*पणिक्कर : राजस्थान विश्वविद्यालय ने देश को दिया था एक इतिहासकार*
जयपुर में पचास और साठ के दशक में चाय की दुकानों पर चलने वाली बहसें, विभागीय गलियारों में उठते सवाल, इतिहास को राजाओं की गाथा से निकालकर आम लोगों की कथा बनाने की बेचैनी…..एक नया माहौल बना देने वाले केरल के एक विद्यार्थी ने यहाँ इतिहास में एमए किया और फिर पीएचडी और जयपुर में चाय की कई थड़ियों को ही इतिहास बोध का केंद्र बना दिया और वह भी आज जैसा चंडूखाना इतिहास नहीं, गहन यथार्थपरक और लोकोन्मुखी इतिहास-बोध। यह कोई और नहीं, केएन पणिक्कर ही थे, जिनका निधन हो गया है और इतिहास शिक्षण की जानकारी रखने वाले बौद्धिक लोग गहन दु:ख में डूबे हैं।
पणिक्कर ने उस दाैर में आम विद्यार्थी और शिक्षकों तक को “पीपुल्स हिस्ट्री” की ओर उन्मुख किया। वे छात्रों से कहा करते थे कि इतिहास केवल किताबों में नहीं मिलता, वह सुदूर इलाकों, खेतों, मजदूरी वाले इलाकों में काम करते लोगों की कहानियों में बसता है। यही वह वाक्य है, जिसमें उनके पूरे इतिहास-बोध का बीज छिपा हुआ दिखाई देता है।
दरअसल, कभी-कभी विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ नहीं देते; वे समय को एक चेहरा देते हैं, विचार को एक स्वर देते हैं और राष्ट्र को एक ऐसा मस्तिष्क देते हैं, जिसकी रोशनी बहुत दूर तक जाती है। राजस्थान विश्वविद्यालय ने भी कभी ऐसा ही एक नायाब हीरा देश को दिया था केएन पणिक्कर। वे यहाँ आए, इतिहास में एमए किया, पीएचडी की, यहीं इतिहास पढ़ाया, यहीं प्रेम किया, विवाह बंधन में बंधे और फिर आगे चलकर जेएनयू जैसे संस्थान में पहुँचे तो भारतीय इतिहास-लेखन की दुनिया में एक असाधारण नाम बन गए। यह केवल एक व्यक्ति की शैक्षणिक यात्रा नहीं थी; यह जयपुर की मिट्टी, राजस्थान के अभिलेखागार, उसकी बहसों, उसके किलों, उसके लोक-स्मृति संसार, उसके किसान आंदोलनों, सामंतवाद के ख़िलाफ़ आम किसानों नागरिकों के संघर्ष और उसके बौद्धिक ताप का एक अद्भुत प्रस्फुटन था।
पणिक्कर की प्रारंभिक शिक्षा केरल के पालक्कड़ स्थित गवर्नमेंट विक्टोरिया कॉलेज में हुई थी, पर उनके बौद्धिक व्यक्तित्व का एक निर्णायक अध्याय राजस्थान में खुला। लगभग 1958 से 1965 के बीच का वह समय केवल विश्वविद्यालयी प्रशिक्षण का काल नहीं था; वह उनकी दृष्टि के निर्माण का युग था। राजस्थान उस समय भी अपने भीतर कई इतिहास समेटे हुए था। राजपूत अतीत की चमक, मुगल प्रभाव की जटिलताएँ, प्रजा मंडल आंदोलनों की लोकतांत्रिक बेचैनी और रियासतों से गणतंत्र की ओर बढ़ते समाज की धूल-भरी आकांक्षाएँ। इस भूमि ने उन्हें यह सिखाया कि इतिहास महलों में तो दर्ज होता है, पर उसका असली कंपन खेतों, कस्बों, सड़कों और स्मृतियों में मिलता है।
राजस्थान विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में बिताए गए वे वर्ष उनके लिए किसी तपश्चर्या से कम नहीं थे। लाइब्रेरी और आर्काइव्स में घंटों बिताना, दस्तावेजों की धूल में समय की धड़कन सुनना, औपनिवेशिक भारत के सामाजिक-आर्थिक आयामों को समझना और फिर उन सबको सामान्य जन के संघर्षों से जोड़ना। यही वह प्रक्रिया थी, जिसने उनके भीतर के इतिहासकार को आकार दिया। मालाबार विद्रोह पर उनका पहला शोध-प्रयास भी इसी शैक्षणिक अनुशासन की देन था। केरल की स्मृति और राजस्थान के बौद्धिक वातावरण का यह संयोग उनके व्यक्तित्व में एक दुर्लभ विस्तार लेकर आया।
