दुनिया के देशों में सैन्य शक्ति बढ़ रही है, विचारशक्ति घट रही है!

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है। सभी लोग उसमें शामिल नहीं हो पाते। हमारी कोशिश है कि वहां पुस्तक विमोचन से लेकर विचार विमर्श के कार्यक्रमों में क्या कहा जा रहा है,उसे पाठकों तक पहुंचाया जाए। उसी कोशिश की एक कड़ी शंभुनाथ जी का यह लेख है।  आगे भी पुस्तक मेले की गतिविधियों की जानकारी मिलने पर प्रतिबिम्ब मीडिया के साथियों तक उन्हें पहुंचाया जाएगा।

दुनिया के देशों में सैन्य शक्ति बढ़ रही है, विचारशक्ति घट रही है!

  • महान भारतीय सैनिक विश्व पुस्तक मेला में केंद्रीय थीम नहीं, पुस्तक प्रेमी बनकर आए!!

शंभुनाथ

दिल्ली के विश्व पुस्तक मेला में वाणी प्रकाशन के साहित्य घर में मेरी नई किताब ’छायावाद का देश’ का लोकार्पण हुआ। मेरे लिए इस अवसर पर गोपेश्वर सिंह और वैभव सिंह की उपस्थिति काफी महत्वपूर्ण थी। संचालन ज्ञानचंद बागड़ी ने किया। मैंने संवाद के दौरान आज छायावाद का क्या महत्व है, इस पर मुख्यतः यह कहा :

1) भारतीय ज्ञान परंपरा से भारतीय संवेदना परंपरा कम महत्वपूर्ण नहीं है, इसपर चर्चा होनी चाहिए। भक्ति आंदोलन और भारतीय नवजागरण के बाद छायावाद भारतीय संवेदना परंपरा में मील का पत्थर है!

छायावाद ने औपनिवेशिक स्थितियों में राष्ट्रीय जागरण के साथ ’भेद में अभेद’ का, अ–पर का महान संदेश दिया था। वह हमारे देश में आज फिर ’अभेद में भेद’ की प्रवृत्तियों के कारण अर्थपूर्ण हो उठा है।

2) आमतौर पर आज भारतीय बुद्धिजीवी बौद्धिक आत्मकैद में हैं, जिससे बिल्कुल नई स्थितियों में उन्हें बाहर निकलने की जरूरत है। फिलहाल कहीं बड़ा विजन दिखाई नहीं पड़ता। महान सृजन संभव नहीं हो पा रहा है। भारतीय अंग्रेजी साहित्य होमोजीनियस हो गया है, अच्छी किताबों का संकट है! अंग्रेजी साहित्यिक दृष्टि से इस समय दुनिया की सबसे अधिक खोखली भाषा है!

3) कभी पूछा गया था, कैन सबाल्टर्न स्पीक? आज सभी सबाल्टर्न खूब बोल रहे हैं और उसमें बहुत कुछ महत्वपूर्ण है। मुश्किल है कि एक सबाल्टर्न दूसरे सबाल्टर्न को सुन नहीं रहा है। हर विमर्श धर्म, जाति, जेंडर या प्रांत के आधार पर अपनी एक बाउंड्री बना चुका है, संवादहीनता है। चारों तरफ समाज की जगह झुंड हैं। इस युग में सभी बोल रहे हैं, पर दूसरे को सुनने की क्षमता का भारी ह्रास हुआ है।

दूसरी तरफ, जब ए आई खुद लेखक के एक बड़े अवतार में आ चुका है, लेखक की प्रासंगिकता पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है!

3) छायावाद ने प्रकृति का मानवीकरण ही नहीं किया, वह मानववाद और प्रकृति के दोहन से बचकर प्रकृति से प्रेम का संदेश देता है।

आज मनुष्य की प्राकृतिक शक्तियों – विचारशक्ति, संवेदनशीलता, कल्पनाशीलता और संवाद की प्रवृत्ति पर भीषण हमला है, अर्थात मनुष्य होने के कारण हमारी अपनी जो प्राकृतिक शक्तियां हैं– उन्हें राजनीति ही नहीं बाजार और अब ए आई भी उजाड़ने पर तुला है, बल्कि काफी उजाड़ चुका है। उत्तर–मानवतावाद छाया है। ऐसे समय में छायावाद आज हमारे पुनरमानवीयकरण का एक बड़ा प्रेरक हो सकता है!

हाल के वर्षों की एक नई घटना है, सैन्य शक्ति की वृद्धि हुई है और विचारशक्ति का क्षय हुआ है। विश्व पुस्तक मेला की केंद्रीय थीम भारतीय सेना है। हमारे देश की महान सेना सरहदों की रक्षा के लिए है, उसे पुस्तक संस्कृति का केंद्रीय थीम बनाना सांस्कृतिक उत्थान का चिह्न नहीं है। यह एक उच्च परंपरा से भटकाव है। महान भारतीय सेना सरहदों पर रहे। उन्हें पुस्तक मेले में सैनिक नहीं पुस्तक प्रेमी बनकर आना चाहिए! यदि पुस्तक संस्कृति बचाकर रखनी है तो पुस्तक मेला को साहित्यकारों, लेखकों प्रकाशकों और पाठकों का मेला ही बने रहने देना उचित है!

मनुष्य की पहचान यह नहीं है कि उसका धर्म क्या है, उसकी जाति क्या है या वह किस देश–प्रांत का आदमी है! उसकी पहचान यह है कि उसमें विचारशक्ति है या नहीं, उसका भावजगत कितना संपन्न है, उसमें संवेदनशीलता कितनी है, कल्पनाशीलता है या नहीं। प्रसाद का संदेश है– ’ मानव कह रे यह मैं हूं/ यह विश्व नीड़ बन जाता!’ निराला ने अंधेरे का ताला खोलने के लिए कहा था, ’एक टाट बिछाओ!’ यह आज के लिए भी एक बड़ा संदेश है!

छायावाद भारतीय राष्ट्रीयता और विश्वमानवता का एक अपूर्ण स्वप्न है!

शंभुनाथ के फेसबुक वॉल से साभार

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