राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं

कविता-1

दोस्त क़िताबें

राजकुमार कुम्भज

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चीख़ती नहीं हैं,बोलती हैं क़िताबें

थोड़ा धीमे-धीमे बोलती हैं तो क्या हुआ

साफ़-साफ़ और सच-सच ही बोलती हैं

देखकर चेहरा बदल नहीं देती हैं बात

चापलूसी नहीं करती हैं

झुकती नहीं हैं सज़दे में ज़रा भी

सजने-संवरने से दूर ही रहती हैं मगन

बदलती नहीं हैं अपना रॅंग, रॅंगत अपनी

पवित्र हैं,क़ायम हैं आचरण में क़िताबें

ईश्वर अगर है कहीं भी पृथ्वी पर तो है यहीं

क़िताबों की शक़्ल में ही है वह हर कहीं

जैसे हद-बेहद-अनहद,निराकार-निरापद

वे परम पारदर्शी भी होती हैं हिम्मतों जैसी

क़िताबों में घनी गहरी छुपी होती है आग

आशय भी आग का समझाती हैं क़िताबें ही

आग नहीं बाग़ लगाती हैं दोस्त क़िताबें

और करती हैं मुक्त सभी को.


 

कविता-2

 

सच का ईंधन हैं क़िताबें.

 

थोड़ा धैर्य,थोड़ी फ़ुरसत चाहिए

और अगर हो ज़रा-ज़रा कुछ तमीज़ भी

तब ही आना इधर इन क़िताबों के पास

सिर्फ़ तमीज़दार तापमान में नहाने के लिए

खुलता है,मिलता है वह बहुमूल्य जल यहाॅं

दाम जिसका जीवन में नमक और करुणा

रूठना-मनाना,लड़ना-झगड़ना ही नहीं

समझना,समझाना भी सिखाती हैं क़िताबें

थकान में हौसला,हौसले में राह की चाह

सपने सच बनाती हैं बेधड़क क़िताबें ही

चाहते हैं जो भी,जब भी पाते हैं इन्हीं से

‘पानी में रहना और मगरमच्छ से डरना’

कुछ नहीं,कुछ नहीं सिर्फ़ है एक मुहावरा ही

वक़्त-क़साई चीर देता है तमाम तानाशाही

अकेली आवाज़ों का अकेला घर हैं क़िताबें

अकेलों को अकेलों से मिलाती हैं अकेले में

हैं जो भी हैं वे इस संसारभर में अकेले

और सब कुछ का सब बनाती हैं अर्थवान

क़िताबें ही हैं सच का ईंधन.

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