राजकुमार कुम्भज की दो कविताएं
( एक )
सर्दियाँ पास हैं,तो वसंत भी दूर नहीं.
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अभी ठिठुर रहे हैं शब्द
अपने भीतर अपने ताप के लिए
तंबू तने हैं घने-सूने जॅंगलों में
पीने के पानी की कमी है चहुँओर
सरकारें सेंक रही हैं मुर्गे और
भेड़ें और तीतर वग़ैरह
बकरियाँ मिमिया रही हैं समर्थन में
चूहे लिख रहे हैं प्रशस्तियाँ और प्रार्थना-पत्र
खेतों में लहलहा रहा है
अकाल जैसा ही कुछ-कुछ
नालियों में विचार और व्यवहारिकताऍं
सभी दुबके हैं अभी ओढ़कर कंबल
जाग रही हैं, झाँक रही हैं बहते जल में
झिलमिल-झिलमिल
गिलहरियाँ ,तितलियाँ और चींटियाँ
शेरों को, मगरमच्छों को, हो रहा है अजीर्ण
सर्दियाँ पास हैं, तो वसंत भी दूर नहीं
साँसत में हैं प्राण प्रायः
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( दो )
सर्दियाँ पास हैं,तो वसंत भी दूर नहीं.
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बुझी हुई कंदील लिए हाथों में
अंधे, अंधों को,अंधेरे में दिखा रहे हैं रास्ता
और बम-बम बमबारी करते हुए
चिल्ल-पों मचाते हुए इधर-उधर की
बता रहे हैं कि इधर, इधर ही है मुक्ति-मार्ग
सर्दियाँ पास हैं, तो वसंत भी दूर नहीं
अच्छे दिनों का स्वादिष्ट है अचार
और बेहद चटपटा भी कुछ कम नहीं
कारागृह जाने से बचाता है बख़ूबी
कपड़े बदलना भी सिखाता है
जो सीख गये कुशल कारीगर कहलाये
और जो सीख नहीं पाये ये महान कला
पीछे-पीछे आये,आते गये पैदल
आहिस्ता-आहिस्ता.
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