किसान मजदूर और कर्ज़ की समस्या की पड़ताल करती कहानियां (भाग-2)

साहित्य आलोचना के सरोकार

किसान मजदूर और कर्ज़ की समस्या की पड़ताल करती कहानियां (भाग-2)

 

ओमसिंह अशफ़ाक

(इस लेख के भाग-1 में हमने स्व०रामकुमार आत्रेय की कहानी ‘ट्रैक्टर और सुहागा’ पर चर्चा की है। अब पढ़िए स्व० तारा पांचाल की कहानी ‘खाली लौटते हुए’ और अमित मनोज की कहानी ‘सरा’ पर संक्षिप्त विवेचना:)

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‘खाली लौटते हुए’ कहानी के पात्र किसना और भागो का बेटा रमेश कई दिन से सख्त बीमार है और कोई आराम न होने के चलते वे उसे पास के कस्बे के एक नीम-हकीम डॉक्टर के पास इलाज के लिए ले जाते हैं।

पति-पत्नी के नाम और वेषभूषा से ही पाठक समझ जाता है कि दोनों पात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि के मज़दूर-वर्ग से संबंध रखते हैं और गरीबी तथा पिछड़ेपन ने उनके नामों को भी सिकोड़‌कर “किसना” तथा “भागो” बना दिया है जोकि अपने मूल रूप में क्रमशः किसनचंद, किशन सिंह और भागवंती या सौभाग्यवती जैसे कुछ रहे होंगे।

ग्रामीण परिवेश की एक मशहूर कहावत है: टोटे तेरे तीन नाम:

परसु, परसा, परसराम ।

कुछ लोग अंतिम पंक्ति में संशोधन करके तीन विशेषण भी लगा दिया करते हैं –

टोटे तेरे तीन नाम!

तुच्चा, गुंडा, बेईमान !!

इससे यही ज़ाहिर होता है कि है। गरीबी में मनुष्य को केवल अपमान ही नहीं मिलता बल्कि अपराधों के साथ भी उसका नाम नत्थी कर दिया जाता है। स्पष्ट है कि आर्थिक हैसियत ही समाज में व्यक्ति के “सम्मान का स्तर और रुतबा” तय करती है।

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कस्बे में यूँ तो योग्य डॉक्टर भी थे लेकिन उनकी फीस ज़्यादा थी और सरकारी अस्पताल में बिना रिश्वत और ऊँची सिफारिश के कोई पूछता नहीं था। किसना और भागो के पास ये दोनों साधन थे ही नहीं इसलिए मजबूरी थी।

डॉ. चौधरी इलाज के नाम पर कुछ का कुछ करता है, उनसे पैसा खसोटता रहता है। नतीजतन उनके बेटे रमेश की मौत हो जाती है। डॉ. चौधरी अपने गले से ‘बला टालने’ के लिए और प्रतीक्षारत मरीजों से अपनी नाकामी को छिपाने के लिए किसना और भागों को पुलिस और पोस्टमार्टम का भय दिखाकर दूसरे दरवाजे से लाश उनको देकर भगा देता है।

पुलिस और कानूनी झंझट के डर से किसना और भागो बेटे की मृत देह को लेकर जल्दी से जल्दी अपने घर पहुंच जाना चाहते हैं।

मनोवैज्ञानिक दवाव के चलते वे बेटे की दुखद मौत पर रो भी नहीं सकते हैं।

कस्बे की सड़क पर और वापिसी की बस के अंदर भी वे यही ज़ाहिर करते हैं कि बच्चा बीमार है लेकिन जीवित है, निमोनिया की वजह से कपड़े में ढका हुआ है। हालांकि सर्दी के लिहाज से उनके पास कपड़ा भी पर्याप्त नहीं है।

अंततः गाँव के निकट बस से नीचे उत्तरकर वे बेटे की लाश को सड़क से दूर ज़मीन पर रखकर पहली मर्तबा अपने अंदर घुट रहे दुख की हूक को बाहर निकलने देते हैं और जी भरकर रोना चाहते हैं।

कुछ प्रसंग उद्धृत करते हुए हम कथाकार के शब्दों में ही देखेंगे कि किस तरह उनकी व्यथा को बयान किया गया है :

“डॉक्टर अब तक उसे तीन इंजेक्शन दे चुका था पर उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। वह जब भी अन्दर आता वे दोनों लगभग एक साथ पूछते, ‘डॉक्टर जी, कोई ईसी-ऊसी बात तो नहीं है?’

