तिताश एकटी नदीर नाम: जीवित सांस्कृतिक दस्तावेज़

ऋत्विक घटक एक बड़े फिल्मकार तो थे। उन्होंने केवल मनोरंजन के लिए फिल्में नहीं बनायीं। उनकी फिल्में जीवित दस्तावेज हैं। ऋत्विक  ने कम फिल्में बनायीं लेकिन उनमें समय और समाज की धड़कन को पिरोया। दुख तकलीफ को आवाज दी। वे अच्छे सिनेमेटोग्राफर थे, पटकथा लेखक थे और निर्देशक तो थे ही। 6 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि है। उनके निधन को 50 साल हो चुके हैं। अगर वे जीवित होते तो भारतीय सिनेमा को क्या मिला होता, इसे उनकी फिल्मों के बारे में पढ़कर देखकर ही जाना जा सकता है। उन पर विभिन्न समय पर लिखे गए कुछ लेख और उनकी फिल्मों पर समीक्षात्मक टिप्पणियों को यहां रोजाना देंगे। कुछ समय पहले उनका एक साक्षात्कार प्रतिबिम्ब मीडिया ने प्रकाशित किया था, उसे भी पुनः प्रकाशित करेंगे। आशा है प्रतिबिम्ब के पाठकों को पसंद आएगा। आज उर्वशी की ऋत्विक की फिल्म तिताश एकटी नदीर नाम पर टिप्पणी दे रहे हैं। उर्वशी ने इसे अपने फेसबुक पर लिखा था। साभार सहित यहां प्रकाशित  कर रहे हैं।संपादक

तिताश एकटी नदीर नाम: जीवित सांस्कृतिक दस्तावेज़

 

उर्वशी

 

ऋत्विक घटक की ‘तिताश एकटी नदीर नाम’ को यदि केवल उपन्यास-आधारित फिल्म कह दिया जाए, तो यह उसके आत्मिक आयामों के साथ घोर अन्याय होगा। यह कृति सिनेमा के माध्यम से रचा गया एक जीवित सांस्कृतिक दस्तावेज़ है — पूर्वी बंगाल की लोकस्मृति, नदी-केन्द्रित जीवन-पद्धति, और मछुआरा समुदाय की सामूहिक नियति का ऐसा रूपांकन, जो इतिहास से अधिक मिथक, और यथार्थ से अधिक करुण-सत्य प्रतीत होता है। अद्वैत मल्लबर्मा के उपन्यास से जन्मी यह फिल्म शब्दों के संसार से आगे बढ़कर छवियों की ऐसी काव्यात्मक भाषा रचती है, जहाँ हर दृश्य एक स्मृति है, हर चेहरा एक कथा, और हर मौन एक युग की थरथराती हुई साँस।

तिताश नदी यहाँ मात्र भूगोल नहीं है — वह स्वयं नियति है। वह माँ भी है, देवता भी, और वही विनाश का सूक्ष्म संकेत भी। घटक की दृष्टि में नदी दृश्य-पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि जीवित सत्ता है; उसका बहाव समय का प्रवाह है, उसका उफान मनुष्य की आकांक्षाओं का, और उसका सूख जाना सभ्यता की थकान का प्रतीक। जब तिताश लहराती है, तो उसके साथ लोकगीतों की धुनें बहती हैं, बच्चों की किलकारियाँ तैरती हैं, और स्त्रियों की आँखों में घर-गृहस्थी की धीमी चमक जगती है। पर जैसे-जैसे जल घटता है, वैसे-वैसे जीवन की लय भी टूटने लगती है — नावें किनारों पर निष्प्राण पड़ी रह जाती हैं, जाल स्मृतियों की तरह उलझ जाते हैं, और मनुष्य पहली बार समझता है कि नदी का मरना, दरअसल उसकी अपनी आत्मा का सूख जाना है।

