आजादों के आजाद महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद

पुण्यतिथि (27 फरवरी) पर विशेष

आजादों के आजाद महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद

मुनेश त्यागी

 

हड़पते हैं जो मेहनत को

उनको हड़पने की बात करो

बेनूर सुबह के हामीं हैं वो

तुम सुर्ख सुबह की बात करो

देश की आजादी के आंदोलन में, भारत के करोड़ों लोगों ने हिस्सा लिया था और आजादी की सबसे महत्वपूर्ण जंग में, भारत के लाखों लाख स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जानें कुर्बान की थीं। इनमें मुख्य रूप से हैदर अली, टीपू सुल्तान, बहादुर शाह जफर, अज़ीमुल्ला खान, नाना साहब, महारानी लक्ष्मीबाई, पीर अली, मंगल पांडे, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, मातादीन बाल्मीकि और धनसिंह कोतवाल आदि के नाम प्रमुख हैं। मेरठ के विष्णु शरण दुबलिश भी चंद्रशेखर आजाद के साथी थे और वे हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य भी थे। इन्हीं लोगों में देश की आजादी के महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे।

1921 के असहयोग आंदोलन में 15 साल के सत्याग्रही शहीद चंद्रशेखर से अदालत ने सवाल किया कि तुम्हारा क्या नाम है? इस पर इस सत्याग्रही बालक ने जवाब दिया था… आजाद, पिता का नाम… आजादी, और घर… जेलखाना। इन गज़ब के जवाबों से चिढ़कर मजिस्ट्रेट ने बालक को 15 बेंतों की सजा दी थी, तो हर बेंत लगने पर इस बालक ने “महात्मा गांधी की जय” का नारा लगाया था। यही बालक आगे चलकर चंद्रशेखर “आजाद” नाम से विश्व प्रसिद्ध हुआ। इनका नाम चंद्रशेखर था। जंगेआजादी के दौरान आजाद का संबंध मेरठ से भी रहा है क्योंकि काकोरी कांड के बाद, वे मेरठ के वैश्य अनाथालय में भी आये थे। हमारे गांव रासना के स्वतंत्रता सेनानी मास्टर रघुवीर सिंह त्यागी ने हमें यह बहुत ही खास जानकारी दी थी कि “चंद्रशेखर आजाद हमारे गांव रासना के आश्रम में भी गए थे। यहीं पर उनकी ख्वाहिश पूरी करने के लिए रसना में हमारे घर में “मक्के की रोटी और सरसों के साग” का भोजन कराया गया था। गांव रासना का यह गांधी आश्रम, स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजों की गिरफ्तारी से बचाने का कांग्रेस का अंडरग्राउंड अड्डा था।”

मध्य प्रदेश के भावरा ग्राम में पैदा हुए इस बालक की मां का नाम जगरानी देवी और पिता का नाम पं सीताराम तिवारी था। 1922 में यह बालक क्रांतिकारी पार्टी में प्रवेश करता है। अपनी लगन, अनुशासन और भारत को आजाद कराने के लक्ष्य के कारण, यह क्रांतिकारी बालक, आगे चलकर हिंदुस्तान समाजवादी गणतंत्र संघ के चेयरमैन बनते हैं, नौ साल तक फरारी का जीवन व्यतीत करते हैं और अपने दल के उद्देश्यों को अबाध गति से आगे बढ़ाते हैं। उनकी समझबूझ, सतत चौकसी और सतर्कता, उन्हें “आजाद” रखती है और वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ नही आये और अंततः उन्होंने 27 फरवरी 1931 को अपने एक परिचित की गद्दारी और मुखबिरी के कारण, ऐल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद में अंग्रेजों से जंग करते हुए, भारत माता की स्वाधीनता के लिए, अपने प्राणों की आहुति दे दी।

चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद इलाहाबाद में एक शोक सभा हुई थी जिसकी अध्यक्षता कांग्रेसी नेता टंडन ने की थी और इसमें जवाहरलाल नेहरू ने भाग लिया था और चंद्रशेखर आजाद की शहादत को बहुत बड़ी क्षति बताया था।