और सुबह से कहे जा रहे, डॉक्टर के इस वाक्य ‘घबराओं नहीं किसना, भगवान भला करेंगे’ को नज़रअंदाज़ कर एक साथ ही दोनों की विश्वास अविश्वास के बीच भटकती नज़रें डॉक्टर के चेहरे को पढ़तीं और भीतर ही भीतर काँपता हुआ विश्वास उन्हें सहारा देता, ‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।”

सरकारी अस्पताल में फैले भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की ‘मशहूरी’ आम जनता में किस हद तक घर कर गई है, यह निम्न पंक्तियों को पढ़कर बखूबी समझा जा सकता है :

“यूँ कस्बे में अस्पताल भी है पर जब बेटे को लेकर गाँव से चला था तो कइयों ने एक ही बात कही थी, ‘चौधरी पर ही ले जाना, किसी और अच्छे डॉक्टर को दिखा लेना पर अस्पताल के चक्कर में बिल्कुल न पड़ना। हाँ, अगर नोट फरकाने की गुंजाइश हो तो फिर बेशक अस्पताल में दिखा लेना।”

अज्ञानतावश अनपढ़ लोग बहुत जल्दी अफवाहों का शिकार हो जाते हैं। पोस्टमार्टम के बारे में भी उनकी ऐसी ही धारणा थी:

“हर पोस्टमार्टम के बाद गाँव भर में खूब खुसर-पुसर भी होती रही है- डॉक्टर दिल निकाल लेते हैं, पेट काटकर कलेजा निकाल लेते हैं। आँखें भी निकाल लेते हैं- लाशें कई-कई दिन तक सड़ती रहती हैं- आदि।”

किसना लाश को लिए अभी भी पुलिस से बहुत आतंकित था : “सिपाही पीछे रह गया तो किसना ने महसूस किया था कितनी बार

पहले भी वह इस शहर में आया था।

“कभी बैलगाडी हाँकते हुए लम्बरदार की जिन्स बेचने, कभी उसके खाद के थैले लेने और कभी-कभार खुद अपने घर के लिए मिट्टी का तेल या कोई और छोटी-मोटी चीज़ लेने पर इस शहर की भीड़ इतनी बेगानी और घूरती हुई कभी नहीं लगी जितनी आज लग रही है।”

कहानी का अंतिम दृश्य विवश माता-पिता का जीवंत चित्र पेश करता है:

“अपने पर काबू रखते हुए किसने ने लाश को सड़क से हटाकर रख दिया था और सीधा खड़ा होते ही अब तक हाथ में पकड़ी वह शीशी उसने जोर से सड़क पर दे मारी थी।

“इतनी देर में भागो दो हत्थड़ मारती हुई लाश से लिपटकर बिलख पड़ी थी। किसना चाहता था कि किसी भी तरह चुपचाप घर तक पहुँच जायें पर अब तक का रुका उसका दर्द भागो के बिलखने से और भी तेज चीख बनकर निकला था।”

शायद कथाकार की असावधानी के चलते कुछ विरोधाभास भी कहानी में स्पष्ट दिख जाते हैं। जैसे कि बच्चे की उम्र 10 साल बताई गई है और बस में उसका बाप उसे ‘पानी’ की बजाय ‘पा’ पीयेगा’…कहकर पूछता है।

शिशु वर्ग के बच्चे ही पानी को ‘पा’ कहकर पहचानते बोलते हैं क्योंकि वे उस उम्र में शब्दों का पूरा उच्चारण करने में समर्थ नहीं होते हैं। इसलिए माँ-बाप भी संप्रेषण की सुविधा के लिहाज से उसी शब्द का प्रयोग कर दिया करते हैं। दूसरा उदाहरण और देखते हैं:

“बस लंबे रूट की थी और तेज गति से चल रही थी। किसने के अड्डे तक केवल तीन ही स्टाप थे, फिर भी उसे बस की कम गति कचोट रही थी।”

अलबत्ता तो लंबे रूट की बसें लोकल सवारी बैठाती नहीं हैं और यदि बैठा भी लें तो किसी कस्बे से किसी स्थानीय गाँव तक उसके तीन स्टॉप कैसे हो सकते हैं?