ऋत्विक घटक का कैमरा इस पूरी त्रासदी को किसी बाहरी करुणा से नहीं, भीतर की पीड़ा से देखता है। कुमार शाहनी का यह कहना कि यह “प्रकाश से गढ़ी गई फिल्म” है, दरअसल घटक की दृश्य-दृष्टि का सबसे सटीक संकेत है। प्रकाश और अंधकार यहाँ केवल तकनीकी तत्व नहीं — वे चेतना की अवस्थाएँ हैं। अँधेरे घरों में बैठी स्त्रियाँ, धूप में खेलते बच्चे, जल पर झिलमिलाती किरणें — सब मिलकर जीवन की उस नश्वर चमक को रचते हैं, जो क्षणिक होते हुए भी अनश्वर लगती है। घटक के क्लोज़अप चेहरों को नहीं, आत्माओं को फ्रेम करते हैं। झुर्रियों में समय का इतिहास है, आँखों में विस्थापन का शोक, और मौन में वह सब जो शब्दों से परे है।

फिल्म का कथानक रेखीय न होकर स्मृति की तरह बहता है — जैसे नदी स्वयं अपनी कहानी सुना रही हो। प्रेम यहाँ निजी भाव नहीं, सामुदायिक अनुभव है; उसका टूटना केवल दो व्यक्तियों का विछोह नहीं, जीवन-व्यवस्था के बिखरने का संकेत है। स्त्री पात्रों की चुप्पी विशेष रूप से मार्मिक है — वे बोलती कम हैं, पर उनके श्रम, उनकी प्रतीक्षा, उनकी आँखों की थकान पूरी सभ्यता की पीड़ा को व्यक्त करती है। वे नदी की तरह ही देती रहती हैं, और अंततः उसी तरह सूख जाने के लिए छोड़ दी जाती हैं।

‘तिताश एकटी नदीर नाम’ विस्थापन की कथा भी है — केवल भौगोलिक नहीं, अस्तित्वगत। समुदाय धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता है; मछुआरे अपनी नावों से, स्त्रियाँ अपने घरों से, बच्चे अपने खेलों से, और मनुष्य अपने स्वाभाविक परिवेश से कटता जाता है। यह विघटन किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि समय, प्रकृति और समाज के सम्मिलित षड्यंत्र का फल है। घटक इस विघटन को विलाप की तरह नहीं, शोकगीत की गरिमा के साथ रचते हैं — जहाँ दुख में भी सौंदर्य है, और टूटन में भी एक करुण संगीत।

इस फिल्म को देखते हुए बार-बार लगता है कि हम किसी कथा नहीं, अपनी ही भूली हुई स्मृति में प्रवेश कर रहे हैं। तिताश की धारा दरअसल हमारी सांस्कृतिक चेतना की धारा है — जो आधुनिकता की अंधी दौड़ में सूखती जा रही है। घटक इस सूखने को केवल दर्ज नहीं करते; वे उसे एक मिथकीय आयाम देते हैं, जिससे यह कहानी किसी एक प्रदेश या समुदाय की न रहकर समूची मानव सभ्यता की कहानी बन जाती है।

इस अर्थ में ‘तिताश एकटी नदीर नाम’ सिनेमा से अधिक सिने-काव्य है — छवियों में रचा गया एक महाकाव्य, जहाँ नदी समय है, मनुष्य उसका क्षणभंगुर पात्र, और स्मृति ही एकमात्र शाश्वत तत्व। घटक ने इस फिल्म में केवल एक कथा नहीं कही; उन्होंने हमारी सामूहिक आत्मा की खोई हुई प्रतिध्वनि को सुनने की क्षमता लौटाने का प्रयास किया है। यही कारण है कि यह फिल्म देखी नहीं जाती — अनुभव की जाती है, और एक बार अनुभव में उतर जाए तो लंबे समय तक भीतर किसी अनजानी नदी की तरह बहती रहती है।

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