आजाद स्पष्टवादी, कट्टर सिध्दांतवादी और तय किये गये फैसलों को सख्ती से लागू कराने वाले सेनापति थे। उनका कहना था कि “हमारा दल आदर्शवादी क्रांतिकारियों का दल है, देशभक्तों का दल है, हत्यारों का, डकैतों का नही।” उनके दिल में समस्त मानवजाति के लिए श्रध्दा और आदर का अगाध भंडार था। वे सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर सवार हो गए थे। उनकी क्रांति का उद्देश्य मानव मात्र के लिए सुख और शांति का वातावरण तैयार करना था। वसुघैव कुटुंबकम ही उनका उद्देश्य था। वे किसी व्यक्ति विशेष के विरोधी नही थे।

आजाद की मान्यता थी कि “जिसकी आंखों में सबके लिए आंसू नही और जिसके दिल में सबके लिए प्यार नही, वह शोषक और अन्यायी व अत्याचारी से घृणा भी नही कर सकता और अंत तक उससे जूझ भी नही सकता।” वे आला दर्जे के संगीत प्रेमी भी थे।

आजाद, अपने सभी साथियों से और सबसे ज्यादा पढ़ने लिखने का आग्रह किया करते थे। कार्ल मार्क्स और फ्रेड्रिक एंगेल्स की विश्व प्रसिद्ध क्रांतिकारी किताब “कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो” उन्होंने अपने साथी शिव वर्मा से शुरू से आखिर तक सुनी था। वे उस समय के तमाम राजनीतिक सवालों और सैध्दांतिक सवालों पर हुई बहसों में जमकर हिस्सा लेते थे। शोषण का अन्त, मानव मात्र की समानता और वर्गहीन समाज की कल्पना और समाजवाद की बातों से वे मंत्रमुग्ध हो जाया करते थे। आजाद अपने को “समाजवादी” कहलाने में सबसे ज्यादा फक्र मेहसूस किया करते थे।

उन्होंने गरीबी, भुखमरी, मजदूरों और मेहनतकशों की दुर्दशा अपनी आंखों से देखी, समझी और सहन की थी, अतः इनके खात्मे के लिए वे दृढतम थे। इसी कारण वे “मजदूरों और किसानों के राज्य” के सबसे बड़े हिमायती थे। आजाद अपने दल के सेनापति ही नही बल्कि अपने समाजवादी परिवार के अग्रज भी थे। अतः अपने साथियों की दवाई, कपड़ों, जूतों, पैसे, हथियारों आदि छोटी छोटी जरूरतों का ध्यान रखते थे।

वे फासीवाद और साम्राज्यवाद के कट्टर दुश्मन थे। वे मानते थे कि “फासीवाद क्रांति के पहियों को पीछे खींचता है और साम्राज्यवाद की सत्ता और ताकत को मजबूती प्रदान करता है और जनता की आंखों में धूल झोंककर, पूंजीवाद को समाप्त होने और मरने से बचाता है।” फासीवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवादी व्यवस्था का विनाश करके, समाजवादी गणतंत्र कायम करना चंद्रशेखर आजाद और उनके साथियों के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य था। वे ताउम्र इसी ख्वाब के लिए जिये और इसी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।

आजाद और उनके “हिन्दुस्तानी समाजवादी गणतंत्र संघ” के तमाम सदस्य, लुटेरे अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों की हकीकत को जान पहचान गये थे। इसीलिए उनके नारे बदल गए थे जैसे “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” और “इंकलाब जिंदाबाद।” वे भारत की जनता का कल्याण, उस व्यवस्था के क्रांतिकारी परिवर्तन के बाद, किसानों मजदूरों की राजसत्ता और सरकार में देखते थे। वे साम्राज्यवादी निजाम का पूर्ण खात्मा करना चाहते थे, इसीलिए वे खुलेआम और अदालत में साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और इंकलाब जिंदाबाद जैसे नारे लगाते थे।