हरियाणा के उत्तर में तो वैसे भी जिलों का आकार बहुत छोटा रह गया है और कहानी इसी परिवेश की लगती है। दुर्भाग्य से अब हमारे बीच लेखक भी मौजूद नहीं हैं कि हम उनका मन्तव्य जानकर अपनी जानकारी में सुधार कर पाते।

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‘सरा’ के लेखक अमित मनोज ऐसे युवा कथाकार हैं जिनकी कई कहानियाँ छप चुकी हैं और वह बहुत अच्छा लिख भी रहे हैं। उनको पढ़कर यह आश्वस्ति होती है कि हरियाणा के दक्षिणी अंचल से एक और प्रतिभावान लेखक निखरकर आने वाला है।

प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते हुए पीएच.डी. तक की शिक्षा प्राप्त कर लेने वाले इस युवा लेखक में तमाम संभावनाएँ मौजूद हैं।

वह एक अच्छा फोटोग्राफर और एक अच्छा चित्रकार भी है। यथार्थ का गहनता से निरीक्षण-विश्लेषण, स्थानीय बोली में आवश्यकतानुसार सटीक संवादों का उपयोग, वातावरण का आंचलिक चित्रण, वास्तविक दिनचर्या से पात्रों का अनुकूल चयन और चीज़ों को पकड़कर उठाने का कौशल, पात्रों की ‘साइकी’ में प्रवेश करने का हुनर अमित के कथाकार की कुछ मोटी विशेषताएँ हैं।

अमित की यहाँ विवेचित कहानी ‘सरा’ रामबरस नामक दक्षिणी हरियाणा के एक छोटे किसान की कथा है जिसके पास अलग-अलग दिशा में दो छोटे खेत हैं।

ट्यूबवैल से सिंचाई के लिए ‘भाना’ नामक बड़े जमींदार की मर्जी और सुविधा पर निर्भर रहना पड़ता है और नहर में पानी कभी-कभी अथवा महीने में एक बार आता है।

दक्षिणी हरियाणा में यदि किसी चीज़ की सबसे अधिक चाहत होती है, तो वह है राम बरसने (यानी वर्षा की) शायद इसीलिए कहानी के मुख्य पात्र का नाम रामबरस रखा गया है।

रामबरस अपनी पत्नी को ‘शारदा की माँ’ कहकर पुकारता है। गाँवों में अभी तक भी ऐसा ही प्रचलन है कि पति-पत्नी सार्वजनिक तौर पर एक दूसरे का नाम नहीं उच्चारते हैं।

उपरोक्त बातों से और ऐसी अन्य चीज़ों से परिवेश का यथार्थवादी चित्रण अत्यन्त विश्वसनीय बन जाता है और कहानी कृत्रिम या काल्पनिक नहीं लगती है।

हालांकि एक सीमा तक कहानी में कल्पना का उपयोग होना लाज़िमी भी है और होता ही है अन्यथा कहानी प्रकृतवाद की शिकार हो सकती है।

‘सरा’ का मतलब है- सिंचाई के वास्ते ट्यूबवैल या नहर के पानी को अपने खेत में ले जाने की बारी। अंग्रेजी वाले पाठक इसके लिए ‘टर्न या रोटेशन’ सिस्टम कह सकते हैं।

कई इलाकों में किसान इसे ‘ओसरा’ कहते हैं इसलिए विभिन्न पाठकों की सुविधा के लिए ‘सरा’ शीर्षक के पूर्व हमने ‘ओ’ पद जोड़ दिया है ‘ओसरा’।

जनवरी माह की कड़ाके की ठंडी रात में रामबरस के दोनों खेतों में पानी लगाने की बारी (ओसरा) एक ही रात में आ जाती है।

उसकी पत्नी अनुभवी होने के चलते प्रतिकूल मौसम में दरपेश कठिनाई से परिचित है। पति के साथ में खेत पर जाने का प्रस्ताव रखती है।

परंतु रामबरस अपनी पुरुषवादी मानसिकता और त‌जनित अतिरिक्त आत्मविश्वास के कारण उसे मना कर देता है और रात के ग्यारह बजे बिना बताये टॉर्च उठाकर चुपके से घर के बाहर वाली सांकल बंद करके खेत में पहुँच जाता है।

जहाँ ठंडे पानी में देर तक प्रवेश और ऊपर से सख्त पाले की मार के चलते ठंड से अकड़कर उसकी खेत में ही मौत हो जाती है लेकिन सबेरे खेत की सिंचाई सम्पन्न मिलती है।

उसकी मौत का सबेरे आठ बजे तब पता चला जब उसकी बेटी शारदा उसके लिए चाय लेकर खेत में पहुंची। घटना कैसे घटी, इसका विवरण हमें कहानी में कुछ इस तरह मिलता है:

“राम-राम चाचा। कैहतरा आयो?” रामबरस ने पूछ लिया था।

“खेत को सेरो सै।” भाना जमींदार बोला।

“आवांगा चाचा। तेरो बी के कसूर। जमींदारा म्हं कित सुख सै। म्हारै शारदा की माँ तो ना‌ट्टी थी अक् गीहूँ एक ई किल्ला म्हं बोइये। पणै वा तो मेरे इ लागगी थी अक् सिरस्यूँ (सरसों) नै तो आय-बाय कै जाड्‌डो मार ज्याय सै।..