राजस्थान विश्वविद्यालय ने उन्हें केवल अकादमिक प्रशिक्षण ही नहीं दिया; उसने उन्हें मनुष्य और समाज को पढ़ने की भाषा दी। यहाँ का विविध छात्र समुदाय थे। राजस्थानी, गुजराती, हरियाणवी, पंजाबी और देश के कई अन्य राज्यों से। एक तरह से भारतीय समाज का लघु रूप था।
जयपुर ने उन्हें निजी जीवन में भी बाँधा। यहीं उनकी मुलाकात उषा भार्गव से हुई, जो राजस्थान की थीं और उनकी सहपाठी बनीं। यह संबंध केवल विवाह का नहीं था; यह उनके जीवन को राजस्थान से स्थायी रूप से जोड़ देने वाला एक सांस्कृतिक और भावनात्मक सेतु था। एक दक्षिण भारतीय प्रतिभा का राजस्थान में अपनी बौद्धिक और पारिवारिक जमीन पाना अपने-आप में भारतीयता के उस सुंदर विचार का उदाहरण है जिसमें प्रदेश सीमाएँ नहीं, परस्पर प्रकाश के स्रोत होते हैं।
बाद में जब पणिक्कर जेएनयू पहुँचे तो वे केवल एक शिक्षक बनकर नहीं गए; वे राजस्थान विश्वविद्यालय की उस बौद्धिक परंपरा के प्रतिनिधि बनकर गए जिसमें सवाल पूछना, क्षेत्रीय इतिहास को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ना और इतिहास को सत्ता के अभिलेखों से निकालकर समाज की चेतना में पढ़ना शामिल था। जेएनयू में उनका कद इसलिए असाधारण हुआ क्योंकि उनके भीतर पहले से एक ऐसा अनुशासन, ऐसा लोक-संबंध और ऐसा वैचारिक ताप मौजूद था, जिसे राजस्थान ने सँवारा था। वे भारतीय मार्क्सवादी इतिहासलेखन की महत्त्वपूर्ण आवाज़ बने; साम्प्रदायिकता, संस्कृति, औपनिवेशिक चेतना, किसान आंदोलनों और इतिहास की वैचारिकी पर उनके काम ने उन्हें देश ही नहीं, दुनिया के गंभीर अकादमिक जगत में सम्मान दिलाया।
उनकी किताबों में जो व्यापकता दिखती है, धर्म और किसान विद्रोह के बीच संबंधों को समझने की क्षमता, संस्कृति और चेतना के तंतु पकड़ने की दृष्टि और इतिहास को केवल अतीत नहीं, वर्तमान की वैचारिक लड़ाइयों का मैदान मानने का साहस आदि उसके पीछे राजस्थान के वे वर्ष साफ़ झिलमिलाते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राजस्थान ने उनके भीतर के इतिहासकार को केवल प्रशिक्षित नहीं किया, उसे ऐसा अखिल भारतीय बनाया, जो वैश्विक दृष्टि से जुड़ा और एक ज़हीन मार्क्सवादी बनकर उभरा।
आज जब उनके जीवन और कार्य को याद किया जाता है, तब राजस्थान विश्वविद्यालय को भी अपने दर्पण में झाँकना चाहिए। किसी संस्थान का गौरव केवल उसकी इमारतों, रैंकिंगों या समारोहों से नहीं बनता; उसका सबसे उजला मानदंड वे लोग होते हैं, जिन्हें वह दुनिया के सामने भेजता है। केएन पणिक्कर ऐसे ही उजले नामों में हैं। वे इस बात की याद दिलाते हैं कि जयपुर का यह विश्वविद्यालय कभी ऐसा स्थल रहा है जहाँ से एक युवा शोधार्थी निकलकर विश्वस्तरीय इतिहासकार बन सकता था।
राजस्थान विश्वविद्यालय ने सचमुच देश को एक बड़ा इतिहासकार दिया था। और यह स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, एक चुनौती भी है कि क्या आज के विश्वविद्यालय फिर वैसे ही हीरे गढ़ने का धैर्य, वैचारिक स्वतंत्रता और बौद्धिक ताप बचाए हुए हैं? पणिक्कर का नाम इसी प्रश्न की तरह देर तक हमारे भीतर गूँजता रहता है।
लेकिन प्रदेश में आज कैसा वैचारिक दारिद्रय है कि किसी भी राजनेता ने ऐसे महान् इतिहासकार को याद नहीं किया। हमारे राजनेता और हमारे शिक्षाविद भी बहुत छोटे और अदने लोगों में फंसे रहते हैं। न पढ़ना, न बौद्धिक चर्चा करना और न ही मानवीय संवेदना और इतिहासबोध के शैक्षिक मूल्यों से सरोकार रखना। और यही वजह है कि हमारे शिक्षा के केंद्र भी वैचारिक रूप से बंजर होते जा रहे हैं। हमारे राजनीतिक समाज को पणिक्कर का याद न आना उनके बारे में और आज की राजनीति के इतिहास बोध के बारे में बहुत कुछ कहता है।