साम्राज्यवाद कैसे फासीवादी मानसिकता और नीतियां हासिल कर लेता है, इसका अंदाज उन्हें था। फासीवाद जनता को गाफिल कर देता है, जनता को अपने कल्याण की नीतियों से दूर ले जाता है, भाई को भाई से लडाता है, उसके सोचने की शक्ति में घुन लगा देता है, उसकी एकता को पूरी तरह से नेशनाबूद कर देता है और उसे पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का आसान शिकार बना देता है। उनकी और उनके साथियों की दूर दृष्टि कितनी गजब की और सटीक थी, उसका नमूना हम आज देख रहे हैं। फासीवाद किस जालिमाना तरीकों से साम्राज्यवाद की सेवा करता है और जनता को बांटकर आपस में लडवाता है, इसका बहुत ही सटीक नमूना हम आज अपने देश में देख रहे हैं, जिसे मोदी सरकार बखूबी अंजाम दे रही है और उसने जनता की एकता तोड़कर दुनियाभर के लुटेरे पूंजीपतियों की मदद कर रही है और भारत को उनका एक चारागाह बना दिया है।

परिस्थितियों, साजिश, बेइमानी, मुखबिरी और घात का खेल देखिये कि आजाद के पिताजी का नाम पं सीताराम तिवारी था। दल का यानी,,,  एच एस आर ए,, के चंदे का पैसा, उन्हीं के दल के परिचित बलभद्र तिवारी के पास जमा था। अपनी गतिविधियों के धरती पर उतारने  के लिए चंद्रशेखर आजाद यही पैसा लेने के लिए बलभद्र तिवारी के पास गये थे और इलाहाबाद के एलफ्रेड पार्क में इंतजार कर ही रहे थे कि पैसा तो आया नही, अंग्रेजों की पुलिस जरूर आ गयी, जिससे आजाद को अकेले ही लडना पडा और वहीं देश की आजादी के लिए लडते लडते वीर गति को प्राप्त हो गए। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अंग्रेज जीते जी, आजाद को हाथ न लगा सके। वे अपनी जिंदगी की अंतिम सांस तक “आजाद” ही रहे।

हमारे स्वतंत्रता सेनानी ताऊजियों,,,, ओमप्रकाश त्यागी और प्रणाम सिंह त्यागी समय-समय पर हमें, जंगे आजादी के दौरान गाए जाने वाले गीतों की कुछ पंक्तियां सुनाया करते थे। जैसे वे पंक्तियां चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बिस्मिल अशफ़ाकउल्ला खान राजेंद्र नाथ लाहिड़ी ठाकुर रोशन सिंह और सुभाष चंद्र बोस को ध्यान में रखकर ही लिखी गई थीं। चंद्रशेखर आजाद की शहादत दिवस पर आज उन्हीं पंक्तियों की याद आ रही है। आप भी उन कमाल की पंक्तियों पर एक नजर डालिए,,,

मैं फानी नहीं हूं, फनाह क्या करेंगे?

मेरा मारकर वो भला क्या करेंगे?

हथेली पर जो सर लिए फिर रहा हो

वे सर उसका धड से जुड़ा क्या करेंगे?

 

क्या भगत सिंह वीर को यूं ही भुलाया जाएगा

बेशकीमत मत लाल क्या यूं ही खफाया जाएगा?

तोड़ दो असेंबली घर फूक दो सैय्याद का

तीन के बदले में ये जालिम मिटाया जाएगा।

यहां पर यह जानना भी जरूरी है कि जिस हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के चंद्रशेखर आजाद अध्यक्ष थे, वह क्या चाहती थी? उसके उद्देश्य और लक्ष्य क्या थे? और इसी के साथ साथ उसके तमाम सदस्य और हमारे दूसरे शहीद क्या चाहते थे? हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सिद्धांतों और कार्यक्रम में “समाजवादी” शब्द, भगतसिंह की पहल पर, चंद्रशेखर आजाद की अध्यक्षता में ही जोड़ा गया था। जो बाद में “हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” के नाम से मशहूर हो गई थी। यहां पर यह जानना सबसे ज्यादा जरूरी है कि हिंदुस्तानी समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य कैसे देश का नजारा देखते थे, कैसे समाज का नजारा देखते थे? आइए जानें कि हमारे तमाम शहीद और चंद्रशेखर आजाद और उनके तमाम क्रांतिकारी साथी, कैसे देश का और समाज का नजारा देखते थे? वे चाहते थे कि,,,

हमारा देश ऐसा हो कि,,,,,

जहां न भूख हो, न नग्नता हो,

जहां न गरीबी हो, न अमीरी हो,

जहां ने जुल्म हों, न अन्याय हो,

जहां प्रेम हो, एकता हो,

जहां इंसाफ हो, आजादी हो,

जहां सुंदरता हो, जहां सुख हो।”

 

इसी के साथ साथ हिंदुस्तानी समाजवादी गणतांत्रिक संघ के उद्देश्य भी कमाल के थे। आइए जानें कि उनके क्या उद्देश्य थे? उनके उद्देश्य थे,,,,

सशस्त्र क्रांति द्वारा गणराज्य की स्थापना,
शोषण आधारित व्यवस्था का खात्मा,
विश्व में मेलजोल कायम हो,
किसानों मजदूरों की एकता हो,
राष्ट्रीय मुक्ति के लिए क्रांति हो,
प्रकृति की देन पर और प्राकृतिक संसाधनों पर सबका अधिकार हो और
इनका प्रयोग पूरे के पूरे हिंदुस्तानियों के विकास के लिए किया जाए, चंद धन्ना सेठों के विकास के लिए ही नही,
पंचायती राज्य कायम हों,
गुलामी का खात्मा हो,
हिंदू मुस्लिम एकता हो,
आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानता का खात्मा हो,
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और
इंकलाब जिंदाबाद

देखिए, उनके जो उद्देश्य आज से 95 साल पहले थे, वे आज भी प्रासंगिक हैं, उन उद्देश्यों को आज भी अमल में लाकर धरती पर उतारना जरूरी है, तभी हमारा देश असलियत में आजाद होगा और तभी यह देश एचएसआरए के सदस्यों और हमारे शहीदों के सपनों का देश होगा।

मगर अफसोस, आज जब हम देखते हैं कि यह चंद्रशेखर आजाद के सपनों का हिंदुस्तान नही है, यह फासीवादी, पूंजिवादी और हिंदुत्ववादी संप्रदायिक ताकतों का गठजोड़, लुटेरी राजसत्ता और शोषणकारी पूंजीपतियों का, खैरख्वाह बना हुआ है, तो आजाद के सपनों के सामने शीश नवाना ही पडता है। उस अमर स्वतंत्रता सेनानी के सपनों के हिंदुस्तान पर चलना और उन्हें पूर्ण करना यहां के सब मजदूरों, किसानों, छात्रों, नौजवानों और तमाम बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है, तभी आजाद के सपनों का भारत बन सकता है, तभी यहां के गरीबों और शोषितों को हजारों साल पुराने अन्याय, गुलामी, शोषण, जुल्मो सितम, अत्याचार, गैर-बराबरी और भेदभाव से छुटकारा और मुक्ति मिल सकती है।

लगभग 95 साल के बाद भी यह बात पूरे इत्मीनान और यकीन के साथ कहीं जा सकती है कि वर्तमान शोषणकारी पूंजीवादी व्यवस्था, जनता के दुख दर्दों को दूर नहीं कर सकती, उनकी परेशानियों का हल उसके पास नहीं है और उनकी समस्याओं का हल और समाधान केवल और केवल क्रांति द्वारा स्थापित मजदूरों और किसानों की समाजवादी व्यवस्था और विचारधारा में है। उनकी याद में हम तो यही कहेंगे…

 

हम आजाद…भगत के वारिस हैं

वो आजादी के लिए लड़े मरे  थे,

आजादी ओ इंकलाब थे उनके नारे

आजादी ओ इंकलाब हैं हमारे नारे।


लेखक  – मुनेश त्यागी

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