“कम सीं कम गीहुँआं म्हं तूड़ो तो बचैगो। डांगरा को फूस को तो काम चाल्लैगो। फेर नहर बी तो काम की कोन्या अक् दिन म्हं इ पाणी दियो जाया बिजली बी..।” रामबरस भाना के जाने के बाद भी बोलता रहा।

अब खेत में जाने के बाद रामबरस की कार्य प्रणाली का पता इस प्रकार मिलता है:

“रामबरस एक ही चक्कर में ठंड से ठिठुरने लगा था। कमाल की सर्दी थी आज। वह रमलू के खेत में जाता। कुन्डी खोलता। पम्पों को कंधों पर टिकाता और अपने खेते में उन्हें रखकर कुन्दी से जोड़ता।..

“पम्प उठाने से नीचे उतारने तक वह ‘राम-राम’, ‘ओ३म नमः शिवाय’ कहता जाता। पर राम और शिव ने उसकी ठंडी देह को कोई गर्मी नहीं पहुँचाई। इस सारी प्रक्रिया में घंटा भर लग गया था। रामबरस का शरीर ठंड से लगातार काँप रहा था।..

“उसने सारी लेन को जोड़ दिया था। मोटर चलाने की उसे कोई चिंता नहीं थी। ज़मींदार ने यह बढ़िया काम किया हुआ था कि कुएँ पर ऑटोमेटिक सिस्टम लगवा दिया था। जब भी पूरी बिजली आती मोटर अपने आप चल जाती।”

उपरोक्त अंतिम पक्तियों से हमें खेती में आधुनिक और ऑटोमेटिक टैक्नॉलाजी के प्रयोग का विवरण भी मिलता है। लेकिन प्रतिकूल मौसम का कोई क्या करे? रामबरस की माचिस भी गीली होकर बेकार हो गई थी:

“रामबरस के दाँत बुरी तरह किटकिटाने लग गए थे। उसके पास अब माचिस होती तो वह निश्चित ही खेतों में इधर-उधर बनी छोटी-मोटी टापरियों में भागकर आँच बाल़ता और अपनी देही को सेंकता।..

“उसे बीड़ी की तलब लगी हुई थी। बीड़ी उसकी जेब में डली हुई थी, पर उनका वह क्या करता। जलाने के लिए माचिस भी तो चाहिए न।

“उसका कंबल गीला हो गया था। धुंध और ठंड उसे सेध रही थी। उसने हिम्मत बांधकर सब पंपों की कुंडी डाल ही दी थी।”

उपरोक्त अंतिम पक्तियों से हमें खेती में आधुनिक और ऑटोमेटिक तकनॉलाजी के प्रयोग का विवरण भी मिलता है। लेकिन प्रतिकूल मौसम का कोई क्या करे? रामबरस की माचिस भी गीली होकर बेकार हो गई थी:

धुंध और ठंड दोनों उसे सेध रही थीं। उसने सब पम्पों की हिम्मत बाँधकर कुन्दी डाल ही दी थी।”

शारदा चाय लेकर खेत में पहुँची तो वहाँ का मंजर ही कुछ और था। उसके तो होश उड़ गए :

“वह तेज़-तेज़ कदमों से अपने खेत में गई। वहाँ उसने देखा कि खेत मे परले कोने में कोई सोया हुआ है। वह डरती-डरती नज़दीक गई। हो न हो यह उसका पिताजी ही हो।..

“वह सोये हुए आदमी के बिल्कुल पास गई। अवाक् रह गई थी वह। वह तो उसका पिताजी ही है जो सारे का सारा अकड़ा हुआ है और उसके कम्बल पर पाले़ की परत चढ़ी है। उसके हाथ से थर्मस छूट गया।

फव्वारे यहाँ भी ‘छप छप’ ‘छप छप’ चल रहे थे।”

प्रेमचंद के समय से लेकर आज तक छोटे किसान की स्थिति यही चली आती है। क्या इसको तुरंत बदलना ज़रूरी नहीं है? इसका उत्तर हम पाठकों के विवेक पर छोड़ रहे हैं। वे ही निर्णय करें तो अच्छा होगा!

(समाप्त)

(2014में)

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