राजेश भारती की एक ग़ज़ल
जितने पहरेदार मिले
चोरों के ही यार मिले
जिनसे रस्ता पूछा था
वे सारे बटमार मिले
रिश्तों में अब प्यार कहां
आँगन में दीवार मिले
संघर्षों से मत भागो
जीत मिले या हार मिले
जीवन के दुक्खों को भी
हफ़्ते में इतवार मिले
मर्म जो समझे शासन का
ऐसी भी सरकार मिले
