राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं

राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं

1.

एक अंधा आदमी

 

वक़्त ऐसा भी आता है जीवन में

जब खोने को कुछ भी होता नहीं है पास

न रिश्ते,न संगति,न प्रार्थना,न पैसा

वक़्त तो पहले ही खो चुका होता हूॅं मैं

अभी जिसमें चल रहा हूॅं कि जल रहा हूॅं

जानता ही नहीं हूॅं कुछ भी कि ये है क्या

अनजान नहीं हूॅं,लेकिन जो हो रहा है

वह सब पहले कभी देखा-सुना नहीं

ये जो हो रहा है चलने और जलने जैसा

कोई ख़ास वज़ह नहीं है नज़र इसकी

एक बस्ती है और बड़ी भीड़ है सड़कों पर

यातायात की अराजकता में फॅंसी हुई

जिसे संभालने की ज़िम्मेदारी के स्वाॅंग में

बहुत बड़ा होता जा रहा है यहीं-कहीं

एक अंधा आदमी.

 

2.

एक अलग-सी आग

अजीब-सी अकुलाहट

और एक अलग-सी आग है भीतर

जो न तो ख़त्म होती है कभी,कहीं

और न कहीं भस्म ही करती है मुझे

सुलगती रहती है,धधकती रहती है

जानता हूॅं कि एक दिन आएगी ऑंधी

और सब कुछ उड़ा ले जाएगी अपने साथ

ऑंखें होते हुए भी देख नहीं पाऊॅंगा मैं

इस लौ का बुझना,जो अकुलाहट भरी

धधकती रही है निरंतर,निरंकुश अभी

मेरे ख़ुद के भीतर.

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3

क़माल यही था

कल जब मेरा वक़्त था

तो सचमुच मेरे पास वक़्त नहीं था

और आज जब मेरे पास वक़्त है

तो सचमुच मे‌रा वक़्त नहीं है

कल मैं अंधा था,

घर में दर्पण था

आज मैं अंधा नहीं हूॅं,

घर में दर्पण नहीं है

एक मुसीबत था,

एक ज़रूरत है

मुसीबत और ज़रूरत में

बेहद ही महीन-सा फ़र्क था

मैं था,वक़्त था,दर्पण था.

क़माल यही था.

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