही तुमसे मैं छोटा हूँ

लेकिन एक चीज मैं जानता हूँ

तुम्हें ईसा भी नहीं करेंगे माफ

तुम्हारी कारगुजारियों के लिए

 

तुमसे एक सवाल है

क्या तुम्हारी दौलत

तुम्हें माफी दिला सकेगी?

ऐसा कर सकेगी?

ऐसा लगता है मुझे

जब तुम्हारी मौत आएगी

जितना पैसा तुमने बनाया है

उससे तुम अपनी आत्मा वापस नहीं पाओगे

मुझे लगता है कि तुम मरोगे

बहुत जल्द तुम्हारी मौत आएगी

मैं तुम्हारे ताबूत के साथ चलूँगा

उस मरियल दुपहरी में

मैं देखूँगा कि जब तुम

कब्र में उतारे जाओगे

मैं तुम्हारी कब्र पर तब तक रहूँगा खड़ा

कि मुझे यकीन हो जाए कि तुम मर गए हो

अनुवाद – रमाशंकर सिंह

(‘मास्टर्स आफ वार’ का हिंदी अनुवाद)

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