हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 95
रामेश्वर दास गुप्ताः प्रगतिशील सोच, संगठन व संघर्ष में विश्वास
सत्यपाल सिवाच
रामेश्वर दास गुप्ता से रादौर व कुरुक्षेत्र में रहते हुए संभवतः 1981 में परिचय हो गया था। रामकुंडी लाडवा में हुई अध्यापक संघ की एक बैठक में उनसे पहली मुलाकात पक्का साथ बन गई। उनका जन्म 09 मई 1951 को नीलोखेड़ी के सिद्धपुर गांव में श्रीमती चमेली देवी और श्री चेतनदास के घर हुआ। माँ गृहिणी थीं और पिता को व्यापारी कह सकते हैं। वे कई तरह के काम करते थे। इन्होंने पिपली चिड़िया घर के सामने सरस्वती कालोनी में आवास बना लिया था। सात भाई और सात बहनों का बड़ा परिवार है।
रामेश्वर दास ने दसवीं कक्षा पास करने के बाद जे.बी.टी. में दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स किया और 07 अगस्त 1976 को प्राथमिक अध्यापक नियुक्त हो गए। वे 31 मई 2009 को मुख्य शिक्षक पद से सेवानिवृत्त हो गए। बीमारी के कारण 18 अगस्त 2014 को उनका निधन हो गया। वे स्वभाव से न्यायप्रिय व्यक्ति थे। इसलिए नौकरी में आने के बाद सेवाएं नियमित करवाने के लिए चले आन्दोलन में सक्रिय हो गए थे । आपातकाल के बाद जब केन्द्र और राज्य में सत्ता बदली तो 01. जनवरी 1980 से इनकी सेवाएं नियमित हो गई। सन् 1980 में चले आन्दोलन में भी इन्होंने धरने – प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
जब संगठन के भीतर लोकतंत्र को लेकर विमर्श चला तो रामेश्वर दास गुप्ता अमरसिंह वैद, सरदार साधुसिंह, जरनैल सिंह बरोट, शुगनचन्द शर्मा आदि के साथ प्रगतिशील विचारों के साथ खड़े हुए और कुरुक्षेत्र जिले में संगठन को भटकने से रोकने में मदद की।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में गैर शैक्षिक कर्मचारियों के आन्दोलन की मदद के लिए भी अध्यापक संघ की ओर से भाग लेते रहे। थानेसर खण्ड में शिवराम, गुरुदयाल पीटीआई, रोहिताश्व पूनिया आदि के साथ मिलकर इन्होंने संगठन निर्माण अच्छी भूमिका निभाई। इन्होंने खण्ड सचिव, तहसील उपप्रधान, जिला प्रैस सचिव और राज्य सचिव की जिम्मेदारी निभाई। ये सर्व कर्मचारी संघ के भी खण्ड सचिव रहे। सर्व कर्मचारी संघ बनने के समय वे पहले लाडवा और बाद थानेसर खण्डों में लगे रहे।
इस आन्दोलन में वे हड़ताल समेत सभी गतिविधियों में सम्मिलित रहे। वे चण्डीगढ़ में गिरफ्तार हुए कर्मचारियों में शामिल रहे। आन्दोलन की सफलता के बाद जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को संगठित करने का काम शुरू किया तो लाडवा और शाहबाद क्षेत्रों में इन्होंने महिलाओं को संगठित करने में सहयोग दिया। प्रौढ़ शिक्षा से जुड़े शिक्षकों को विभाग में विलय करवाने के आन्दोलन के तो ये मुख्य किरदार थे। सन् 1993 की हड़ताल में इन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। समझौते के बाद बहाली हुई। सन् 1996-97 के पालिका आन्दोलन, 1998 के नर्सिंग आन्दोलन में भी गुप्ता जी पूरी तरह सक्रिय थे। वे 2002 के रैशनलाइजेशन की आड़ में शिक्षकों के छंटनी के विरुद्ध आन्दोलन, 2008 के चार महीने लम्बे संघर्ष जिसमें शतप्रतिशत पदोन्नति व तीन कॉडर पालिसी जैसी उपलब्धि के दौर तक सक्रिय रहे।
उनके व्यक्तित्व का एक पहलू अध्यापक समाज हिन्दी मासिक से जुड़ा हुआ है। सितम्बर 1989 से जब प्रकाशन कुरुक्षेत्र से शुरू हुआ तो वह रोहिताश्व पूनिया और रामेश्वर दास की मेहनत के बिना संभव नहीं हुआ होता। वे वर्षों तक पत्रिका के सम्पादक मंडल में रहे। तब मैनुअल काम होता था। सामग्री एकत्रित करने से मुद्रण, प्रूफ, सैटिंग और वितरण तक सारा काम मुख्यतः इन दो साथियों के प्रयास से पूरा हुआ। गुप्ता जी साहित्यिक प्रवृति के धनी रहे। उन्होंने असंख्य रागनियां, गीत, गजल और दूसरी विधाओं में काम किया। वे अपने रहते सात पुस्तकें प्रकाशित करके गए। उनके सुपुत्र ने बताया कि अभी चार पुस्तकें और प्रकाशित की जानी हैं। उनके व्यक्तित्व का एक मानवीय पहलू भी है। वे यूनियन में ही नहीं, सामाजिक जीवन में भी जरूरतमंद की मदद करने के लिए सहज ही तैयार हो जाते थे।
रामेश्वर दास गुप्ता का विवाह सन् 1977 में श्रीमती मूर्तिदेवी के साथ हुआ। सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रियता जीवन संगिनी के बिना संभव नहीं थी। न जाने मेरे जैसे कितने अंतरंग मित्र देर-सबेर घर जा धमकते और तत्काल उनके भोजन-चाय व्यवस्था तैयार मिलती। उन्होंने रामेश्वर दास को कभी संगठन के काम से रोका-टोका नहीं। इनके दो पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं। बड़ा बेटा श्रवण कुमार एम.ए. बी.एड. है और शिक्षक है। उसकी जीवन साथी याचना भी शिक्षक हैं। दूसरा बेटा अरूण एमबीए है और अहिल्या नगर में कोस्टिंग मैनेजर है। उसकी पत्नी सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। पुत्री सुश्री पुनीत गुप्ता पी.एचडी. हैं। दूसरी बेटी रेणुका गुप्ता एम.एड. तक पढ़ी हैं और लाडवा में स्पैशल टीचर हैं। अब इनका परिवार पिपली के सुशांत सिटी में रहता है। (ओमसिंह अशफ़ाक के सौजन्य से)

लेखक- सत्यपाल सिवाच
