युद्ध के खिलाफ लेखक एकजुट हों,रचना में अपने समय को करें दर्ज
जलेस दिल्ली के 11वें राज्य सम्मेलन में जुटे साहित्य प्रेमी और रचनाकार
आज अमरीका ने पूरी दुनिया की व्यवस्था को तहस नहश कर दिया है और युद्ध की विभीषिका की मार सबसे पहले आम आदमी पर पड़ती है।ऐसे में लेखकों का दायित्व और कर्तव्य बढ़ जाता है,इसलिए उन्हें अपने समय का सच अपनी रचना में जरूर दर्ज करना चाहिए। जनवादी लेखक संघ का दसवां सम्मेलन कल इस सन्देश के साथ संपन्न हो गया।

प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती , दिल्ली विश्विद्यालय शिक्षक संघ की पूर्व अध्यक्ष नंदिता नारायण शाश्वती मजूमदार , वयोवृद्ध कवि इब्बार रब्बी, प्रसिद्ध लेखक एवं समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट, जलेस के अध्यक्ष चंचल चौहान, महासचिव नलिन रंजन सिंह समेत कई लेखकों ने सम्मेलन को सम्बोधित किया।
वक्ताओं का कहना था कि आज अपने देश में ही नहीं पूरी दुनिया में झूठ का बोलबाला है और सत्य का गला घोंटा जा रहा है। दुनिया में एक नहीं अनेक छोटे बड़े तानाशाह पैदा हो गए है जो दिन रात झूठ बोलते हैं और लोकतंत्र की आड़ में अपनी दादागिरी कायम करने में लगे हैं। ईरान और फलस्तीन में जो कुछ हो रहा इसी दादागिरी का नतीजा है और यह सब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के वर्चस्व का प्रमाण है।
चार सत्रों में आयोजित इस समारोह में वक्ताओं का यह भी कहना था कि हर सत्ता का चरित्र दमनकारी होता है।हमने अपने देश में आपातकाल देखा और उस आपातकाल का विरोध करने वाली शक्तियां जब सत्ता में आईं तो उन्होंने खुद अघोषित आपातकाल लगा दिया।इसलिए लेखकों की जिम्म्मेदारी अधिक हो जाती है।दुनिया में हर समय लेखकों ने दमन अन्याय अत्याचार का विरोध किया है। आज उसकी जरूरत बढ़ गयी है।
समारोह के अंत में काव्य पाठ भी हुआ जिसमें इब्बार रब्बी, मदन कश्यप, राकेश रेणु,
राधेश्याम तिवारी, संजीव कौशल समेत कई लोगों ने भाग लिया।
