साहसी, बहादुर और कर्तव्यनिष्ठ नेत्री बिमला यादव

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-64

साहसी, बहादुर और कर्तव्यनिष्ठ नेत्री बिमला यादव

सत्यपाल सिवाच

 

बिमला यादव अध्यापक और कर्मचारी आन्दोलन की ऐसी प्रतिबद्ध नेत्री रही हैं जो एक इंसान, एक शिक्षक, संगठन की कार्यकर्ता और अपने साथियों को भी परिवार जैसी संवेदनशीलता से देखती हैं। मैं उन्हें 1985-86 में जानने लगा था और तब से अब तक उनके प्रति सम्मान भाव बढ़ता ही गया है। वे अपने अध्यापन काल में छात्रों से अपनी संतान की तरह ही स्नेह रखती और सहकर्मी शिक्षकों से बहन-भाई सा भरोसा और सहयोग करतीं। तीन साल पहले नारनौल में पुराने समय शिक्षक मिले जो कभी बिमला जी के शिक्षक रहे थे। उन्होंने बड़े गर्व के साथ बताया कि यह लड़की बचपन से ही अपने काम और व्यवहार के लिए भरोसेमंद मानी जाती रही है। इन्हें बड़े नेता के रूप में देखकर बेहद खुशी हुई।

बिमला का जन्म 15 फरवरी 1955 को महेन्द्रगढ़ जिले के लूखी गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती मूर्ति देवी और पिता का नाम श्री चेतराम यादव है जो सीआरपीएफ से रिटायर्ड हैं। ये 3 बहनें और 2 भाई हैं। बड़ा भाई पुलिस में इंस्पेक्टर था जिसकी मृत्यु हो चुकी है और छोटा खेती करता है। एक बहन जे.बी.टी. टीचर थी। बिमला जी ने मैट्रिक के बाद प्रभाकर (ऑनर्स इन हिन्दी) परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद दो वर्षीय जे.बी.टी. प्रशिक्षण लिया। ये 4 जनवरी 1978 को सरकारी सेवा में प्राथमिक अध्यापक के आईं और 28 फरवरी 2013 को हेड टीचर पद से सेवानिवृत्त हुईं।

जिस समय बिमला जी ने यूनियन में काम शुरू किया था उस समय महिलाओं के लिए घर को छोड़कर बाहर निकलना आसान नहीं था। उनके जीवन साथी नरेन्द्र सिंह यादव तो सहयोगी प्रकृति के थे, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद न केवल घर का उत्तरदायित्व बढ़ गया, बल्कि यूनियन के लिए समय देना भी आसान नहीं रहा। हमारे समाज का पितृसत्तात्मक ढांचा और उससे संचालित सोच सबसे बड़ी अड़चन थी। इन्होंने बहुत धैर्य और बुद्धिमत्ता से घर, विद्यालय और सामाजिक कार्यों में सन्तुलन बनाया। बनवारीलाल यादव जैसे परिपक्व नेतृत्व ने कदम दर कदम बाधाओं से पार पाने में अभिभावक की तरह साथ दिया।

वे लगभग शुरुआती दौर में ही यूनियन से प्रभावित थी। जब 1985 में व्यक्तिवादी कार्यप्रणाली को लेकर हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में विभाजन हुआ तो महेन्द्रगढ़ के अधिकतर अध्यापक शेरसिंह द्वारा शुरू की गई मुहिम के साथ जुड़ गए। उस समय बिमला जी जिले की उपाध्यक्ष थीं। सन् 1990 में उन्हें राज्य कार्यकारिणी में लिया गया और सेवानिवृत्ति तक सचिव या उपाध्यक्ष चुनी जाती रहीं। वे सन् 2008 में करनाल सम्मेलन सर्वकर्मचारी संघ की केन्द्रीय कमेटी सदस्य निर्वाचित हुईं। वे महिला सब कमेटी की सदस्य भी रहीं और एस.टी.एफ.आई के सभी सम्मेलनों में डेलीगेट रहीं। उन्होंने सेवाकाल में हड़ताल समेत सभी आन्दोलनों में हिस्सा लिया। इसके चलते उन्हें तीन बार चार्जशीट किया गया। इस समय भी वे रिटायर्ड कर्मचारी संघ में भाग लेती हैं।

बिमला यादव की काम और जिम्मेदारी को निभाने की शैली एकदम भरोसेमंद है। जो काम उनके जिम्मे लगा दिया उसे पूरा करने के बाद ही उन्हें चैन पड़ता था। वे महिला-पुरुष की सीमाओं से परे हर काम को चुनौती की तरह लेती हैं। कितनी भी कठिन परिस्थितियां आईं, बिमला विचलित नहीं हुई। उन्हें बहुत चण्डीगढ़ से नारनौल लौटते समय देर हो जाती, लेकिन बिना किसी खौफ के अकेले ही सफर करतीं। उनमें आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा है।

वे फिलहाल कैलाश नगर, सैनी सभा के नजदीक, रेवाड़ी रोड नारनौल में रहती हैं। बड़ा बेटा पंचकूला में सांख्यिकी विभाग में है और उसकी पत्नी टीचर हैं। छोटा बेटा व पुत्रवधू दोनों पलवल जिले में शिक्षक है। पाँच पोते-पोतियां हैं। बड़ा पोता एम.एससी. बीएड है, बड़ी पोती भी एम.एससी. बीएड है। तीसरी पोती वकालत कर रही है। एक पोता नौवीं कक्षा में और पोती बारहवीं में पढ़ते हैं। (सौजन्य: ओम सिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच