विजय शंकर पांडेय का व्यंग्य- विकास का अनोखा मॉडल

बात बेबात

विकास का अनोखा मॉडल

विजय शंकर पांडेय

फोर्ब्स की ताज़ा सूची आई और देश ने राहत की सांस ली—चलो, अमीरी सुरक्षित है! एक साल में 24 नए अरबपति जुड़ गए। अब कुल 229। यानी देश प्रगति कर रहा है… कम से कम ऊपर की मंज़िल पर तो लिफ्ट तेज़ चल रही है।

उधर लक्ष्मी मित्तल रोज़ ₹274 करोड़ कमा रहे हैं। मतलब अगर वो सुबह चाय गिरा दें, तो हम उसे “आर्थिक सुधार” मानकर तालियां बजाएं। हम महीने भर में जितना कमाते हैं, वो शायद उनके मोबाइल के स्क्रीनगार्ड के बराबर हो।

इधर आम आदमी भी पीछे नहीं है। वो भी रोज़ कमाता है… उम्मीद। और खर्च करता है… धैर्य। दुनिया की औसत प्रति व्यक्ति आय $14,200 है, और हमारी $2,800। यानी हम ग्लोबल रेस में हैं, बस अभी वार्म-अप कर रहे हैं—पिछले 75 साल से।

सरकार कहती है—“सबका साथ, सबका विकास।” लगता है “सबका साथ” ऊपर वालों का है, और “विकास” भी वहीं हो रहा है। नीचे वालों के हिस्से में “सब्र” आया है।

अर्थशास्त्री इसे “विकास का अनोखा मॉडल” बताते हैं।

आम आदमी इसे “ऊपर उठती इमारत और नीचे धंसती नींव” कहता है।

खैर, चिंता मत कीजिए। अगर आप अमीर नहीं बन पा रहे, तो कम से कम आंकड़ों में तो बढ़ ही रहे हैं!

लेखक- विजय शंकर पांडेय

 

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